शुक्रवार को भाजपा ने मिजोरम विधानसभा चुनाव को लेकर दूसरी सूची जारी कर दी है। जिसमें 24 प्रत्याशियों के नाम शामिल हैं। 20 अक्टूबर को भाजपा ने पहली सूची में 13 प्रत्याशियों के नाम की घोषणा की थी। मिजोरम की 40 विधानसभा सीटों पर 28 नवंबर को चुनाव होने हैं, जिसके परिणाम 11 दिसंबर को आने हैं।
मिजोरम : अधिसूचना जारी – 02 नवंबर 2018 नामांकन की आखिरी तारीख- 09 नवंबर 2018 नामांकन की जांच- 12 नवंबर 2018 नामांकन वापस लेना का आखिरी तारीख- 14 नवंबर 2018 मतदान की तारीख- 28 नवंबर 2018 नतीजे आयंगे- 11 दिसंबर 2018
पूर्वोत्तर में कांग्रेस के आख़िरी किले में अगले महीने विधानसभा चुनाव होने है। अमित शाह समेत भाजपा के कई वरिष्ठ नेता मिज़ोरम का दौरा कर रहे है। भाजपा यहाँ नरेन्द्र मोदी की योजनाओं के सहारे मैदान में उतर रही है। पिछले चुनाव में सभी सीटों पर जमानत जब्त होने के बाद भी भाजपा इस चुनाव में आत्मविश्वास से भरी हुई है। आत्मविश्वास इतना कि पहली बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और अमित शाह सभी 40 सीटें जीतने की बात कर रहे है। भाजपा यह सब जितना आसान दिखा रही है उतना आसान यह है नही। कांग्रेस पिछले 10 सालों से मिज़ोरम की सत्ता में है। 4 विधायकों के पार्टी छोड़ने के बाद भी कांग्रेस के पास 30 विधायक है। दरअसल भाजपा मिज़ोरम में जीतने और सरकार बनाने के लिए नही बल्कि और कांग्रेस को हराने और खाता खोलकर मिज़ो नेशनल फ्रंट के साथ मिज़ोरम की राजनीति में एंट्री मारना चाहती है।
मिज़ोरम में पिछले विधानसभा चुनाव में नोटा से भी कम वोट पाने वाली भाजपा इस विधानसभा चुनाव में पहली बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन के संस्थापक और बीजेपी नेता हिमंता बिस्वा ने कहा है की पार्टी मिज़ोरम विधानसभा चुनाव जीतेगी और पूर्ण बहुमत से सरकार बनाएगी। वहीं कुछ दिनों पहले मिज़ोरम में पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद करके आए अमित शाह ने दावा किया था की पार्टी इस बार मिज़ोरम में सभी 40 सीटों पर जीत दर्ज करेगी।
मिज़ोरम में भाजपा अब तक 5 विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है। 1993 में 8, 98 में 12, 2003 में 8, 2008 में 9 और 2013 में 17 सीटों पर भाजपा ने चुनाव लड़ा था। 5 विधानसभा चुनाव लड़ने के बाद भी भाजपा अब तक मिज़ोरम में अपना खाता तक नही खोल पाई है। पिछले विधानसभा चुनाव में 17 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा की सभी 17 सीटों पर जमानत जब्त हो गयी थी। उस चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 1 से भी कम, 37% था। जो की नोटा से भी कम था। ऐसे में अगर हेमंत बिसवा पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने और अमित शाह सभी 40 सीटें जीतने का दावा करते है तो प्रश्न उठता है कि यह भाजपा का आत्मविश्वास है या फिर सिर्फ राजनैतिक जुमला है ?
कांग्रेस मुक्त पूर्वोत्तर
केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद कांग्रेस धीरे-धीरे पूर्वोत्तर से साफ़ होती जा रही है। अब सिर्फ मिज़ोरम में ही कांग्रेस की सरकार है। दरअसल मई 2016 में भाजपा ने पूर्वोत्तर के गैर कांग्रेसी दलों को एकजुट करने के लिए पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन (एनईडीए- नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस) की स्थापना की थी। इस गठबंधन में भाजपा के साथ नागा पीपल्स पार्टी, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट, पीपल्स पार्टी ऑफ़ अरुणाचल और मिज़ो नेशनल फ्रंट आदी दल शामिल है। दरअसल पूर्वोत्तर में अपने पैर पसारने में हमेशा नाकाम रहने वाली भाजपा ने मोदी सरकार आने के बाद असम, मणिपुर और त्रिपुरा में सरकार बना ली। इसके साथ ही नागालैंड और मेघालय में भी भाजपा के समर्थन के साथ पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार है।
भाजपा ने पूर्वोत्तर में कांग्रेस विरोधी दलों को एक करके कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने की रणनीति पर काम किया है। इसी रणनीति के तहत भाजपा अब पूर्वोत्तर में कांग्रेस का आखरी किला भी गिराना चाहती है। इसके लिए खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मिज़ोरम जाकर पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद किया। अमित शाह के अलावा राम माधव, असम के मुख्यमंत्री सरबानंद सोनोवाल और मंत्री हिमांता बिस्वा शर्मा मिज़ोरम का दौरा कर रहे है। भाजपा किसी भी तरह से कांग्रेस को मिज़ोरम की सत्ता से बाहर करना चाहती है।
ललथनहवला भरोसे कांग्रेस
कांग्रेस पिछले 10 सालों से मिज़ोरम की सत्ता पर काबिज है। ललथनहवला 10 साल से प्रदेश के मुख्यमंत्री है और 1973 से मिज़ोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष है। इतने लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले वह शायद देश के पहले व्यक्ति है। राजनीति में आने के पहले वह मिज़ोरम के एक कोऑपरेटिव बैंक में असिस्टेंट के तौर पर भी काम कर रहे थे। बाद में वह मिज़ो नेशनल फ्रंट के आंदोलन से जुड़कर इसके विदेश सचिव बन गये। जिसको लेकर ललथनहवला जेल भी गये। 1967 में जेल से छूटने के बाद वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए। उनको पार्टी की ओर से आइजोल जिले का मुख्य संगठनकर्ता बना गिया गया।
1984-86 तक दो साल के लिए ललथनहवला पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। जिसके बाद वह 1989 से 1998 फिर 2008 से लेकर अब तक राज्य के मुख्यमंत्री है। ललथनहवला को मिजोरम में करिश्माई नेता माना जाता है। वह अब तक 9 विधानसभा चुनाव जीत चुके है। मिजोरम में कांग्रेस एक बार फिर ललथनहवला के भरोसे ही चुनाव लड़ रही है।
बागियों का सहारा
2013 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 44.63% वोट पाकर 40 में से 34 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी मिज़ो नेशनल फ्रंट, 28.65% वोट पाकर सिर्फ 5 सीटें ही जीत पायी। वहीं 1 सीट एमपीसी के खाते में गई थी। मिजोरम में पिछले काफी समय से कांग्रेस में बगावत का सिलसिला चल रहा है। एक के बाद एक कांग्रेस के मौजूदा विधायक पार्टी छोड़ रहे है। कुछ भाजपा में जा रहे है तो ज्यादातर मिज़ो नेशनल फ्रंट का दामन थाम रहे है।
अमित शाह के दौरे के ठीक पहले राज्य के पूर्व मंत्री बुद्धा धन चकमा कांग्रेस का हाथ छोड़कर भाजपा के साथ चले गये थे। चकमा के पहले कांग्रेस के दो अन्य विधायक पार्टी से इस्तीफ़ा दे चुके है। इसमें पूर्व गृहमंत्री आर. लालजीर्लियना और लालरिनलियाना सैलो शामिल है। यह दोनों नेता एमएनएफ (मिज़ो नेशनल फ्रंट) में शामिल हो गये थे। इन तीनों नेताओं के बाद कांग्रेस विधायक हमिंगडेलोवा खियांगटे ने सोमवार को मिज़ोरम विधानसभा से इस्तीफा दे दिया। खियांगटे के इस्तीफे के बाद अब विधानसभा में कांग्रेस के कुल 30 विधायक बचे है।
कुल मिलाकर भाजपा यहाँ अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में बिलकुल नही है। खाता खोलने के लिए भी भाजपा को काफी पापड़ बेलने पड़ेंगे। 10 सालों से विपक्ष में बैठी मिज़ो नेशनल फ्रंट के बलबूते भाजपा यहाँ सत्ता में बैठने का ख्वाब देख सकती है लेकिन चुनाव पूर्व गठबंधन न करना भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित होगा। मिज़ो को पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले फायदा होता दिख रहा है लेकिन बहुमत के आंकड़े को पाना मुश्किल है। अन्य छोटे दल अगर कांग्रेस कि कुछ सीटें जीतने में कामयाब हो जाते है तो वह छोटे दल ही मिजोरम में किंग मेकर बनेंगे। ऐसे में मुकाबला फिर राहुल गाँधी बनाम अमित शाह का होगा। अमित शाह के पास खोने के लिए कुछ नही होगा। तो वहीं राहुल गाँधी भी कर्नाटक की तर्ज पर सत्ता बचाने के लिए त्याग से पीछे नही हटेंगें।
पूर्वोत्तर में कांग्रेस के आख़िरी किले में अगले महीने विधानसभा चुनाव होने है। अमित शाह समेत भाजपा के कई वरिष्ठ नेता मिज़ोरम का दौरा कर रहे है। भाजपा यहाँ नरेन्द्र मोदी की योजनाओं के सहारे मैदान में उतर रही है। पिछले चुनाव में सभी सीटों पर जमानत जब्त होने के बाद भी भाजपा इस चुनाव में आत्मविश्वास से भरी हुई है। आत्मविश्वास इतना कि पहली बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और अमित शाह सभी 40 सीटें जीतने की बात कर रहे है। भाजपा यह सब जितना आसान दिखा रही है उतना आसान यह है नही। कांग्रेस पिछले 10 सालों से मिज़ोरम की सत्ता में है। 4 विधायकों के पार्टी छोड़ने के बाद भी कांग्रेस के पास 30 विधायक है। दरअसल भाजपा मिज़ोरम में जीतने और सरकार बनाने के लिए नही बल्कि और कांग्रेस को हराने और खाता खोलकर मिज़ो नेशनल फ्रंट के साथ मिज़ोरम की राजनीति में एंट्री मारना चाहती है।
मिज़ोरम में पिछले विधानसभा चुनाव में नोटा से भी कम वोट पाने वाली भाजपा इस विधानसभा चुनाव में पहली बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन के संस्थापक और बीजेपी नेता हिमंता बिस्वा ने कहा है की पार्टी मिज़ोरम विधानसभा चुनाव जीतेगी और पूर्ण बहुमत से सरकार बनाएगी। वहीं कुछ दिनों पहले मिज़ोरम में पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद करके आए अमित शाह ने दावा किया था की पार्टी इस बार मिज़ोरम में सभी 40 सीटों पर जीत दर्ज करेगी।
मिज़ोरम में भाजपा अब तक 5 विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है। 1993 में 8, 98 में 12, 2003 में 8, 2008 में 9 और 2013 में 17 सीटों पर भाजपा ने चुनाव लड़ा था। 5 विधानसभा चुनाव लड़ने के बाद भी भाजपा अब तक मिज़ोरम में अपना खाता तक नही खोल पाई है। पिछले विधानसभा चुनाव में 17 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा की सभी 17 सीटों पर जमानत जब्त हो गयी थी। उस चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 1 से भी कम, 37% था। जो की नोटा से भी कम था। ऐसे में अगर हेमंत बिसवा पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने और अमित शाह सभी 40 सीटें जीतने का दावा करते है तो प्रश्न उठता है कि यह भाजपा का आत्मविश्वास है या फिर सिर्फ राजनैतिक जुमला है ?
कांग्रेस मुक्त पूर्वोत्तर
केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद कांग्रेस धीरे-धीरे पूर्वोत्तर से साफ़ होती जा रही है। अब सिर्फ मिज़ोरम में ही कांग्रेस की सरकार है। दरअसल मई 2016 में भाजपा ने पूर्वोत्तर के गैर कांग्रेसी दलों को एकजुट करने के लिए पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन (एनईडीए- नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस) की स्थापना की थी। इस गठबंधन में भाजपा के साथ नागा पीपल्स पार्टी, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट, पीपल्स पार्टी ऑफ़ अरुणाचल और मिज़ो नेशनल फ्रंट आदी दल शामिल है। दरअसल पूर्वोत्तर में अपने पैर पसारने में हमेशा नाकाम रहने वाली भाजपा ने मोदी सरकार आने के बाद असम, मणिपुर और त्रिपुरा में सरकार बना ली। इसके साथ ही नागालैंड और मेघालय में भी भाजपा के समर्थन के साथ पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार है।
भाजपा ने पूर्वोत्तर में कांग्रेस विरोधी दलों को एक करके कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने की रणनीति पर काम किया है। इसी रणनीति के तहत भाजपा अब पूर्वोत्तर में कांग्रेस का आखरी किला भी गिराना चाहती है। इसके लिए खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मिज़ोरम जाकर पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद किया। अमित शाह के अलावा राम माधव, असम के मुख्यमंत्री सरबानंद सोनोवाल और मंत्री हिमांता बिस्वा शर्मा मिज़ोरम का दौरा कर रहे है। भाजपा किसी भी तरह से कांग्रेस को मिज़ोरम की सत्ता से बाहर करना चाहती है।
ललथनहवला भरोसे कांग्रेस
कांग्रेस पिछले 10 सालों से मिज़ोरम की सत्ता पर काबिज है। ललथनहवला 10 साल से प्रदेश के मुख्यमंत्री है और 1973 से मिज़ोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष है। इतने लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले वह शायद देश के पहले व्यक्ति है। राजनीति में आने के पहले वह मिज़ोरम के एक कोऑपरेटिव बैंक में असिस्टेंट के तौर पर भी काम कर रहे थे। बाद में वह मिज़ो नेशनल फ्रंट के आंदोलन से जुड़कर इसके विदेश सचिव बन गये। जिसको लेकर ललथनहवला जेल भी गये। 1967 में जेल से छूटने के बाद वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए। उनको पार्टी की ओर से आइजोल जिले का मुख्य संगठनकर्ता बना गिया गया।
1984-86 तक दो साल के लिए ललथनहवला पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। जिसके बाद वह 1989 से 1998 फिर 2008 से लेकर अब तक राज्य के मुख्यमंत्री है। ललथनहवला को मिजोरम में करिश्माई नेता माना जाता है। वह अब तक 9 विधानसभा चुनाव जीत चुके है। मिजोरम में कांग्रेस एक बार फिर ललथनहवला के भरोसे ही चुनाव लड़ रही है।
बागियों का सहारा
2013 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 44.63% वोट पाकर 40 में से 34 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी मिज़ो नेशनल फ्रंट, 28.65% वोट पाकर सिर्फ 5 सीटें ही जीत पायी। वहीं 1 सीट एमपीसी के खाते में गई थी। मिजोरम में पिछले काफी समय से कांग्रेस में बगावत का सिलसिला चल रहा है। एक के बाद एक कांग्रेस के मौजूदा विधायक पार्टी छोड़ रहे है। कुछ भाजपा में जा रहे है तो ज्यादातर मिज़ो नेशनल फ्रंट का दामन थाम रहे है।
अमित शाह के दौरे के ठीक पहले राज्य के पूर्व मंत्री बुद्धा धन चकमा कांग्रेस का हाथ छोड़कर भाजपा के साथ चले गये थे। चकमा के पहले कांग्रेस के दो अन्य विधायक पार्टी से इस्तीफ़ा दे चुके है। इसमें पूर्व गृहमंत्री आर. लालजीर्लियना और लालरिनलियाना सैलो शामिल है। यह दोनों नेता एमएनएफ (मिज़ो नेशनल फ्रंट) में शामिल हो गये थे। इन तीनों नेताओं के बाद कांग्रेस विधायक हमिंगडेलोवा खियांगटे ने सोमवार को मिज़ोरम विधानसभा से इस्तीफा दे दिया। खियांगटे के इस्तीफे के बाद अब विधानसभा में कांग्रेस के कुल 30 विधायक बचे है।
कुल मिलाकर भाजपा यहाँ अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में बिलकुल नही है। खाता खोलने के लिए भी भाजपा को काफी पापड़ बेलने पड़ेंगे। 10 सालों से विपक्ष में बैठी मिज़ो नेशनल फ्रंट के बलबूते भाजपा यहाँ सत्ता में बैठने का ख्वाब देख सकती है लेकिन चुनाव पूर्व गठबंधन न करना भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित होगा। मिज़ो को पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले फायदा होता दिख रहा है लेकिन बहुमत के आंकड़े को पाना मुश्किल है। अन्य छोटे दल अगर कांग्रेस कि कुछ सीटें जीतने में कामयाब हो जाते है तो वह छोटे दल ही मिजोरम में किंग मेकर बनेंगे। ऐसे में मुकाबला फिर राहुल गाँधी बनाम अमित शाह का होगा। अमित शाह के पास खोने के लिए कुछ नही होगा। तो वहीं राहुल गाँधी भी कर्नाटक की तर्ज पर सत्ता बचाने के लिए त्याग से पीछे नही हटेंगें।
पूर्वोत्तर में कांग्रेस के आख़िरी किले में अगले महीने विधानसभा चुनाव होने है। अमित शाह समेत भाजपा के कई वरिष्ठ नेता मिज़ोरम का दौरा कर रहे है। भाजपा यहाँ नरेन्द्र मोदी की योजनाओं के सहारे मैदान में उतर रही है। पिछले चुनाव में सभी सीटों पर जमानत जब्त होने के बाद भी भाजपा इस चुनाव में आत्मविश्वास से भरी हुई है। आत्मविश्वास इतना कि पहली बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और अमित शाह सभी 40 सीटें जीतने की बात कर रहे है। भाजपा यह सब जितना आसान दिखा रही है उतना आसान यह है नही। कांग्रेस पिछले 10 सालों से मिज़ोरम की सत्ता में है। 4 विधायकों के पार्टी छोड़ने के बाद भी कांग्रेस के पास 30 विधायक है। दरअसल भाजपा मिज़ोरम में जीतने और सरकार बनाने के लिए नही बल्कि और कांग्रेस को हराने और खाता खोलकर मिज़ो नेशनल फ्रंट के साथ मिज़ोरम की राजनीति में एंट्री मारना चाहती है।
मिज़ोरम में पिछले विधानसभा चुनाव में नोटा से भी कम वोट पाने वाली भाजपा इस विधानसभा चुनाव में पहली बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन के संस्थापक और बीजेपी नेता हिमंता बिस्वा ने कहा है की पार्टी मिज़ोरम विधानसभा चुनाव जीतेगी और पूर्ण बहुमत से सरकार बनाएगी। वहीं कुछ दिनों पहले मिज़ोरम में पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद करके आए अमित शाह ने दावा किया था की पार्टी इस बार मिज़ोरम में सभी 40 सीटों पर जीत दर्ज करेगी।
मिज़ोरम में भाजपा अब तक 5 विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है। 1993 में 8, 98 में 12, 2003 में 8, 2008 में 9 और 2013 में 17 सीटों पर भाजपा ने चुनाव लड़ा था। 5 विधानसभा चुनाव लड़ने के बाद भी भाजपा अब तक मिज़ोरम में अपना खाता तक नही खोल पाई है। पिछले विधानसभा चुनाव में 17 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा की सभी 17 सीटों पर जमानत जब्त हो गयी थी। उस चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 1 से भी कम, 37% था। जो की नोटा से भी कम था। ऐसे में अगर हेमंत बिसवा पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने और अमित शाह सभी 40 सीटें जीतने का दावा करते है तो प्रश्न उठता है कि यह भाजपा का आत्मविश्वास है या फिर सिर्फ राजनैतिक जुमला है ?
कांग्रेस मुक्त पूर्वोत्तर
केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद कांग्रेस धीरे-धीरे पूर्वोत्तर से साफ़ होती जा रही है। अब सिर्फ मिज़ोरम में ही कांग्रेस की सरकार है। दरअसल मई 2016 में भाजपा ने पूर्वोत्तर के गैर कांग्रेसी दलों को एकजुट करने के लिए पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन (एनईडीए- नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस) की स्थापना की थी। इस गठबंधन में भाजपा के साथ नागा पीपल्स पार्टी, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट, पीपल्स पार्टी ऑफ़ अरुणाचल और मिज़ो नेशनल फ्रंट आदी दल शामिल है। दरअसल पूर्वोत्तर में अपने पैर पसारने में हमेशा नाकाम रहने वाली भाजपा ने मोदी सरकार आने के बाद असम, मणिपुर और त्रिपुरा में सरकार बना ली। इसके साथ ही नागालैंड और मेघालय में भी भाजपा के समर्थन के साथ पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार है।
भाजपा ने पूर्वोत्तर में कांग्रेस विरोधी दलों को एक करके कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने की रणनीति पर काम किया है। इसी रणनीति के तहत भाजपा अब पूर्वोत्तर में कांग्रेस का आखरी किला भी गिराना चाहती है। इसके लिए खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मिज़ोरम जाकर पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद किया। अमित शाह के अलावा राम माधव, असम के मुख्यमंत्री सरबानंद सोनोवाल और मंत्री हिमांता बिस्वा शर्मा मिज़ोरम का दौरा कर रहे है। भाजपा किसी भी तरह से कांग्रेस को मिज़ोरम की सत्ता से बाहर करना चाहती है।
ललथनहवला भरोसे कांग्रेस
कांग्रेस पिछले 10 सालों से मिज़ोरम की सत्ता पर काबिज है। ललथनहवला 10 साल से प्रदेश के मुख्यमंत्री है और 1973 से मिज़ोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष है। इतने लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले वह शायद देश के पहले व्यक्ति है। राजनीति में आने के पहले वह मिज़ोरम के एक कोऑपरेटिव बैंक में असिस्टेंट के तौर पर भी काम कर रहे थे। बाद में वह मिज़ो नेशनल फ्रंट के आंदोलन से जुड़कर इसके विदेश सचिव बन गये। जिसको लेकर ललथनहवला जेल भी गये। 1967 में जेल से छूटने के बाद वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए। उनको पार्टी की ओर से आइजोल जिले का मुख्य संगठनकर्ता बना गिया गया।
1984-86 तक दो साल के लिए ललथनहवला पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। जिसके बाद वह 1989 से 1998 फिर 2008 से लेकर अब तक राज्य के मुख्यमंत्री है। ललथनहवला को मिजोरम में करिश्माई नेता माना जाता है। वह अब तक 9 विधानसभा चुनाव जीत चुके है। मिजोरम में कांग्रेस एक बार फिर ललथनहवला के भरोसे ही चुनाव लड़ रही है।
बागियों का सहारा
2013 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 44.63% वोट पाकर 40 में से 34 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी मिज़ो नेशनल फ्रंट, 28.65% वोट पाकर सिर्फ 5 सीटें ही जीत पायी। वहीं 1 सीट एमपीसी के खाते में गई थी। मिजोरम में पिछले काफी समय से कांग्रेस में बगावत का सिलसिला चल रहा है। एक के बाद एक कांग्रेस के मौजूदा विधायक पार्टी छोड़ रहे है। कुछ भाजपा में जा रहे है तो ज्यादातर मिज़ो नेशनल फ्रंट का दामन थाम रहे है।
अमित शाह के दौरे के ठीक पहले राज्य के पूर्व मंत्री बुद्धा धन चकमा कांग्रेस का हाथ छोड़कर भाजपा के साथ चले गये थे। चकमा के पहले कांग्रेस के दो अन्य विधायक पार्टी से इस्तीफ़ा दे चुके है। इसमें पूर्व गृहमंत्री आर. लालजीर्लियना और लालरिनलियाना सैलो शामिल है। यह दोनों नेता एमएनएफ (मिज़ो नेशनल फ्रंट) में शामिल हो गये थे। इन तीनों नेताओं के बाद कांग्रेस विधायक हमिंगडेलोवा खियांगटे ने सोमवार को मिज़ोरम विधानसभा से इस्तीफा दे दिया। खियांगटे के इस्तीफे के बाद अब विधानसभा में कांग्रेस के कुल 30 विधायक बचे है।
कुल मिलाकर भाजपा यहाँ अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में बिलकुल नही है। खाता खोलने के लिए भी भाजपा को काफी पापड़ बेलने पड़ेंगे। 10 सालों से विपक्ष में बैठी मिज़ो नेशनल फ्रंट के बलबूते भाजपा यहाँ सत्ता में बैठने का ख्वाब देख सकती है लेकिन चुनाव पूर्व गठबंधन न करना भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित होगा। मिज़ो को पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले फायदा होता दिख रहा है लेकिन बहुमत के आंकड़े को पाना मुश्किल है। अन्य छोटे दल अगर कांग्रेस कि कुछ सीटें जीतने में कामयाब हो जाते है तो वह छोटे दल ही मिजोरम में किंग मेकर बनेंगे। ऐसे में मुकाबला फिर राहुल गाँधी बनाम अमित शाह का होगा। अमित शाह के पास खोने के लिए कुछ नही होगा। तो वहीं राहुल गाँधी भी कर्नाटक की तर्ज पर सत्ता बचाने के लिए त्याग से पीछे नही हटेंगें।
बुधवार को मिजोरम में पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद करने के लिए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पहुंचे. इस मौके पर शाह ने पार्टी के प्रदेश मुख्यालय भवन का उद्घाटन किया और पार्टी के बूथ स्तरीय कार्यकर्ताओं के एक सम्मेलन को संबोधित भी किया. शाह ने कहा की राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शुरू की गयी विकास योजनाओं को लागु नही किया. जनता के अंदर कांग्रेस को लेकर असंतोष है और भाजपा इस बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और जीत दर्ज करेगी.
अमित शाह के दौरे के ठीक पहले राज्य के पूर्व मंत्री बुद्धा धन चकमा कांग्रेस का हाँथ छोड़कर भाजपा के साथ आ गये है. पिछले 10 साल से राज्य में सरकार चला रही कांग्रेस के अंदर बगावत का सिलसिला थम नही रहा है. चकमा के पहले कांग्रेस के दो अन्य विधायक पार्टी से इस्तीफ़ा दे चुके है. इसमें पूर्व गृहमंत्री आर. लालजीर्लियना और लालरिनलियाना सैलो शामिल है. यह दोनों नेता मिजोरम एमएनएफ (मिज़ो नेशनल फ्रंट) में शामिल हो गये थे. विपक्षी पार्टीयों का दावा है की कांग्रेस के कुछ और विधायक चुनाव के पहले पार्टी का साथ छोड़ सकते है. पिछले 10 साल से मिजोरम की सत्ता में काबिज कांग्रेस को इस विधानसभा चुनाव में सत्ता विरोधी लहर, भाई- भतीजावाद और भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझना पड़ रहा है. इसी कारण कांग्रेस ने इस विधानसभा चुनाव में अपने 7 मौजूदा विधायकों की टिकट काटी है. कांग्रेस द्वारा घोषित किये गये 36 प्रत्याशियों में से 12 युवा है, जिनकी उम्र 40 वर्ष के कम है. मुख्यमंत्री लाल थान्हावला 2013 की तरह इस बार भी दो विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरेंगे.
मिज़ो नेशनल फ्रंट राज्य में मुख्य विपक्षी दल है. 1959 में राज्य में अकाल पड़ा था. जिसमे केंद्र सरकार के असहयोग के खिलाफ राज्य की जनता ने आन्दोलन किया. इस आन्दोलन का का नेतृत्व कर मिज़ो नेशनल फ्रंट ने सक्रिय राजनीती में एंट्री मारी. एमएनएफ ने चुनाव लड़कर राज्य में अब तक तीन बार सरकार बनाई है. पहले 1986-88 और फिर 1998 से 2008. 2008 में राज्य के अंदर सरकार कस खिलाफ जबरदस्त एंटी इनकमबेंसी का माहौल बना और पार्टी 40 में से सिर्फ 3 ही सीट जीत पाई. राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री लाल थान्हावला भी मिज़ो नेशनल फ्रंट आंदोलन से ही निकले है.
राज्य में कांग्रेस पिछले 10 साल से राज कर रही है. लाल थान्हावला 10 साल से प्रदेश के मुख्यमंत्री है और 1973 से मिजोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष है. इतने लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले थान्हावला शायद देश के पहले व्यक्ति है. राजनीती में आने के पहले वह मिजोरम के एक कोऑपरेटिव बैंक में असिस्टेंट के तौर पर भी काम कर रहे थे. बाद में वह मिजो नेशनल फ्रंट के आंदोलन से जुड़कर इसके विदेश सचिव बन गये. जिसको लेकर लथनहवला जेल भी गये. 1967 में जेल से छूटने के बाद वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए. उनको पार्टी की ओर से आईजोल जिले का मुख्य संगठनकर्ता बना गिया गया.
1984-86 तक दो साल के लिए थान्हावला पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने. जिसके बाद वह 1989 से 1998 फिर 2008 से लेकर अब तक राज्य के मुख्यमंत्री है. लथनहवला को मिजोरम में करिश्माई नेता माना जाता है. वह अब तक 9 विधानसभा चुनाव जीत चुके है. मिजोरम में कांग्रेस एक बार फिर लथनहवला के भरोसे ही चुनाव लड़ रही है.
अमित शाह मिजोरम में लथनहवला के विजय रथ को रोकने के लिए पूरी ताकत लगा रहे है. पार्टी पहली बार मिजोरम में सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. इससे पहले पार्टी 1993 में 8, 98 में 12, 2003 में 8, 2008 में 9 और 2013 में 17 सीटों पर चुनाव लड़ चुकी है. पांच विधानसभा चुनाव लड़ने के बाद भी भाजपा मिजोरम में खाता खोलने तक में कामयाब नही हो पाई. 2013 में 17 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा की सभी 17 सीटों पर जमानत जप्त हो गयी थी. इस चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 1 से भी कम, 0.37% था, जो की नोटा से भी कम था. ऐसे में अगर अमित शाह कहते है की भाजपा इस विधानसभा चुनाव में सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और सभी 40 सीटें जीतेगी तो इस बात पर भरोसा करना थोडा मुश्किल होता है.
वैसे तो भाजपा मिजोरम में कांग्रेस को टक्कर देने की स्तिथि में नही है लेकिन कांग्रेस और एमएनएफ के बगिओं के सहारे राज्य में कुछ विधानसभा सीटें जरूर जीतना चाहती है. शाह किसी भी तरह से राज्य में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करना चाहते है. चुनाव में अगर कांग्रेस को बहुमत से थोड़ी भी कम सीटें मिलती है तो शाह एमएनएफ और बाकी विपक्षी पार्टिओं को साथ लेकर राज्य की राजनीती में बेकडोर एंट्री मारना चाहते है.ReplyForward
देश के चार राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव के तारीखों की घोषणा शनिवार को चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू हो गयी है। इसमें चुनाव आयुक्त ने कहा एमपी, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में विधानसभा का कार्यकाल जनवरी, 2019 में खत्म हो रहा है। अभी केवल 4 राज्यों में ही विधानसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान होगा। छत्तीसगढ़ में दो चरणों में चुनाव होंगे। पहले चरण में मतदान 12 नवंबर तथा दूसरे चरण के मतदान 20 नवंबर को होंगे
लाइव अपडेट्स
– एमपी, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में विधानसभा का कार्यकाल जनवरी, 2019 में खत्म हो रहा है: चुनाव आयोग
– चारों चुनावी राज्यों में मतदान VVPAT मशीनों के जरिए करवाई जाएगी: चुनाव आयोग
– चुनाव की तारीखों का ऐलान होते ही आज से मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में लागू हो जाएगी आचार संहिता
– मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में मतदान कराने को लेकर तैयारियां पूरी हैं: चुनाव आयोग
–चुनाव में कोई भी उम्मीदवार अधिकतम 28 लाख रुपया खर्च कर सकेंगे: चुनाव आयोग
–चारों चुनावी राज्यों में वोटिंग के लिए नई मशीनों का इस्तेमाल होगा: चुनाव आयोग
-मिजोरम और मध्यप्रदेश में 28 नवंबर को मतदान होंगे :चुनाव आयोग
-छत्तीसगढ़ में पहले फेज के मतदान 12 नवंबर तथा दूसरे फेज के मतदान 20 नवंबर को होंगे :चुनाव आयोग
-राजस्थान और तेलंगाना में 7 दिसंबर को मतदान होंगे : चुनाव आयोग
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव समेत पांच राज्यों में होने वाले चुनावों की भी आज घोषणा हो सकती है। चुनाव आयोग ने इसकी पूरी तैयारियां भी कर ली हैं। चुनाव आयोग आज दोपहर तीन बजे एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाला है जिसमें इन राज्यों में चुनाव तारीखों की घोषणा हो सकती है। पहले यह प्रेस कॉन्फ्रेंस 12:30 बजे होनी थी, लेकिन किसी कारणवश अब यह प्रेस कॉन्फ्रेंस तीन बजे रखी गई है। आयोग अलग-अलग चरणों में यह चुनाव करवा सकता है। आयोग द्वारा तारीखों की घोषणा के बाद ही राज्यों में आचार संहिता लागू हो जाएगी।
बता दें कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस और भाजपा पहले ही कमर कस चुके हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी शानिवार को मध्य प्रदेश में चुनावी रैली को संबोधित करेंगे। वहीं, प्रधानमंत्री मोदी राजस्थान में आज चुनावी रैली को संबोधित करेंगे।
तेलंगाना विधानसभा चुनाव की भी हो सकती है घोषणा
मध्य प्रदेश में 2013 में हुए विधानसभा चुनाव को लेकर तारीखों की घोषणा 4 अक्टूबर को की गई थी। इस आधार पर अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बार भी आचार संहिता जल्द लागू हो सकती है। मध्य प्रदेश के साथ-साथ राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना विधानसभा चुनावों की भी घोषणा की जा सकती है।
हालांकि, माना ये भी जा रहा है कि तेलंगाना में 9 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होगी, इसलिए उसके बाद ही चुनावों के तारीखों की घोषणा की जाएगी। इसके अलावा ऐसा भी माना जा रहा है कि 12 अक्टूबर के बाद चुनाव की घोषणा की जाएगी, क्योंकि मध्य प्रदेश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत मनीला दौरे पर जा रहे हैं। जब वह वहां से वापस लौटेंगे, उसके बाद ही चुनाव के तारीखों की घोषणा होगी।
कहां-कितनी सीटें?
बता दें कि मध्य प्रदेश में कुल 231 सीटों पर चुनाव होगा, जबकि राजस्थान में 200 सीटों पर, छत्तीसगढ़ में 91 सीटों पर, मिजोरम में 40 सीटों पर और तेलंगाना में कुल 119 सीटों पर विधानसभा चुनाव होने हैं।