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हां, भाजपा ने चुनाव जीतने के लिए मेरा इस्तेमाल कियाः अन्ना हजारे

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हां, भाजपा ने 2014 में मेरा इस्तेमाल किया। हर कोई जानता है कि लोकपाल के लिए मेरा आंदोलन ही था जिसने भाजपा और आम आदमी पार्टी को सत्ता में पहुंचाया। लेकिन अब मैंने उनसे सब संबंध खत्म कर दिए हैं। 30 जनवरी से अपने गांव रालेगण-सिद्धि में भूख हड़ताल पर बैठे समाजसेवी अन्ना हजारे ने मीडिया को संबोधित करते हुए बात कही। अन्ना हजारे ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार केवल देश के लोगों को गुमराह कर रही है और देश को निरंकुशता की ओर अग्रसर कर रही है। केन्द्र के साथ ही महाराष्ट्र सरकार पर भी हमला बोलते हुए अन्ना ने कहा कि भाजपा की अगुवाई वाली महाराष्ट्र सरकार पिछले चार सालों से झूठ बोल रही थी। यह झूठ कब तक जारी रहेगा? राज्य सरकार का दावा है कि मेरी 90 प्रतिशत मांगें भी गलत हैं। इस सरकार ने देश के लोगों को निराश किया है।

समाजसेवी हजारे ने आगे कहा कि वह लोग जिनको 2011 और 2014 में उनके आंदोलन को लाभ हुआ, अब उन्होने इन मांगों से मुंह मोड़ लिया और पिछले पांच वर्षों में उन्हें लागू करने के लिए कुछ नहीं किया। अन्ना ने भाजपा की तरफ इशारा करते हुए कहा कि वह कहते रहते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार के मंत्री आएंगे और मेरे साथ मुद्दों पर चर्चा करेंगे। लेकिन मैं उन्हें मना कर देता हूं क्योंकि इसेसे लोग भ्रमित होंगे। वह लोग पहले खुद निर्णय लें और मुझे लिखित रूप में सब कुछ दें क्योंकि मैने उनके आश्‍वासनों पर विश्‍वास खो दिया है।

मंत्रियों सहित मिलने पहुंचे मुख्यमंत्री फडणवीस

भूख हड़ताल पर बैठे अन्ना हजारे से मिलने मंगलवार को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह और रक्षा राज्यमंत्री सुभाष भामरे उनके गांव रालेगन सिद्धी पहुंचे। इससे पहले भी राज्य सरकार के प्रतिनिधियों के साथ अन्ना की बैठक हुई थी। हालांकि, ये दोनो मुलाकातें बेअसर नजर आईं, क्योंकि अन्ना हजारे से साफ तौर पर कहा है कि वे अपनी भूख हड़ताल फिलहाल खत्म करने वाले नहीं हैं। अन्ना के आंदोलन पर राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि केंद्र और राज्य ने हजारे की मांगों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। उनकी मांगों के अनुसार, हमने राज्य में लोकायुक्तों के कार्यान्वयन के लिए एक संयुक्त समिति नियुक्त की है। इसी प्रकार केंद्र ने भी लिखित में अपना आश्‍वासन दिया है। मुझे यकीन है कि वह महाराष्ट्र के लोगों की इच्छा का सम्मान करते हुए वे जल्द से जल्द अनशन खत्म करेंगे।

समर्थन में उतरीं शिवसेना-मनसे

इस बीच हजारे का समर्थन करते हुए शिवसेना ने कहा कि सरकार को एक बुजुर्ग इंसान के जीवन के साथ नहीं खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने एक बयान में कहा कि उपवास के बजाय, हजारे को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आंदोलन का नेतृत्व करना चाहिए और उनकी पार्टी पूरी ईमानदारी के साथ उनका समर्थन करेगी। उधर, मनसे भी हजारे के समर्थन में उतर आई है। मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने सोमवार को हजारे से मुलाकात भी की। बैठक के बाद राज ने कहा कि हजारे को अपना उपवास खत्म कर देना चाहिए और इसके बजाय भाजपा सरकार को आड़े हाथ लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैंने उनसे कहा कि इन लोगों के लिए अपनी जान जोखिम में न डालें।

अगर प्रियंका गांधी प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ बनारस से चुनाव लड़ेंगी तो क्या होगा ?

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राजनीति में प्रियंका गांधी की औपचारिक सक्रियता की घोषणा के बाद भी उनके बारे में अटकलों का दौर खत्म नहीं हुआ है। प्रियंका को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी महासचिव बनाने के अलावा उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी भी नियुक्त किया है। पूर्वांचल का प्रभार प्रियंका गांधी को देने के बाद से यह अटकल जोर पकड़ रही है कि वे लोकसभा चुनावों में वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ सकती हैं।

वाराणसी या बनारस को पूर्वांचल की राजनीति का केंद्र माना जाता है। यहां की राजनीति का असर न सिर्फ पूर्वांचल बल्कि बिहार की कुछ लोकसभा सीटों पर भी होता है। यही वजह थी कि 2014 में नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए बनारस की सीट को चुना था। पूर्वी उत्तर प्रदेश की 40 लोकसभा सीटों में से अधिकांश पर भारतीय जनता पार्टी को 2014 में कामयाबी हासिल हुई थी। भाजपा ने नरेंद्र मोदी के बनारस से लोकसभा चुनाव लड़ने को इसकी एक प्रमुख वजह के तौर पर पेश किया था।

इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्रियंका गांधी को बनारस से चुनाव लड़ाने की बात चल रही है। इस बारे में बनारस के कांग्रेस पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने भी प्रियंका गांधी से औपचारिक अपील करके उनसे इस सीट से चुनाव लड़ने का आग्रह किया है। बनारस के कुछ कांग्रेस नेताओं की मानें तो आने वाले दिनों में यहां के कुछ प्रबुद्ध लोगों और मुस्लिम समाज की ओर से भी प्रियंका गांधी से लोकसभा चुनाव लड़ने की अपील की जा सकती है।

कांग्रेस आलाकमान की ओर से अब तक ऐसा संकेत नहीं दिया गया है कि प्रियंका गांधी बनारस से चुनाव लड़ सकती हैं। लेकिन, जमीनी स्तर से जो सूचनाएं मिल रही हैं उनसे यही लगता है कि पार्टी इसकी तैयारी पूरी कर रही है कि अगर प्रियंका गांधी को चुनाव लड़ना पड़े तो उस वक्त कोई दिक्कत नहीं आए।

ऐसे में सवाल उठता है कि अगर प्रियंका गांधी वाराणसी लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ती हैं तो इसके क्या राजनीतिक मायने होंगे। इससे पूरे चुनावी परिदृश्य पर क्या असर पड़ सकता है? जो लोग बनारस से प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने की वकालत कर रहे हैं, उनका कहना है कि इससे न सिर्फ पूरे पूर्वांचल और उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर सकारात्मक असर पड़ेगा बल्कि पड़ोसी राज्यों में भी पार्टी को इससे फायदा मिलेगा।
उत्तर प्रदेश और बिहार, दोनों राज्यों में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा संकट यही है कि उसके कार्यकर्ताओं की संख्या लगातार घटी है और नतीजतन पार्टी का सांगठनिक ढांचा कमजोर हुआ है। जो लोग पार्टी में हैं भी, वे भी सिर्फ पार्टी के नाम पर चुनावी जीत हासिल करने की उम्मीद कम ही रखते हैं। स्थानीय नेताओं के मुताबिक ऐसे में प्रियंका गांधी के मैदान में उतरने की खबर भर से जमीनी कार्यकर्ताओं में उत्साह का जो माहौल बना है वह उनके वाराणसी से चुनावी मैदान में उतरने से और तेजी से बढ़ सकता है।

प्रियंका गांधी के नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी से चुनावी मैदान में उतरने का दूसरा असर यह होगा कि राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी बनाम प्रियंका गांधी का विमर्श खड़ा हो जाएगा। कांग्रेस इस विमर्श को आगे नहीं भी बढ़ाना चाहेगी तब भी यह विमर्श चल पड़ेगा। इससे भाजपा और उसके सहयोगी दलों का वह विमर्श फीका पड़ सकता है जिसमें वे 2019 के लोकसभा चुनावों को नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी करके विकल्पहीनता को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाते हुए नरेंद्र मोदी के पक्ष में गोलबंदी करना चाहते हैं। नरेंद्र मोदी के सामने प्रियंका गांधी के उतरते ही आम लोगों में चाहे-अनचाहे यह संदेश चला जाएगा कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ राहुल गांधी के अलावा प्रियंका गांधी भी एक सशक्त विकल्प हैं।

वाराणसी से नरेंद्र मोदी के खिलाफ प्रियंका गांधी के चुनाव में उतरने का एक असर यह भी हो सकता है कि मोदी को वाराणसी में ही उलझाकर रखने के मकसद से सपा-बसपा गठबंधन इस सीट पर अपना उम्मीदवार न उतारे। पहले भी इस गठबंधन ने राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी में और सोनिया गांधी के खिलाफ रायबरेली में उम्मीदवार न उतारने की घोषणा कर दी है। ऐसे में अगर प्रियंका बनारस से चुनाव लड़ती हैं और सपा-बसपा अपना उम्मीदवार नहीं उतारते हैं तो नरेंद्र मोदी के लिए यह सीट आसान नहीं रहेगी। तब नतीजा किसी भी ओर जा सकता है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो प्रियंका गांधी अगर बनारस से लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के खिलाफ उतरती हैं तो इससे न सिर्फ इस सीट पर रोचक चुनावी संघर्ष देखने को मिलेगा, बल्कि इसका असर पूरे उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा।

(सत्याग्रह के लिए हिमांशु शेखर द्वारा लिखे गए आलेख के संपादित अंश साभार)

लोकसभा चुनाव के पहले दिल्ली के जंतर-मंतर पर किसान करने जा रहे बड़ा प्रदर्शन

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मोदी सरकार द्वारा किसानों को रिझाने के हर प्रयास फेल होते नजर आ रहे हैं। जिसके कारण किसानों का मोदी सरकार के प्रति आक्रोश भी लगातार बढ़ता जा रहा है। अंतरिम बजट के सहारे मोदी सरकार ने किसानों को रिझाने का एक अंतिम प्रयास भी कर लिया है लेकिन इसका भी कोई खास असर होता नही दिख़ रहा है। सरकार से नाराज किसान अब अपने जमीन अधिग्रहण में उचित मुआवजे की मांग को लेकर दिल्ली में कूच करने जा रहे हैं। वह 7 फरवरी तक जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करेंगे।

किसानों के आंदोलन को देखते हुए शुक्रवार को नोएडा और ग़ाजियबाद को दिल्ली से जोडऩे वाले डीएनडी फ्लाईवे को कुछ देर के लिए बंद करना पड़ा। सहायक पुलिस अधीक्षक डॉक्टर कौस्तुभ ने बताया कि अलीगढ़, आगरा, हाथरस, बुलंदशहर गौतम बुद्ध नगर आदि जगहों के किसान प्रधानमंत्री आवास का घेराव करने के लिए डीएनडी के रास्ते दिल्ली जा रहे थे। दिल्ली पुलिस ने उन्हें डीएनडी पर रोक दिया जिससे दिल्ली व नोएडा में जगह-जगह जाम लग गया।

शुक्रवार की शाम को दिल्ली-नोएडा फ्लाईवे पर किसानों ने जाम लगा दिया। किसानों की मांग है कि सरकार 2013 में पारित भूमि अधिग्रहण विधेयक के तहत भूमि ले। डीएनडी पर जाम होने की वजह से लोगों ने दूसरा रास्ता अपनाया जिससे अन्य रास्तों में भी जाम लग गया। बढ़ती भीड़ के चलते तात्कालिक रूप से रास्तों को डायवर्ट भी किया गया और यात्रा परामर्श भी जारी किया गया।

लोकसभा चुनाव : मोदी और भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बनीं यह तीन महिलाएं

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Priyanka gandhi Mayawati and mamata banerjee

लोकसभा चुनाव को लेकर मोसम जमने लगा है। वार- जलटवार और आरोप- प्रत्यारोप का सिलसिला भी शुरु हो चुका है। भाजपा अपना लोकसभा चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के चहरे पर लड़ने वाली है तो वही विपक्ष संगठित रूप से चुनाव में उतरने वाला है। 2014 के चुनाव में भाजपी की जीत के पीछे महंगाई जैसे मुद्दे पर महिलाओं का समर्थन की अहम भूमिका थी। इस चुनाव में जहां विपक्ष के पास कई बड़े मिहिला चहरे हैं तो वहीं भाजपा के पास महिला चहरों की कमी दिखाई देगी। भाजपा के पास जो लोकप्रीय और आक्रमक महिला नेता 2014 में थी, वह या तो इस लोकसभा चुनाव में उतरेंगी नही या फिर उनका प्रभाव पिछली बार की तरह नही होगा। सुषमा स्वराज पहले ही अगला चुनाव लड़ने से इंकार कर चुकी है तो स्मृती इरानी पिछला चुनाव हार चुकी है। वहीं उमा भारती का कद भी अब पहले जितना नही रहा। ऐसे में जब चुनाव अभीयान के दौरान विपक्ष की महिला नेता जब प्रधानमंत्री और भाजपा पर सीधा हमला बोलेंगी तो भाजपा को मजबूत और लोकप्रीय महिला नेताओं की कमी जरूर खलेगी।

वहीं विपक्ष की बात करें तो प्रियंका की एंट्री ने कांग्रेस को नई जान दे दी है। राहुल ने भी प्रियंका गांधी को राष्ट्रीय महासचिव बनाकर और महत्वपूर्ण पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी देकर अपने इरादे साफ कर दिया हैं। उधर दो अन्य दिग्गज महिला नेता भी इस चुनाव में भाजपा को चुनौती देने को तैयार हैं। ये हैं पश्‍चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी चीफ ममता बनर्जी और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती। ये दोनों नेका मोदी और एनडीए गठबंधन को सत्ता से हटाने के लिए एकजुट होते दिख रहे हैं, हालांकि अभी कोई औपचारिक ऐलान होना बाकी है।

बीजेपी छोड़ चुके वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा कहते हैं कि विपक्ष के पास बीजेपी से ज्यादा मजबूत महिला नेतृत्व है। जनता अगले आम चुनाव में इस नेतृत्व को वोट करेगी और खासतौर पर महिलाओं का समर्थन मिलेगा। बीजेपी के लिए यह परेशान होने का वक्त है, खासतौर पर तीन हिंदीभाषी राज्यों के विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद।

प्रियंका की राजनीति में औपचारिक एंट्री पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जमकर जश्‍न मानाया था। तमाम वरिष्ठ नेताओं ने इसे स्वागतयोग्य फैसला बताया है। हालांकि मायावती और ममता के पास प्रियंका से कहीं ज्यादा अनुभव है और माना जा रहा है कि दोनों अगले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद का चेहरा हो सकती हैं।

मायावती ने जहां उत्तर प्रदेश में अपने सबसे बड़े विरोधी दल समाजवादी पार्टी से पुरानी ’दुश्मनी’ भुलाकर गठबंधन किया, वहीं दूसरी ओर ममता ने पिछले महीने ही कोलकाता में संयुक्त विपक्ष रैली का आयोजन किया था। जिसमें लगभग सभी बड़े विपक्षी दलों के नेता या उनके प्रतिनिधि पहुंचे थे। हालांकि ममता की इस रैली में खुद बीएसपी सुप्रीमो मायावती के ना आने और अपनी जगह अपने प्रतिनिधि सतीश चंद्र मिश्रा को भेजने पर कई तरह के कयास भी लगे।

महिलाओं के लिए मोदी सरकार मे शुरु की कई योजनाएं लोकिन महंगाई पर नही कर पाए काबू
कई ऐसी महिलाओं के हित की योजनाएं हैं जो मोदी सरकार ने ही शुरू कीं। मोदी सरकार ने ’बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का नारा दिया, उज्ज्वला योजना के जरिए ऐसे करोड़ों घरों में मुफ्त गैस कनेक्शन पहुंचाए जहां आज तक महिलाएं चूल्हे पर खाना पकाती थीं। इसके अलावा स्वच्छ भारत मिशन के तहत बने लाखों शौचालयों से भी सबसे ज्यादा महिलाओं को ही लाभ हुआ है। इस सभी योजनाओं के बावजूद मोदी सरकार महंगाई को काबू करने में पूरी तरह से नाकामयाब रही। मोदी की 26 सदस्यीय कैबिनेट में छह महिलाएं हैं और सबसे महत्वपूर्ण पांच सदस्यीय कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी में भी दो महिलाएं (विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण) हैं।

कांग्रेस परिवार के करीबी नेताओं की मानें तो प्रियंका महिलाओं, युवाओं और फर्स्ट टाइम वोटर्स को लुभा सकती हैं। प्रियंका की औपचारिक एंट्री भले ही 2019 में हुई हो, लेकिन वह पिछले करीब 20 सालों से अपने भाई राहुल गांधी और मां सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्रों अमेठी और रायबरेली में चुनाव प्रचार के दौरान अहम भूमिका निभाती आई हैं।

बीएसपी प्रवक्ता सुधींद्र भदौरिया ने कहा कि मायावती का महिला होना कभी उनकी नेतृत्व क्षमता के आड़े नहीं आया। उन्होंने कहा, ’मायावती ने पार्टी को जमीन से उठाकर इस मुकाम तक पहुंचाया है। महत्वपूर्ण बात है कि उन्होंने महिलाओं, दलितों, पिछड़ी जातियों को एकजुट किया है। वह एक राष्ट्रीय नेता हैं।’ ममता बनर्जी वही नेता हैं, जिन्होंने 34 साल पुरानी वामपंथी सरकार को 2011 के विधानसभा चुनाव में पश्‍चिम बंगाल से उखाड़ फेंका था। वह अपनी सादगी और तेज-तर्रार राजनीतिक लहजे से अलग पहचान बनाती हैं। वह अकसर बीजेपी पर सांप्रदायिकता का आरोप लगाकर देश में एक सेक्युलर सरकार की जरूरत पर जोर देती रहती हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री गौर को एक बार फिर मिला कांग्रेस में शामिल होने का ऑफर

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लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी और कांग्रेस में गौर को लेकर घमासान जारी है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के ऑफर को ठुकराने के बाद गौर को फिर एक बार कांग्रेस से चुनाव लड़ने का ऑफर मिला है। इस बार केबीनेट मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने गौर को कांग्रेस में शामिल होने का खुला न्यौता दिया है। वर्मा ने गौर को भोपाल सीट से चुनाव लड़ने का ऑफर दिया। सज्जन ने कहा है कि कांग्रेस पार्टी बाबूलाल गौर का हमेशा से सम्मान करती आई है और उनको उसी पार्टी से चुनाव लड़ना चाहिए जहां सम्मान मिलता हो।

बता दें कि इससे पहले दिग्विजय सिंह ने बाबूलाल गौर को कांग्रेस की टिकट पर भोपाल लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का अॉफर दिया था। जिस पर पहले गौर ने विचार करने की बात कही थी और बाद में प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह की नसीहत के बाद उन्होने सिंह का अॉफर ठुकरा दिया था।

हांलाकि गौर ने कांग्रेस का अॉफर ठुकराने के साथ ही भाजपा पर हमला बोलते हुए कहा था कि भाजपा में अब वरिष्ठ नेताओं की इज्जत नही है।

जानें आखिर क्यों प्रियंका गांधी को मिली सिर्फ पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी ?

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सक्रिय राजनीती में प्रियंका गाँधी के प्रवेश के बाद उत्तरप्रदेश के साथ ही देश की राजनीती का परिदृश्य तीजी से बदल रहा है। प्रियंका के आने से जहां कांग्रेस के हौसले बुलंद है तो वहीं भाजपा के साथ ही सपा-बसपा गठबंधन भी अब कांग्रेस के इस मास्टर स्ट्रोक के जवाब तलाश करने में लग गए हैं। ऐसे में एक सवाल सबके अंदर उठ रहा है कि आखिर प्रियंका को देश और उत्तर प्रदेश की जगह पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित क्यों रखा गया।

लोग एक सवाल और पूछ रहे हैं कि अगर प्रियंका को सियासत में आना ही था तो कांग्रेस ने माहौल क्यों नहीं बनाया? जिसे गांधी परिवार का सबसे बड़ा गेमचेंजर माना जा रहा था, उसकी सियासी एंट्री की घोषणा एक पन्ने की प्रेस विज्ञप्ति से हुई और उस पन्ने पर भी केसी वेणुगोपाल को संगठन महासचिव बनाने को ज्यादा प्रमुखता दी गई थी।

उस दिन राहुल गांधी अपने हर भाषण में ऐसे बोलते रहे जैसे प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया का कद कांग्रेस में बराबर हो। पार्टी के एक बुजुर्ग नेता प्रियंका की टाइमिंग पर नहीं कांग्रेस के रवैये पर शक जताते हुए पूछते हैं कि सबसे बड़ा धमाका करने से पहले पार्टी थोड़ी तैयारी करती तो अच्छा होता। संजय गांधी को महासचिव बनाने से पहले भी माहौल बनाया गया था। उनके निधन के बाद राजीव सियासत में आए तो माहौल गमगीन था फिर भी मीडिया को खबर दी गई थी। जब राहुल गांधी पहले महासचिव और फिर अध्यक्ष बनाए गए तो उनको भी तरजीह मिली। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी गांधी के नाम का एलान प्रेस विज्ञप्ति में पांचवी लाइन में किया गया है।

कांग्रेस की मीडिया टीम से जुड़े एक नेता एक अजीब ही बात कहते हैं – ‘पिछले कुछ दिनों में अचानक एक परिवर्तन तेजी से हुआ है। अगर प्रियंका गांधी को ताकतवर बनाना ही था तो उनकी टीम क्यों कमजोर की जा रही है। कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला प्रियंका गांधी के बेहद खास माने जाते हैं। लेकिन इधर प्रियंका गांधी के नाम का ऐलान हुआ है और उधर वे हरियाणा के जिंद से विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। जबकि वे पहले से ही विधायक थे। कांग्रेस में कोई तो ऐसा है जो नहीं चाहता कि प्रियंका गांधी पावरफुल हो जाएं।’

भाजपा के नेताओं के पास जब बुधवार की दोपहर खबर पहुंची कि प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है तो उसके भी बड़े-बड़े नेता चौंक गए। एक नेता ने हैरान होते हुए अपने एक करीबी से कहा – ‘कांग्रेस की यही समस्या है। या तो ये बिना ज्यादा सोचे-समझे लिया गया फैसला है या फिर कुछ ज्यादा ही सोचा गया है। अगर प्रियंका गांधी को सियासत में लाना ही था तो उत्तर प्रदेश के एक इलाकाई नेता की तरह क्यों लाए। कम से कम पूरे उत्तर प्रदेश का इंचार्ज बनाते। प्रेस विज्ञप्ति में ये लिखने की क्या जरूरत थी कि प्रियंका सिर्फ पूर्वी उत्तर प्रदेश ही देखेंगी।

प्रियंका गांधी कहां से चुनाव लड़ेंगी इस पर भी सस्पेंस कायम है। कांग्रेस के ताकतवर नेताओं से जब इस बारे में जानना चाहा तो पता चला कि राहुल गांधी रायबरेली जा सकते हैं और प्रियंका गांधी अमेठी से चुनाव लड़ सकती हैं। वैसे प्रियंका की टीम बताती है कि मैडम अभी चुनाव नहीं लड़ना चाहतीं। वे पूरी तरह पूर्वांचल पर फोकस करना चाहती हैं।

उत्तर प्रदेश के कम से कम आधे दर्जन ऐसे नेता हैं जो अपने ड्राइंग रूम में बरसों से सोनिया और राहुल के साथ प्रियंका गांधी की तस्वीर लगाये बैठे थे। इनमें से कई नेता प्रियंका के सक्रिय राजनीति में इस तरह से आने से उतने हैरान-परेशान नहीं हैं। इन्हें लगता है कि 1984 के बाद से पूर्वी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस धीरे-धीरे कमजोर होती गई है। लेकिन अगर प्रियंका ने वहां अपनी पूरी ताकत झोंक दी तो उसे ज़िंदा किया जा सकता है।

प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ-साथ अवध की भी जिम्मेदारी मिली है मतलब कि कुल मिलाकर 42 सीटें उनके पास हैं। 2014 में कांग्रेस इनमें से सिर्फ दो सीटें – अमेठी और रायबरेली ही – जीत पाई थी। लेकिन 2009 में उसे इनमें से 15 सीटें मिली थीं। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को पूर्वी उत्तर प्रदेश और अवध में 10 फीसदी वोट मिले थे, जबकि पश्चिम उत्तर प्रदेश में उसे सिर्फ पांच फीसदी वोटों से ही संतोष करना पड़ा था। अगर इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो प्रियंका गांधी को पूर्वांचल में सोच-समझकर लाया गया है। यहां की 42 में से 40 सीटें कांग्रेस के पास नहीं है लेकिन उसका पुराना वोट बैंक पूरी तरह खिसका नहीं है। 2009 में उसके इसी वोट बैंक ने चमत्कार करते हुए उसे 15 सीटें दिलवाई थीं।

कांग्रेस के पूर्वांचल के एक नेता कहते हैं प्रियंका गांधी के सियासत में आने का एलान भले ही धमाकेदार ना हुआ हो लेकिन लखनऊ में दस फरवरी को होने वाली रैली धमाका करेगी। प्रियंका की बड़े पर्दे पर एंट्री उसी दिन समझिए। अब तक कांग्रेस के कार्यकर्ता में ना जोश था, ना चुनाव जीतने का यकीन। 2017 के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी के नाम पर वोट मांग चुके हैं और हार भी चुके हैं। इस बार कुछ नया और अलग कहने को है। कांग्रेस के दफ्तर की खबर रखने वाले एक पत्रकार बताते हैं कि अगर 2014 में अमित शाह उत्तर प्रदेश की 80 में से 73 सीटें जीतने का फॉर्मूला गढ़ सकते हैं तो प्रियंका गांधी भी ऐसा कर ही सकती हैं। इस बार आर या पार होगा। गांधी परिवार ने बंद मुट्ठी खोल दी है। अब ये मुट्ठी लाख की होगी या खाक की, उत्तर प्रदेश का वोटर तय करेगा। अगर राहुल गांधी की किस्मत में प्रधानमंत्री बनना लिखा है तो 2019 से बेहतर मौका नहीं मिलेगा और प्रियंका से बढ़िया कोई और नहीं जो कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश जीत सके।

इसीलिए पूरे देश में राहुल गांधी घूमेंगे और उत्तर प्रदेश – बल्कि उस पूर्वांचल को जहां से कांग्रेस को जीतने की सबसे ज्यादा उम्मीद है – प्रियंका गांधी संभालेंगी। राहुल गांधी ने अमेठी में अपने वोटरों से भी कुछ इसी अंदाज़ में कहा कि अब वे अमेठी कम ही आएंगे क्योंकि उन्हें बाकी जगहों पर भी ध्यान देना है। प्रियंका उत्तर प्रदेश में ही रहेंगी क्योंकि वे बाकी देश में अभी नहीं जाएंगी।

राहुल गांधी का मध्यप्रदेश दौरा, सरकार नही पार्टी उठाएगी खर्च।

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मध्यप्रदेश की जमीन से प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा पर जोरदार हमला करने की तैयारी में है। कांग्रेस इसके लिए भोपाल में किसान महासम्मेलन का आयोजन कर रही है। जिसमें प्रदेश भर से लाखों किसान शामिल होंगे। भोपाल के जम्बूरी मैदान में 12 फरवरी को आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम का खर्चा पहले मध्यप्रदेश सरकार उठाने वाली थी लेकिन मुख्यमंत्री कमलनाथ ने फैसला किया की इस सम्मेलन का खर्चा सरकार नही बल्कि पार्टी उठाएगी। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद पार्टी के प्रदेश पदाधिकारी कार्यक्रम की तैयारियों में जुट गए है।

सूत्रों के अनुसार राहुल गांधी के इस कार्यक्रम में मोदी सरकार और भाजपा पर जमकर हमला बोला जाएगा। ऐसे में अगर इस आयोजन को मध्यप्रदेश सरकार द्वारा किया जाता है तो कार्यक्रम में मौजूद सरकारी अफसर अपने आप को असहज महसूस करेंगे। जिसको देखते हुए मुख्यमंत्री और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने यह निर्णय लिया है।

किसान महासम्मेलन से शुरू होगा मिशन लोकसभा

मध्यप्रदेश कांग्रेस द्वारा आयोजित किसान सम्मेलन में पार्टी लाखों किसानों को एकजुट करने की रणनीति पर काम कर रही है। राहुल गांधी के साथ ही मुख्यमंत्री कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया भी इस सम्मेलन को संबोधित करेंगे। सम्मेलन किसानों की कार्यमाफी का फायदा कांग्रेस उठाना चाहेगी।

कांग्रेस ने पास किया प्रस्ताव, इस लोकसभा सीट से चुनाव लड़ेंगी प्रियंका गांधी !

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प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में उतारने के बाद से ही प्रियंका के लोकसभा चुनाव लड़ने को लेकर अटकलों का दौर शुरू हो गया है। कभी उत्तरप्रदेश की राजबरेली, कभी अमेठी तो कभी बनारस से प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने की खबरें मीडिया में आई।

वहीं भोपाल लोकसभा सीट और मुम्बई सेंट्रल सीट से प्रियंका गांधी को चुनाव लड़वाने की मांग भी स्थानीय नेताओं ने पार्टी आलाकमान से की।

ऐसे में अब पंजाब की फ़िरोज़पुर कमेटी ने तो बाकायदा सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास करके प्रियंका गांधी को फिरोजाबाद लोकसभा सीट से चुनावी मैदान में उतारने की मांग की है। फिरोजपुर कांग्रेस कमेटी की ओर से विधायक परमिंदर सिंह पिंकी ने बताया कि कांग्रेस के तमाम नेताओं ने सर्वसम्मति से ये प्रस्ताव पास करके सोनिया गांधी और राहुल गांधी को भेज दिया है। अब प्रियंका गांधी को तय करना है कि उन्हें चुनाव कहां से लड़ना है लेकिन फिरोजपुर कांग्रेस के नेता चाहते हैं कि वह फिरोजपुर से चुनाव लड़ें।

गौरतलब है कि पूर्वी यूपी की कमान थामने के बाद से प्रियंका गांधी वाड्रा को अपने क्षेत्र से चुनाव लड़वाने के लिए लगातार मांगें उठ रही हैं। हाल ही में महाराष्‍ट्र के मुंबई सेंट्रल सीट से भी प्रियंका गांधी को खड़ा करने की मांग की गई थी। कांग्रेस विधायक और पूर्व मंत्री नसीम खान ने इसके लिए प्रस्‍ताव पास करने की बात कही। इससे पहले उत्‍तर प्रदेश के ही कई जिलों से प्रियंका को बतौर उम्‍मीदवार उतारने की मांग की गई है।

लोकसभा चुनाव को लेकर राहुल ने की बड़ी घोषणा, सत्ता में आए तो हर गरीब को मिलेगी न्यूनतम आय

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राहुल गांधी की फ़ाइल फ़ोटो

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सोमवार को छत्तीसगढ़ में वादा किया कि यदि 2019 में कांग्रेस सत्ता में आई तो देश में हर एक गरीब को न्यूनतम आय की गारंटी दी जाएगी। नया रायपुर में किसान रैली को संबोधित करते हुए राहुल ने कहा कि जैसे कांग्रेस पार्टी ने मनरेगा में 100 दिन का रोजगार गारंटी करके दिया, सूचना के अधिकार में गारंटी से ब्यूरोक्रेसी के दरवाजे खोले, भोजन का अधिकार गारंटी करके दिया, वैसे ही न्यूनतम आमदनी की गारंटी होगी। राहुल ने कहा कि यह ऐतिहासिक कदम है और इससे गरीबी और भुखमरी को खत्म करने में मदद मिलेगी। राहुल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि पीएम मोदी और भाजपा दो भारत बनाना चाहते हैं। एक राफेल घोटाला और उद्योगपति मित्रों का और दूसरा गरीब किसानों का। फसल बीमा योजना पर सवाल उठाते हुए राहुल ने कहा कि क्या कारण है कि किसान अपना पैसा बीमा कंपनी को देता है और ओला पड़ने पर किसान को उसका पैसा नहीं मिलता है। पूरा फायदा अनिल अंबानी की कंपनी को जाता है।

कर्जमाफी योजना का जिक्र करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि जब हम विपक्ष में थे, तब भी हम किसानों का कर्ज माफ करने की बात करते थे और सरकार में पूछते थे तो सरकार कहती थी कि हमारे पास पैसा नहीं है और हम ये काम नहीं कर सकते। हिंदुस्तान के चौकीदार के पास छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए 6000 करोड़ रुपए नहीं हैं लेकिन अनिल अंबानी के लिए 30,000 करोड़ रुपए हैं।

कांग्रेस की सरकारों ने देश से ‘गरीबों’ को हटाया: जावड़ेकर

राहुल गांधी के दावे को लेकर केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने पटलवार किया है। जावड़ेकर ने कहा कि गरीबी कम करने की दिशा में मोदी सरकार की योजनाएं कारगर साबित हो रही हैं। उन्होंने दावा किया कि प्रसिद्ध संस्था वर्ल्ड डाटा लैब के निष्कर्षों को पूरी दुनिया मानती है और इस संस्था ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में अत्यधिक गरीबी तेजी से कम हो रही है। जावड़ेकर ने जोर दिया कि 2012 में ग्रामीण भारत में 14 प्रतिशत लोग अत्यधिक गरीबी की रेखा के नीचे थे और अब यह संख्या 4 प्रतिशत हो गई हैं। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कांग्रेस की सरकारों ने देश से गरीबों को हटाया जबकि प्रधानमंत्री मोदी देश से गरीबी हटाने का काम कर रहें हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस कभी मुख्यधारा की पार्टी हुआ करती थी लेकिन वह अब संकीर्ण पार्टी बन कर रह गई है। जावड़ेकर ने कहा कि कांग्रेस के दो मित्र और हित चिंतक अखिलेश यादव और मायावती अब कांग्रेस को चुनावी पार्टनर बनाने योग्य भी नहीं समझ रहे हैं। और सपा-बसपा ने उत्तरप्रदेश में मां-बेटे (सोनिया और राहुल गांधी) के लिए ही दो सीटें छोड़ी हैं।

क्या है न्यूनतम आय की गारंटी ?

न्यूनतम आय की गारंटी एक तरह से ‘यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम’ ही है। इसके तहत सरकार देश के गरीबों को बिना शर्त एक तय रकम देती है। इसका मतलब यह हुआ कि अगर यह योजना लागू होती है तो सरकार को देश के हर गरीब नागरिक को एक निश्‍चित रकम एक निश्‍चित अंतराल पर देनी होगी। हालांकि, इस स्कीम के तहत ‘गरीब’ की परिभाषा क्या होगी, यह सरकार ही तय करेगी।

ब्राजील, कनाड़ा जैसे कई देशों ने लागू की थी न्यूनतम आय योजना

न्यूनतम आय की योजना कई देशों ने भी अपनाई है, जिनमें अमेरिका, ब्राजिल, कनाडा, डेनमार्क, जर्मनी, स्पेन सहित करीब 21 देश शामिल है। 2004 में ब्राजील सरकार ने न्यूनतम आय की योजना को स्वीकारा था। इसके तहत, गरीब परिवारों को सरकार ने डेबिट कार्ड के माध्यम से लाभार्थियों को न्यूनतम आय पहुंचाई थी, लेकिन सरकार ने इस योजना के लाभार्थियों के सामने अपने बच्चों को स्कूल में दाखिला कराने और टीकाकरण कराने की शर्त रखी थी। यदि लाभार्थी इन शर्तो कों पूरा नहीं करते है तो उन्हें न्यूनतम आय योजना से बाहर रखा जाता था। साल 2011 तक लगभग पांच करोड़ लोग इस योजना का लाभ ले चुके थे। ब्राजील में न्यूनतम आय की नीति सफल रही थी। इसके विपरीत कनाडा सरकार ने इस नीति को दो बार लागू किया था और दोनों बार कनाडा सरकार विफल हुई थी। साल 1970 में कनाडा सरकार ने गरीब परिवारों को नकदी राशि देकर गरीबी मिटाने की नाकाम कोशिश की थी लेकिन बजट की कमी के कारण यह नीति सरकार की विफलताओं में गिना गई। आखिरकार सरकार ने इस योजना को बंद कर दिया। इसके बाद 2017 में भी कनाडा सरकार ने सालाना 10 हजार डॉलर यानी करीब 7 लाख रुपए से कम आय वाले परिवार को न्यूनतम आय देने की बात की थी लेकिन अगस्त 2018 में इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया गया। इसके अलावा और भी देशों में यह योजना जनसंख्या या बजट को ध्यान में रखते हुए बंद कर दी गई।

कांग्रेस का बड़ा एलान, 2019 में सरकार बनी तो देश के सभी किसानों का कर्जा होगा माफ

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कांग्रेस पार्टी ने गुरुवार को लोकसभा चुनाव को लेकर बड़ा एलान करते हुए कहा कि अगर कांग्रेस पार्टी 2019 में जीत दर्ज करके सरकार बनाती है तो देश के सभी किसानों का सारा कर्जा माफ करने का काम करेगी। यह एलान उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष राज बब्बर ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस के पिछड़ा वर्ग विभाग का सम्मेलन में किया। इस अवसर पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर ने कहा, प्रदेश का किसान, कारीगर और बुनकर समाज कांग्रेस के झंडे के साथ आ रहा है। खुद को पिछड़े वर्ग का बताने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ओबीसी समाज को केवल ठगा है। उनकी समस्याओं का कोई समाधान नहीं किया है।

राज बब्बर ने आगे कहा कि अभी जहां कांग्रेस की सरकारें हैं, उन राज्यों में किसानों का कर्जा माफ किया गया है। कांग्रेस यह वादा करती है कि 2019 में जब कांग्रेस की सरकार बनेगी तो फिर एक बार पूरे देश के किसानों का कर्जा माफ किया जाएगा।

वहीं इस मौके पर पिछड़ा वर्ग विभाग के राष्ट्रीय को-ऑर्डिनेटर और प्रदेश प्रभारी अनिल सैनी ने कहा कि पिछड़ा वर्ग की आबादी प्रदेश में 54 प्रतिशत से ज्यादा है, लेकिन उन्हें शासन-सत्ता और प्रशासन में उनकी आबादी के आधार पर प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछड़े वर्ग के समाज पर भरोसा जताया है और आश्वस्त किया है कि पदाधिकारियों की नियुक्ति और टिकट वितरण पर पिछड़ा वर्ग का पूरा ख्याल रखा जाएगा। कांग्रेस लोकसभा चुनाव के लिए घोषणा पत्र तैयार कर रही है। इसमें पिछड़ा वर्ग के लिए काफी कुछ होगा।

एसपी छोड़ कांग्रेस में हुए शामिल


कांग्रेस पिछड़ा वर्ग के नेता एकेश लोधी ने इस दौरान कई नेताओं की जॉइनिंग कराई। एसपी छोड़कर कांग्रेस में आने वालों में प्रवेश राजपूत, प्रभुदयाल कठेरिया, विनोद राजपूत, योगेश राजपूत, ओंकार सिंह, प्रमोद महाजन, योगेश प्रताप सिंह, केशव सिंह, जसराम सिंह समेत अन्य लोग थे।