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अमरीका में 90 दिनों में मिल जाती है सरकारी नौकरी, क्या भारत के नौजवानों को नहीं चाहिए नौकरी : रविश कुमार

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व्हाट्स एप पर एक मित्र कुलदीप से बात हो रही थी । उन्होंने अमरीका के पत्रकार स्टीवन ब्रिल की किताब टेलिस्पिन का हवाला देते हुए बताया कि अमरीका में सरकारी नौकरी की प्रक्रिया काफी जटिल और थका देने वाली है। मुझे लगा कि वहां भी तीन चार साल में भर्ती पूरी होती है। मगर ब्रिल ने कोफ्त जताते हुए लिखा है कि औसतन एक सरकारी नौकरी की प्रक्रिया पूरी होने में 90 दिन लग जाते हैं. जबकि प्राइवेट कंपनियों में 23 दिन। स्टीवन ब्रिल 90 दिन को ही थका देने वाला और जटिल मान रहे थे। सोचिए भारत में हम लोग क्या करें। जहां कोई इम्तहान ही समय पर नहीं होता है।

भारत के नौजवान भी यह जान कर स्तब्ध रह जाएंगे। उन्हें पता है कि कुछ नहीं होने वाला है क्योंकि उनका अनुभव बार बार उन्हें साबित कर देता है। ऐसी बात नहीं है कि नौजवानों ने नेताओं पर दबाव नहीं डाले या धरना प्रदर्शन नहीं किए, नेताओं ने भी वादे किए मगर सत्ता में आने या चले जाने के बाद भी चयन आयोगों की हेंकड़ी और नकारेपन में कोई कमी नहीं आई। ऐसा अपने आप से नहीं होता है बल्कि अब लगने लगा है कि सरकारों ने नौकरी समय पर न देने बल्कि नहीं देने की अच्छी तरकीब निकाल ली।

एक दिन कुछ नौजवान मिलने आए। पूरी फाइल तैयार कर लाए थे और कहा कि बिहार में 17 साल में बिहार लोक सेवा आयोग 7 परीक्षाएं भी नहीं करा सका है। इन परीक्षाओं के चक्कर में फंसे युवाओं की जवानी बर्बाद हो चुकी है। झारखंड का भी यही हाल है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और मध्य प्रदेश का भी वही हाल है। इन आयोगों के हवाले से अगर आप हिन्दुस्तान के युवाओं को समझेंगे तो बहुत आसानी से देख पाएंगे कि सरकार चाहे तो नौजवानों को जैसे मर्ज़ी उल्लू बना सकती है और नौजवान बनकर दिखा भी देते हैं। उनमें से आधे से ज्यादा सरकार को सरकार की तरह नहीं बल्कि अपने धर्म, अपनी जाति के नेताओं की सरकार के रूप में देखते हैं। इसीलिए उनका आंदोलन होता है तो उसी में से कुछ लोग उसकी धार कम करने में लगे रहते हैं। सबकी लड़ाई अकेले की हो गई है। सब मिलकर कर लड़ते तो शायद एक ईमानदार व्यवस्था भी हासिल कर लेते।

आज किसी ने लिखा है कि उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की सीबीआई जांच 6 महीने से चल रही है मगर अभी तक कोई नतीजा नहीं आया है। लोक सेवा आयोग का वार्षिक परीक्षा कैलेंडर भी ध्वस्त हो गया है। इस साल की अपर सर्बोडिनेट परीक्षा का प्रीलिम्स 19 अगस्त 208 को होनी थी। लेकिन उसकी तारीख़ बढ़ते-बढ़ते 28 अक्तूबर 2018 पहुंच गई है। यही नहीं अपर सर्बोडिनेट परीक्षा 2016 के नतीजे भी अभी तक नहीं आए हैं।

जम्मू कश्मीर लोक सेवा आयोग के छात्र मुझे लिख रहे हैं कि आयोग ने परीक्षा की प्रणाली में बदलाव तो कर दिया लेकिन नए पैटर्न के हिसाब से तैयारी करने का सबको मौका नहीं दिया। जम्मू कश्मीर कंबाइंड कॉम्पिटिव परीक्षा 2018 का प्रीलिम्स 2 सितंबर को होने जा रहा है। जबकि 2017 की मेन्स की परीक्षा 12 अगस्त को ख़त्म हुई है। 2017 की परीक्षा में शामिल होने वाले दस हज़ार छात्रों को नए पैटर्न के साथ तैयारी के लिए वक्त नहीं दिया जा रहा है। उनके पास मात्र 24 दिन है। करीब 10,000 छात्र इस फैसले से प्रभावित हैं।

किसी ने पटना से सिटी भास्कर की क्लिपिंग भेजी है। उस ख़बर में लिखा है कि बिहार स्पेशल टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (BSTET) पास होने के बाद भी 53, 500 अभ्यर्थी स्कूलों में नियुक्ति का इंतज़ार कर रहे हैं। 2019 तक इनकी नियुक्ति नहीं हुई तो इनकी वैधता समाप्त हो जाएगी। इन्हें फिर से BSTET की परीक्षा देनी होगी। जुलाई 2011 में BSTET की परीक्षा निकली थी। 12 लाख अभ्यर्थियों ने 60 रुपये देकर फार्म भरे थे। नवंबर 2011 में परीक्षा हुई। जून 2012 में रिजल्ट निकला। एक साल निकल ही गया। 68,500 अभ्यर्थी परीक्षा में पास हुए। परीक्षा पास कर छह महीने तक नियुक्ति की कोई प्रक्रिया शुरू नहीं हुई।

BSTET के बाद 2012 में 17,500 पदों पर हाई स्कूल में और 17,587 प्लस टू स्कूलों में शिक्षकों की बहाली होनी थी लेकिन कई चरणों के बाद भी यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। अंतिम भर्ती मई 2016 में हुई थी। अगर चयन की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई तो मार्च 2019 में उनके पास होने की वैधता समाप्त हो जाएगी। बिहार में हाई स्कूल और प्लस टू स्कूलों में 19000 शिक्षकों की कमी है।

मैं नहीं कहता कि 50,000 से अधिक शिक्षकों को मीडिया की ज़रूरत नहीं है, बिल्कुल है और भास्कर ने इसे छापा भी। फिर भी इतनी बड़ी संख्या की कोई हैसियत नहीं है। इसी संख्या के बराबर रैली करने के लिए नेता लोग नोट बांट कर भीड़ जुटा लेते हैं जिस पर मीडिया ही हफ्तों चर्चा करता है। कई बार लोग पूछते हैं कि क्या करें, तो मेरे पास भी वाकई कोई जवाब नहीं होता है।

यूपी पुलिस का अलग से भर्ती बोर्ड है। इसकी तीन भर्तियां निकली थीं। दो भर्तियां 2016 की और एक सितंबर 2017 की। सितंबर 2017 की परीक्षा हुई मगर जनवरी में इस परीक्षा को रद्द घोषित कर दिया गया। जनवरी से अगस्त बीत गया मगर दोबारा परीक्षा कब होगी, पता नहीं है। यूपी पुलिस में कंप्यूटर आपरेटर का इम्तहान देने वाले नौजवान साधारण तबके से आते हैं। जैसे तैसे जतन कर परीक्षा देने गए थे। अब रद्द हो गई है और उम्र बीती जा रही है। इसमें भी हज़ारों छात्र शामिल हुए थे।

मध्य प्रदेश के अखबारों में भी चयन आयोगों के घोटाले की खबरें छप रही हैं। राज्य लोक सेवा परीक्षा 2012 के पर्चे लीक होने का मामला 2018 में भी जांच में उलझा हुआ है। इसकी जांच के लिए स्पेशल टास्क फोर्स बनाया गया था जिसने कोर्ट से कहा है कि पर्चे लीक हुए थे। 23 उम्मीदवारों को इससे लाभ मिला था। नई दुनिया इंदौर ने लिखा है कि सीबीआई ने 2014 में पीएससी के आर्युवेद चिकित्सा अधिकारी की परीक्षा के पर्चे लीख करने का मामला पकड़ा था। इसी गिरोह ने बताया है कि उसने 2012 के प्री और मेन्स के पर्चे लीक किए थे।

अभी मध्य प्रदेश से छात्र लिख रहे हैं कि मध्य प्रदेश वन सेवा की अंतिम उत्तर कुंजी फिर से ग़लत है। जबकि सतना से किसी ने लिखा है कि हम लोगों ने 100 रुपये प्रति प्रश्न फीस देकर आपत्ति दर्द कराई थी। कई छात्रों ने 800 रुपये जमा कराए हैं, प्रमाण दिया है कि कैसे आयोग के उत्तर ग़लत हैं मगर कोई सुनवाई नहीं। आयोग ने अपने उत्तर को सही बता दिया है।

एक दिन यूं ही मेसेज आने लगे कि हम सभी भारत सरकार के टकसाल, हैदराबाद के लिए चुने जा चुके हैं। हमने जून 2017 को जूनियर टेक्निशियन पद की परीक्षा दी थी। 14 अगस्त 2017 को रिज़ल्ट आया। उसके बाद वेरिफिकेशन के लिए दस्तावेज़ मांगे गए। हम इन सारे प्रमाण पत्रों के साथ 9 अक्तूबर 2017 को हैदराबाद बुलाए गए। वहां आश्वासन मिला कि एक माह में नियुक्ति पत्र मिल जाएगा। अक्तूबर से अगस्त बीत गया मगर नियुक्ति पत्र नहीं आया है। झांसी, पटना से छात्रों ने हमें लिखा है।

काश मेरे पास पर्याप्त संसाधन होता। आज ही मुझे दस अलग-अलग मुद्दों को लेकर फोन आए। सबके सब अर्जेंट। परेशान हैं। फोन लगातार बजता रहता है। धीरे धीरे उठाना कम कर दिया हैं। कितनी बार लिखूंगा और बोलूंगा कि मैं सारी समस्याओं के साथ इंसाफ नहीं कर सकता। मेरे पास कोई सचिवालय नहीं है। पर इसका एक ही मतलब है कि नौजवान बहुत परेशान है। उसे हिन्दू मुस्लिम की गोली देकर उलझा दिया गया है। उसे भी इसमें नशा आता है। वर्ना जिस स्तर पर नौजवानों को धक्का दिया जा रहा है, उनकी आंधी में कोई भी तिनके की तरह उड़ जाए।

नोट- आई टी सेल इन समस्याओं को उठाए। ज़ोर शोर से मंत्रियों से पूछे कि यूपी के TET अभ्यर्थियों को नौकरी कब मिलेगी? उनकी संख्या एक लाख है। पौने दो लाख शिक्षा मित्र हैं। क्या उन्हें इनका वोट नहीं चाहिए? इन लोगों ने सरकारों का क्या बिगाड़ा है कि उन्हें नौकरी न देने की सज़ा दी जा रही है।

भावुक मुद्दों की जल्द दरकार, नहीं है मार्केट में रोज़गार: रविश कुमार

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आर्थिक समाचार पार्ट 1

2017 में भी काम नहीं मिला, 2018 में मिलने की उम्मीद बहुत कम है। यह कहना है CMIE के महेश व्यास का, जो रोज़गार पर नियमित विश्लेषण पेश करते रहते हैं। हमने इनके कई लेख का हिन्दी अनुवाद कर यहां पेश किया है।CMIE मतलब Centre for monitoring Indian Economy, के विश्लेषण की काफी साख मानी जाती है। 

आज के बिजनेस स्टैंडर्ड में महेश व्यास ने लिखा है कि सितंबर से दिसंबर 2017 के रोज़गार संबंधित सर्वे आ गए हैं। इन्हें अंतिम रूप दिया जा रहा है लेकिन जो शुरूआती संकेत मिल रहे हैं उससे यही साबित होता है कि रोज़गार में मात्र 0.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। संख्या में 20 लाख। इसके भीतर जाकर देखने पर शहरी रोज़गार में 2 प्रतिशत की वृद्धि दिखती है और ग्रामीण रोज़गार में 0.3 प्रतिशत की गिरावट दिखती है। 
रोज़गार पाने लायक उम्र की गिनती में 15 साल और उससे अधिक को रखा जाता है। 2017 में इस उम्र के करीब ढाई करोड़ लोग जुड़े मगर इसमें से बहुत ही कम लेबर मार्केट में गए। इसी को श्रम भागीदारी दर कहते हैं। महेश व्यास कहते हैं कि भारत में श्रम भागीदारी दर ग्लोबल औसत से बहुत कम है। ग्लोबल औसत 63 है, भारत में 2017 में 44 प्रतिशत पर आ गया जो 2016 में 47 प्रतिशत पर था। महेश व्यास कहते हैं कि कायदे से 1 करोड़ 10 लाख लोगों को रोज़गार मार्केट में आना चाहिए था मगर डेढ़ करोड़ लोग इस मार्केट से निकल गए। इस तरह श्रम भागीदारी दर 46.6 प्रतिशत से घटकर 43.9 प्रतिशत हो गई। 
श्रम भागीदारी दर मे गिरावट आने का मतलब है कि लोगों को नौकरी या काम मिलने की बहुत कम उम्मीद है। श्रम भागीदारी में आ रही गिरावाट को तीन अलग-अलग संस्थाओं ने अपने सर्वे में दर्ज किया है। लेबर ब्यूरो, नेशनल सैंपल सर्वे संगठन और सी एम आई ई के सर्वे में यह बात सामने आई है। नाउम्मीदी के कारण बहुत से बेरोज़गार नौकरी की खोज बंद कर देते हैं। फिर भी 2017 में 2 करोड़ लोग काम खोज रहे थे। इनमें से 80 लाख शहरों में थे। काम खोजने वालों में 34 फीसदी शहरी भारत के होते हैं मगर शहरी भारत में  41 फीसदी लोग बेरोज़गार हैं। 
रोज़गार कम होने का कारण है कि निवेश बहुत कम हो रहा है। नए निवेश के प्रस्ताव गिरकर 8 ख़रब डॉलर पर आ गए हैं। दो साल पहले 15 ख़बर डॉलर हुआ करता था। अगर यही हाल रहा तो 2018 में भी उम्मीद नहीं की जा सकती है। 2018 के पहले सप्ताह में बेरोज़गारी की दर 5.7 प्रतिशत थी। पिछले 12 महीने  में यह सबसे अधिक है। 

मोदी सरकार ने हर साल दो करोड़ रोज़गार देने का वादा किया था। सरकार के पास हर तरह के आंकड़े हैं मगर रोज़गार के आंकड़े कभी वह ट्वीट नहीं करती है। मंत्री और सांसद बीमार की तरह रोज़ किसी न किसी की जयंती, पुण्यतिथि ट्विट करते हैं, इसकी जगह अपने मंत्रालय में मौजूद अवसरों को ट्वीट करने लगे तो कितना अच्छा होता। युवाओं को भुलावे में रखने के लिए महापुरुषों को याद करने की नौटंकी चल रही है। 
यह सही है कि बीजेपी हर चुनाव जीत लेती है। इसके लिए रोज़गार पर लेख लिखने वालों को गाली न दें, बल्कि वोट देने वालों का शुक्रिया अदा करें।  
आर्थिक समाचार पार्ट टू- सरकार देगी टैक्सभक्ति का शानदार मौका
शेयर मार्केट में निवेश करने वालों के लिए अच्छी ख़बर है। अभी एक साल से कम समय पर बेचने से टैक्स देना होता है। उसके बाद टैक्स फ्री माल हो जाता है। सरकार विचार कर रही है कि अब शेयर ख़रीदने के तीन साल के भीतर बेचने पर टैक्स लिया जाए ताकि आपको ज़्यादा से ज़्यादा टैक्स देने का मौक़ा मिले। अभी तक सरकार एक साल के भीतर बेचने पर ही टैक्स लेकर आपको टैक्स देने के गौरव से वंचित कर रही थी। 

बिजनेस स्टैंडर्ड की ख़बर के अनुसार वित्त मंत्रालय इस पर विचार कर रहा है। टैक्सभक्त एंकरों के लिए यह शानदार मौका है कि वे मांग करें कि ये एक साल या तीन साल क्या होता है, जब भी आप कमाएं, टैक्स देना चाहिए। इससे भक्तों को भी देश के लिए कुछ करने का मौक़ा मिलेगा। मैं कुछ भी टैक्स फ्री नहीं चाहता, भले ही सरकार टेंशन के अलावा कुछ न दे। स्कूल न दे, अच्छा कालेज न दे और अस्पताल न दे। पूछने पर जेल-वेल भी भेजे। 
आर्थिक समाचार पार्ट थ्री-  चलो ख़रीदें महंगा तेल 
गुजरात चुनाव बीतने के तुरंत बाद लोग महंगा पेट्रोल और डीज़ल ख़रीदने योग्य हो गए हैं। दिल्ली में पेट्रोल 70 रुपये और डीज़ल 60 रुपये के पार जाने लगा है। यह अच्छी ख़बर है। निराश न हों, फिर कोई चुनाव आ ही रहा होगा। तब बैलेंस कर लीजिएगा।

लोकतंत्र को फेक न्यूज़ से ख़तरा, रविश कुमार का प्रधानमंत्री मोदी पर हमला !

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फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने एक कानून लाने का वादा दिया है जो फ्रांस के चुनावी अभियानों के दौरान फेक न्यूज़ पर रोक लगाएगा। उनका कहना है कि लोकतंत्र को बचाने के लिए नए कानून की ज़रूरत है। भारत मे तो प्रधानमंत्री ही चुनावी भाषणों में फेक न्यूज़ का इस्तमाल कर देते हैं। आल्ट न्यूज़ जैसी कुछ वेबसाइट के अलावा फेक न्यूज़ के खिलाफ कोई भी सघन तरीके से नहीं लड़ रहा है। 

फरवरी महीने 18 से दो साल तक सिंगापुर में कोई भी नई कार नहीं ख़रीद सकेगा। वहां की सरकार ने कार ख़रीद पर तरह तरह के प्रतिबंध लगाकर 0.25 प्रतिशत तक ला दिया था जिसे अब शून्य किया जा रहा है। 2000 से सिंगापुर की आबादी में 40 फीसदी वृद्धि हुई है। 6 लाख कारें हो गई हैं। सरकार का कहना है कि अब और जगह नहीं बची है।
केप टाउन के प्रशासन ने लोगों से कहा है कि जब ज़रूरत हो तभी फ्लश करें। तीन बार फ्लश करने से 27 लीटर पानी ख़र्च हो जाता है। कहा जा रहा है कि एक बार ही हाथ और चेहरा धोएं। बर्तन दिन में एक बार ही धोएं। यहां तक कि यह भी सुझाव दिया जा रहा है कि हर दिन दो लीटर की जगह पौने दो लीटर ही पानी पीने की कोशिश करें। बताया जा रहा है कि प्रतिदिन 84 लीटर पानी के इस्तमाल का किस तरह बंटवारा करें और सदुपयोग करें।  

 
केप टाउन में सूखा पड़ा है। शहर में पानी की भयंकर कमी हो गई है। वहां एक जनवरी 2018 से पानी के इस्तमाल पर तरह तरह के प्रतिबंध लगे हैं। जो नियम तोड़ेगा उस पर भारतीय मुद्रा में 5000 से 10000 तक का जुर्माना लगेगा। आप गूगल सर्च करेंगे तो पता चलेगा कि केप टाउन के लोग टॉयलेट और फ्लश की ज़्यादा चर्चा कर रहे हैं। लोग बता रहे हैं कि कैसे बिना फ्लश और पानी के शौच करने लगे हैं। आप यह सब पढ़ेंगे तो अंदाज़ा रहेगा कि पानी की समस्या क्या हालत करने वाली है। इस तरह के संकट भारत में भी पैदा होते ही रहते हैं। 
दुनिया में हर साल तीस लाख लोग वायु प्रदुषण के कारण समय से पहले मर जाते हैं। अमरीका में 1970 के दशक में CLEAN AIR ACT पास हुआ था। वायु प्रदूषण की मात्रा तय कर दी गई थी। अब नए शोध से पता चल रहा है कि यह मात्रा खास उम्र के लोगों के लिए भी जानलेवा साबित हो रही है। 

Journal of the Americal Medical Association में एक नया रिसर्च पेपर प्रकाशित हुआ है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने 2 करोड़ 20 लाख मौतों के दस्तावेज़ों का अध्ययन किया है। इनके अध्ययन से देखा गया है कि 65 साल से ऊपर के बुज़ुर्ग वायु प्रदूषण की न्यूनतम मात्रा से भी मारे जा रहे हैं। 
दिल्ली में बहस ही हो रही है। होती रहेगी। आज हिन्दू मुस्लिम टापिक में वैसे क्या है टीवी पर।

कहानी उस छात्र संगठन की जिसने एबीवीपी का वर्चस्व ख़त्म कर दिया: रविश कुमार

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मध्यप्रदेश छात्र संघ की कहानी जयस की जीत की है, जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन की
मध्यप्रदेश में छात्र संगठन के चुनाव में एबीवीपी की जीत की ख़बर छाई हुई है। जबलपुर से एनएसयूआई की जीत की खबर भी को जगह मिली है। लेकिन एक ऐसे छात्र संगठन की ख़बर दिल्ली तक नहीं पहुंची है। जबकि पत्रिका ने इसे पहले पन्ने पर लगाया है कि धार में जयस ने एबीवीपी के वर्चस्व को समाप्त कर दिया है। इस संगठन का नाम है जयस। जय आदिवासी युवा संगठन।  
2013 में डॉ हीरा लाल अलावा ने इसे क़ायम किया है। हीरा लाल क़ाबिल डॉक्टर हैं और एम्स जैसी जगह से अपने ज़िले में लौट आए। चाहते तो अपनी प्रतिभा बेचकर लाखों कमा सकते थे मगर लौट कर गए कि आदिवासी समाज के बीच रहकर चिकित्सा करनी है और नेतृत्व पैदा करना है। 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस पर डॉ हीरा लाल की रैली का वीडियो देखकर हैरत में पड़ गया था। 
भारत में नेतृत्व दिल्ली की मीडिया फैक्ट्री में पैदा नहीं होते हैं। तीन-चार साल की मेहनत का नतीजा देखिए, आज एक नौजवान डाक्टर ने संघ के वर्चस्व के बीच अपना परचम लहरा दिया है। जयस ने पहली बार छात्र संघ का चुनाव लड़ा और शानदार जीत हासिल की है। दरअसल, मध्यप्रदेश छात्र संघ के नतीजों की असली कहानी यही है। बाकी सब रूटीन है।

 

मध्य प्रदेश का धार, खरगौन, झाबुआ, अलीराज पुर आदिवासी बहुल ज़िला है। यहां कुछ अपवाद को छोड़ दें तो सभी जगहों पर जयस ने जीत हासिल की है। धार ज़िले के ज़िला कालेज में पहली बार जयस के उम्मीदवार प्रताप डावर ने अध्यक्ष पद जीता है। बाकी सारे पद भी जयस के खाते में गए हैं। प्रताप धार के ही टांडा गांव के पास तुकाला गांव के हैं जहां आज भी पानी के लिए सात किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। प्रताप अपने गांव का एकमात्र और पहला स्नातक है। इस वक्त एम ए इकोनोमिक्स का छात्र हैं। प्रताप ने एबीवीपी और एन एस यू आई के आदिवासी उम्मीदवारों को हरा दिया है। दस साल से यहां एबीवीपी का क़ब्ज़ा था।  
धार के कुकसी तहसील कालेज में जीत हासिल की है। गणवाणी कालेज में भी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष समेत सारी सीटें जीत ली हैं।  धर्मपुरी तहसील के शासकील कालेज में चारों उम्मीदवार जीत गए। अध्यक्ष उपाध्यक्ष और सचिव का पद जीता है। मनावर तहसील के कालेज की चारों शीर्ष पदों पर जयस ने जीत हासिल की है। गणवाणी में सारी सीटें जीते हैं। बाघ कालेज की सारी सीटें जीत गए हैं। अलीराजपुर के ज़िला कालेज की पूरी सीट पर जयस ने बाज़ी मारी है। खरगौन ज़िले के ज़िला कालेज में ग्यारह सीटे जीते हैं। जोबट और बदनावर कालेज में भी जयस ने जीत हासिल की है।

 

इन सभी सीटों पर जयस ने एबीवीपी के आदिवासी उम्मीदवारों को हराया है। माना जाता है कि आदिवासी इलाकों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपना सामाजिक राजनीतिक आधिपत्य जमा लिया है, मगर जयस ने अपने पहले ही चुनाव में संघ और एबीवीपी को कड़ी चुनौती दी है। जयस की तरफ से धार में काम करने वाले शख्स ने कहा कि संघ हमारा इस्तमाल करता है। हमारे अधिकारों की लड़ाई नहीं लड़ता है। हम यह सब समझ गए हैं। जहां जहां जयस ने हराया है वहां पर एबीवीपी का ही क़ब्ज़ा था। 
धार से जयस के प्रभारी अरविंद मुझालदा ने बताया कि धार ज़िला कालेज की जनभागीदारी समिति की अध्यक्ष पूर्व केंद्रीय मंत्री विक्रम वर्मा की पत्नी नीना  वर्मा हैं। लीला वर्मा भाजपा विधायक भी हैं। इस कालेज में उनका काफी दबदबा था जिसे जयस ने ध्वस्त कर दिया। सह-सचिव के पद को छोड़ किसी भी पद पर एबीवीपी को नहीं जीतने दिया। 
अरविंद का कहना था कि इलाके में भाजपा का इतना वर्चस्व है कि आप कल्पना नहीं कर सकते इसके बाद भी हम जीते हैं। हमने सबको बता दिया है कि आदिवासी समाज ज़िंदा समाज है और अब वह स्थापित दलों के खेल को समझ गया है। हमारे वोट बैंक का इस्तमाल बहुत हो चुका है। अब हम अपने वो का इस्तमाल अपने लिए करेंगे। जयस के ज़्यादातर उम्मीदवार पहली पीढ़ी के नेता हैं। इनके माता पिता अत्यंत निम्न आर्थिक श्रेणी से आते हैं। कुछ के सरकारी नौकरियों में हैं। 
धर्मपुरी कालेज के अध्यक्ष का चुनाव जीतने वाले प्यार सिंह कामर्स के छात्र हैं। कालेजों में आदिवासी छात्रों की स्कालरशिप कभी मिलती है कभी नहीं मिलती है। जो छात्र बाहर से आकर किराये के घर में रहते हैं उनका किराया कालेज को देना होता है मगर छात्र इतने साधारण पृष्ठभूमि के होते हैं कि इन्हें पता ही नहीं होता कि किराये के लिए आवेदन कैसे करें। कई बार कालेज आवेदन करने के बाद भी किराया नहीं देता है। आदिवासी इलाके के हर कालेज में 80 से 90 फीसदी आदिवासी छात्र हैं। इनका यही नारा है जब संख्या हमारी है तो प्रतिनिधित्व भी हमारा होना चाहिए।
जयस आदिवासी क्षेत्रों के लिए एक बुनियादी और सैद्दांतिक लड़ाई लड़ रहा है। डॉ हीरा लाल का कहना है कि कश्मीर की तरह संविधान ने भारत के दस राज्यों के आदिवासी बहुल क्षेत्रों और राज्यों के लिए पांचवी अनुसूचि के तहत कई अधिकार दिए हैं। उन अधिकारों को कुचला जा रहा है। पांचवी अनुसूचि की धारा 244(1) के तहत आदिवासियों को विशेषाधिकार दिए गए हैं। 
आदिवासी अपने अनुसार ही पांचवी अनुसूची के क्षेत्रों में योजना बनवा सकते हैं। इसके लिए ट्राइबल एडवाइज़री काउंसिल होती है जिसमें आदिवासी विधायक और सांसद होते हैं। राज्यपाल इस काउंसिल के ज़रिए राष्ट्रपति को रिपोर्ट करते हैं कि आदिवासी इलाके में सही काम हो रहा है या नहीं। मगर डाक्टर हीरा लाल ने कहा कि ज़्यादातर ट्राइबल एडवाइज़री काउंसिल का मुखिया आदिवासी नहीं हैं। हर जगह ग़ैर आदिवासी मुख्यमंत्री इसके अध्यक्ष हो गए हैं क्योंकि मुख्यमंत्रियों ने खुद को इस काउंसिल का अध्यक्ष बनवा लिया है।  
डॉ हीरा लाल और उनके सहयोगियों से बात कर रहा था। फोन पर हर दूसरी लाइन में पांचवी अनुसूचि का ज़िक्र सुनाई दे रहा था। नौजवानों का यह नया जत्था अपने मुद्दे और ख़ुद को संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार परिभाषित कर रहा है। पांचवी अनुसूचि की लड़ाई आदिवासी क्षेत्रों को अधिकार देगी लेकिन उससे भी ज़्यादा देश को एक सशक्त नेतृत्व जिसकी वाकई बहुत ज़रूरत है।

अभी अभी रविश कुमार के इन आंकड़ों ने खोली मोदी सरकार के दावों की पोल !

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सरकार में आने के पहले वादों का और सरकार में आने के बाद दावों का सिलसिला बदस्तूर जारी है । मोदी सरकार आए दिन नए नए दावे करती है । लेकिन जब आंकड़े सामने आते है तो तस्वीर कुछ और कहती है । इसी बीच विरिष्ट पत्रकार रविश कुमार ने आयकर विभाग पर कुछ आंकड़े जारी कर एक बार फिर मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है । 
रविश का लेख

​रविवार के इंडियन एक्सप्रेस में आयकर विभाग के जारी आंकड़ों के आधार पर छपा है कि इस साल आयकर जमा करने वालों की संख्या में 25 प्रतिशत की वृद्धि तो हुई है मगर इसमें करीब 70 फीसदी सालाना पांच लाख या उससे कम आय वाले हैं। मतलब संख्या भले बढ़ी है, आयकर वसूली इस संख्या के अनुपात में नहीं बढ़ेगी। पांच लाख या उससे कम की आयकर कर देयता बहुत कम है।
1 अप्रैल 2017 से 5 अगस्त 2017 के बीच 2.83 करोड़ नए आयकर दाताओं ने टैक्स रिटर्न भरा। इनमें से 2.03 करोड़ ऐसे व्यक्ति, कंपनी या संस्थाएं हैं जिनकी आय 5 लाख या उससे कम ही है। 

अमित माहेश्वरी, माहेश्वरी एसोसिएट, का कहना है कि नए करदाताओं के अधिकांश से कोई कर नहीं मिलने वाला है। नए करदाताओं की औसत आय 2.7 लाख होती है जो 2.5 लाख तक कर माफी की सीमा से थोड़े ही ऊपर हैं। इस तबके की आमदनी बढ़ने के साथ साथ कर वसूली बढ़ सकती है। 
2016-17 में 2.27 करोड़ लोगों ने आयकर रिटर्न भरा था। इस साल 5 अगस्त तक 2.83 करोड़ लोगों ने रिटर्न भरा है। 2016-17 में 9.9 फीसदी आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या बढ़ी थी। 2017-18 में 24.7 फीसदी की दर से संख्या बढ़ी है।
5 लाख से अधिक की आमदनी वाले लोगों की संख्या भी देखिये। इस वित्त वर्ष में 76.49 लोगों ने 5 लाख से अधिक सालाना आमदनी का रिटर्न भरा है। नोटबंदी के दौरान दिए गए भाषणों में प्रधानमंत्री ने कहा था कि रिटर्न भरने वालों में सिर्फ 24 लाख लोग हैं जिनकी आमदनी 10 लाख से अधिक है। क्या ऐसा हो सकता है? इसका जवाब नहीं मिला कि नए करदाताओं में कितने नए लोग ऐसे हैं जिनकी आमदनी 10 लाख से अधिक है। इस साल अप्रैल-जुलाई के बीच प्रत्यक्ष कर संग्रह 19.2 प्रतिशत बढ़ा है। 
फरवरी महीने में बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने कहा था कि भारत में प्रत्यक्ष कर का संगर्ह ख़र्च के अनुपात में नहीं है। 76 लाख लोग 5 लाख से ऊपर की सालाना आमदनी पर आयकर भरते हैं। इनमें से 56 लाख वेतनभोगी लोग हैं। स्वरोज़गार वाले अभी भी बड़ी संख्या में कर नहीं दे रहे हैं। 
आंकड़ों के अनुसार एक अप्रैल से पांच अगस्त के बीच केवल 45,430 व्यक्तियों ने ई रिटर्न फाइल किया है, जिनकी आमदनी साल में एक करोड़ या उससे अधिक है। 2012-13 में एक करोड़ से अधिक आय वाले 5,430 लोगों ने ही ई रिटर्न भरा था। करोड़पतियों की संख्या तो बढ़ी है। मगर नीचे के स्तर पर देखिये तो आमदनी और आयकर की दूसरी तस्वीर नज़र आएगी।
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रविश कुमार ने अपने ही अंदाज में खोली नोटबंदी की पोल !

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वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार ने एक बार फिर नोटबंदी को आड़े हांथो लेते हुए मोदी सरकार पर हमला बोला है . दरअसल हाल ही में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की अध्यक्षा ने कहा है कि नोटबंदी ने भारतीय अर्थव्यस्था को धीमा कर दिया है . जिसका रविश कुमार ने अपने ही अंदाज में जवाब दिया है . रविश कुमार ने कहा है कि –

नोटबंदी के दौरान स्टेट बैंक की अध्यक्षा बोलती रहीं कि सब ठीक है। सरकार के बचाव में बैंक का बचाव भूल गईं। फिर बैंक बचाने के लिए खाता धारकों पर तरह तरह की सुविधा शुल्क थोपने लगीं । नोटबंदी के छह महीने बाद अब बोल रही है कि नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था धीमी कर दी है।अब सब कुछ अनिश्चित लग रहा है।

मेरी माने तो भारत को इससे घबराने की जरूरत नहीं है।इसके लिए करना ये होगा कि टीवी पर गाय, सेना का सम्मान, तलाक़, राष्ट्रवाद , एंटी नेशनल जैसे रोज़गार परक मुद्दे की फ्रीक्वेंसी बढ़ानी होगी। इससे भारत के बेरोज़गार भी गर्व करेंगे कि नौकरी उनके लिए जरूरी नहीं है। टीवी पर एेसे मुद्दे देखने और सोशल मीडिया पर इन मुद्दों का विस्तार प्रचार करने वालों के बीच रहने से याद भी नहीं आएगा कि रोज़गार ज़रूरी है। वैसे नोटबंदी से काला धन, नक्सलवाद और आतंकवाद समाप्त हो ही गया है।