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मुख्यमंत्री पद की लड़ाई कहीं मध्यप्रदेश में सत्ता से चूक न जाए कांग्रेस

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मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री के पद को लेकर चल रही खींचतान कांग्रेस कहीं सत्ता में आने से चूक न जाए। कांग्रेस में उठ रहीं इस तरह की आशंकाओं को भारतीय जनता पार्टी के नेता लगातार हवा दे रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी अपने मध्यप्रदेश के दौरे में लगातार चेहरे को लेकर हवा दे रहे हैं। कांग्रेस के लिए यह चुनाव करो या मरो का चुनाव है। इस चुनाव कांग्रेस यदि सत्ता बनाने से चूक गई तो स्थितियां उत्तरप्रदेश और बिहार जैसी हो जाएंगीं।

पंद्रह साल की भाजपा सरकार से नाराज है वोटर

राज्य में कांग्रेस अब तक चुनाव कोई ऐसा मुद्दा तैयार नहीं कर पाई है, जिसके नारे के सहारे उसका सत्ता से वनवास समाप्त हो जाए। लगातार पंद्रह साल से विपक्ष में बैठी कांग्रेस जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ कमजोर कर चुकी है। पिछले दो विधानसभा चुनाव में नेतृत्व को लेकर जो प्रयोग कांग्रेस पार्टी द्वारा किए गए थे, वे असफल साबित हुए हैं। वर्ष 2008 में पार्टी ने सुरेश पचौरी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में कांग्रेस की सत्ता में वापसी की सबसे ज्यादा संभावनाएं थीं। पांच साल की अवधि में शिवराज सिंह चौहान भारतीय जनता पार्टी के तीसरे मुख्यमंत्री थे। पार्टी में चौहान का नेतृत्व स्वीकार करने वाले लोगों की भी कमी थी।

कांग्रेस की रणनीतिक कमजोरी ने उसे सत्ता से वंचित कर दिया था। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कांतिलाल भूरिया के जरिए आदिवासी कार्ड खेल था। पार्टी को इस कार्ड से आदिवासी क्षेत्रों में ही सफलता नहीं मिली। पिछले विधानसभा चुनाव में भी पार्टी के बड़े नेताओं के बीच निपटाओ का भाव उसी तरह देखने को मिला था, जिस तरह वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में मिला था। लोकसभा चुनाव में केन्द्र की सरकार जाने के बाद अरूण यादव को प्रदेश कांग्रेस का नेतृत्व सौंपा गया था। तीन साल से भी अधिक समय तक अध्यक्ष रहने के बाद भी वे अपना और पार्टी का जनाधार मजबूत नहीं कर पाए थे। पार्टी ने उन्हें हटाए जाने के फैसले में भी काफी देरी कर दी थी। उनके स्थान पर अध्यक्ष बनाए गए कमलनाथ राज्य की राजनीति के तौर-तरीके से भी परिचित नहीं है।

उनके व्यवहार को लेकर कांग्रेस के कार्यकर्त्ताओं की यह शिकायत हमेशा रहते है कि वे इस तरह पेश आते हैं जैसे कि केन्द्रीय मंत्री अथवा मुख्यमंत्री हैं। कमलनाथ ने राज्य में अपनी भूमिका को किंग मेकर की तरह पेश किया था। पहली बार वे किंग बनने के लिए उतावले दिखाई दे रहे हैं। सत्तर की उम्र पार कर चुके कमलनाथ का राज्य की राजनीति में नोसिखियापन कई मौकों पर देखने को मिला। मीडिया विभाग में परिवर्तन से लेकर उनके चुनावी मुद्दे तक में इस नौसिखिएपन को समझा जा सकता है। कमलनाथ छिंदवाड़ा के विकास मॉडल से राज्य की पंद्रह साल पुरानी भाजपा सरकार को उखाडना चाहते हैं। छिंदवाड़ा के विकास मॉडल को उभारने के पीछे उनकी सोच पार्टी में मुख्यमंत्री पद के दावेदार दूसरे नेताओं को पीछे करने की है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की सार्वजनिक मंचों से दी गई नसीहतों के बाद भी कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया से तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं। राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश में चुनाव जीतने की जो रणनीति बनाई है उसमें सिर्फ दो ही चेहरों को केन्द्र में रखा गया है। कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया। राज्य में भारतीय जनता पार्टी की पंद्रह साल की सरकार को लेकर लोगों में नाराजगी साफ दिखाई दे रही है। कांग्रेस इस नाराजगी को अपने पक्ष में मोड़ने का कोई रास्ता हीं ढूंढ पाई है।

सपाक्स और जयस भी बन सकते हैं राह में रोड़ा

कांग्रेस की राह में बड़ी रूकावट सपाक्स और जयस उभर कर सामने आ रही है। दोनों ही वर्ग विशेष की राजनीति कर रहे हैं। सपाक्स संगठन विशेष रूप से ठाकुर, ब्राह्मण एवं वैश्य वर्ग के वोटों की राजनीति कर रहा है। जबकि जयस संगठन आदिवासी वर्ग पर आधारित है। वैसे तो आदिवासी कांग्रेस का प्रतिबद्ध वोटर माना जाता है लेकिन , पिछले दो चुनावों से इसकी कांग्रेस से दूरी साफ दिखाई दे रही है। इस दूरी के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग कारण हैं। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जबलपुर संभाग की कुछ विधानसभा सीटों तक प्रभाव रखती है। इससे मिलने वाले कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के लिए पर्याप्त माने जाते हैं।

जयस चुनाव मैदान में कहां और कितने उम्मीदवार उतारता है यह अभी कहना मुश्किल है। सपाक्स जरूर यह दावा कर रहा है कि वह राज्य की सभी 230 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगा। स्वभाविक है कि अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित सीटें भी इसमें शामिल हैं। इन आरक्षित सीटों पर संबंधित वर्ग के ही लोगों को उम्मीदवार बनाना होगा। ऐसा होने पर सपाक्स के मूल उद्देश्य पर ही स्वभाविक तौर पर सवाल खड़े हांगे। सपाक्स का जन्म आरक्षण विरोध से हुआ है। सामान्य वर्ग के वोटर के बारे में यह माना जाता है कि वह भाजपा का प्रतिबद्ध वोटर है।

सपाक्स के मैदान में होने से नुकसान भाजपा को होगा ऐसा माना जाना स्वभाविक है। यह वोटर भी चुनाव के वक्त विभाजित होगा। इसका फायदा कितना कांग्रेस को मिलेगा यह कहना मुश्किल है। कांग्रेस वर्तमान राजनीतिक हालात अपने अनुकूल मान रही है। यही वजह है कि पार्टी में अभी से नेता एक-दूसरे के समर्थकों के टिकट कटवाने में लगे हुए हैं। कहा यह जा रहा है कि कांग्रेस के सारे नेता मिलकर सिंधिया की राह को रोकना चाहते हैं। राज्य में एक मात्र सिंधिया का चेहरा ही ऐसा है,जिस पर कोई दाग नहीं है। वोटर के बीच भी लोकप्रिय है।

नाव पर सवार होकर आ रहीं अंबे कांग्रेस की नाव पार लगाएगीं या हाथी पर जाने से होगा नुकसान

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इस वर्ष की शारदीय नवरात्रि पर मां अंबे का आगमन नाव पर हो रहा है। नाव पर सवार मां अंबे मध्यप्रदेश सहित चार राज्यों में क्या कांग्रेस का सत्ता से वनवास समाप्त कर देगीं या फिर हाथी की उपेक्षा महंगी पड़ जाएगी। मां जगदंबा की वापसी भी इस बार हाथी पर बैठ कर हो रही है। मां अंबे का नाव पर आगमन पूरे देश के लिए अच्छे दिन आने का संकेत देने वाला है। क्या ये अच्छे दिन कांग्रेस की हिन्दी भाषी तीन राज्य मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सरकार में वापसी से आएंगे? कांग्रेस को इस सवाल का जवाब अपनी भक्ति के जरिए वोटर को खुश करके मिल सकता है। कांग्रेस को इन तीन राज्यों में अपने हाथ के कमाल पर ही भरोसा है। कांग्रेस ने अपनी नाव किनारे लगाने के लिए न तो साइकल की सवारी की है और न ही हाथी पर बैठने की हिम्मत दिखाई है।

मायावती और अखिलेश यादव को कांग्रेस ने किया है निराश

वैसे तो पिछले पांच विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाने का काम शारदीय नवरात्रि के बाद ही होता है। चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार इस मौके का उपयोग अपने चुनाव प्रचार के लिए करते हैं। इस वार की नवरात्रि पर जगदंबा नाव पर सवार होकर आ रहीं हैं। इस कारण राजनीतिक दलों के लिए यह नवरात्रि ज्यादा खास हैं। चुनाव वाले तीनों हिन्दी भाषी राज्यों में कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला होना तय माना जा रहा है। छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी और मायावती मिलकर मुकाबला त्रिकोणीय बनाने का पूरा प्रयत्न कर रहे हैं। मायावती को अजीत जोगी का साथ कांग्रेस द्वारा हाथ आगे न बढ़ाए जाने के कारण लेना पड़ा है।

मायावती इस उम्मीद में थीं कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जो महागठबंधन तैयार करना चाहते हैं,वह तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में बसपा को साथ लिए बगैर नहीं बन सकता। मायावती इंतजार करतीं रहीं,कांग्रेस ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार ही नहीं किया। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कमलनाथ कहते हैं कि मायावती वो सीटें चाहतीं थीं, जिन पर उन्हें हजार-दो हजार वोट ही पिछले चुनाव में मिले थे। दरअसल मायावती कांग्रेस के वोट के जरिए अपनी नाव पार लगाना चाहतीं थीं। कांग्रेस को लग रहा था कि इस गठबंधन से सत्ता मिल भी गई तो उसका रिमोट मायावती के हाथ में चला जाएगा।

अखिलेश यादव की उम्मीद भरी निगाहों को कांग्रेस ने अनदेखा कर दिया। अखिलेश यादव से कांग्रेस ने समझौते के संकेत तो दिए लेकिन, सहमति का जवाब नहीं भेजा। नतीजा समाजवादी पार्टी को अपनी नाव को बचाने के लिए अकेले ही चुनाव का चप्पू चलाना पड़ रहा है।

कांग्रेस को उम्मीद कि आरक्षित वर्ग और मुस्लिम के साथ लगेगी नाव पार

बसपा प्रमुख मायावती के हाथी को नाराज करने के बाद यह माना जा रहा है कि इससे कांग्रेस को नुकसान होगा। कांग्रेस एक बार फिर सत्ता में आने से चूक सकती है। इस तरह की अटकलों का आधार बसपा के प्रतिवद्ध वोट बैंक के कारण लगाया जा रहा है। राज्य में बसपा की ताकत निरंतर कम हो रही है। बसपा को पिछले चुनाव में सिर्फ चार सीटें ही मिलीं थीं। जबकि वह नौ सीटों पर दूसरे नंबर की पार्टी बनी थी। बसपा जिन सीटों पर नबंर दो पर रही थी ये श्योपुर,सुमावलीमुरैना,भिंड,महाराजपुर,पन्ना,रामपुर बघेलान,सेमरियादेबतालाव तथा रीवा विधानसभा सीट हैं।

पहले उत्तरप्रदेश के चुनाव फिर एट्रोसिटी एक्ट का सवर्णों द्वारा किए जा रहे विरोध के बाद कांग्रेस इस नतीजे पर पहुंची है कि अनुसूचित जाति वर्ग मायावती का साथ छोड़ रहा है। कांग्रेस का अनुमान है कि यह वर्ग भाजपा से नाराज है। इस कारण वह ऐसे दल को वोट देना चाहेगा जो सरकार बना सकता है। तीनों हिन्दी भाषी राज्यों में बसपा अकेले अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है।

राजस्थान में कांग्रेस को लग रहा है कि हर पांच साल में होने वाले सत्ता परिवर्तन में वोटर इस बार भाजपा को विपक्ष में बैठाएंगे। जबकि छत्तीसगढ़ में माया-जोगी के गठबंधन को अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के वोटर अभी विश्वास करने की स्थिति में नहीं है। वहीं सपा की स्थिति तीनों ही राज्यों में सिर्फ सांकेतिक ही मानी जा रही है। कांग्रेस में यह डर भी देखने को मिल रहा है कि कहीं हाथी सत्ता आने के सपने को कुचल न दे?

शुरू हुए योगी आदित्यनाथ के बुरे दिन , 21 अगस्त से शुरू होगी उलटी गिनती

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वैसे तो मोदी सरकार के आने के बाद से ही भाजपा के अच्छे दिन शुरू हो गये है . लेकिन उत्तर प्रदेश में प्रचंड जीत दर्ज करके मुख्यमंत्री बनने  वाले योगी आदित्यनाथ के बुरे दिन शुरू होने वाले है . ऐसा कह रहे है जाने माने ज्योतिष और हस्तरेखा विशेषज्ञ अनिल कात्यन . आपको बता दें की अनिल कात्यान इससे पहले भी कई राजनैतिक भविष्यवाणी कर चुके है . जिनमें से ज्यादातर भविष्यवाणी सही साबित हुई है .

 

कात्यान का कहना है की 7 अप्रैल के बाद ग्रहों की स्तिथि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ हो रही  है . जिसके कारण आदित्यनाथ को बड़ी मुश्किल और विरोध का सामना करना पद सकता है . कात्यान का कहना है की जिस तरह आदित्यनाथ अधिकारिओं को भरोसे में लिए बिना बड़ी बड़ी घोषणा कर रहे है . जिसके कारण  धीरे-धीरे अधिकारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बातें सुनना कम कर सकते है .

 

ज्योतिष के अनुसार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के काम करने की दिशा सही हो सकती है . लेकिन कार्यं करने का प्रारूप तय नही होने के कारण अडचनें आ सकती है .

उत्तर प्रदेश चुनाव के पहले भी की थी भविष्यवाणी

 

अगर आपने मीडिया में सुना हो तो अनिल कात्यान ने उत्तरप्रदेश चुनाव के पहले भी भविष्यवाणी की थी . कात्यान ने कहा था की उत्तरप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी बड़ी जीत दर्ज करेगी . इसके साथ ही कात्यान ने कहा  था की समाजवादी पार्टी के खराब दिन शुरू होने वाले है .

 

21 अगस्त के बाद शुरू होगी उलटी गिनती

 

अगर ज्योतिष अनिल कात्यान की बातों को सही मानो तो 21 अगस्त से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उलटी गिनती शुरू होने वाली है . कात्यान के अनुसार योगी आदित्यनाथ के यह बुरे दिन पूरे तीन महीने यानि 31 नवम्बर तक चलेंगे . इस बीच कुछ ऐसी स्तिथि पैदा हो सकती है की आदित्यनाथ को पार्टी आलाकमान के विरोध का सामना करना पड़े . अब देखना दिलचस्प होगा की मोदी जी के डिजिटल इंडिया में क्या ज्योतिष की बातें सच होती है ? और क्या योगी आदित्यनाथ के बुरे दिन आते है ?

जन्मदिन पर बोली मायावती , नोटबंदी के कारण 90% लोग हुए कंगाल !

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Newbuzzindia : बसपा सुप्रीमो मायावती ने आज अपने 61वे जन्मदिन के मौके पर पीएम मोदी पर बड़ा हमला किया है । मायावती ने कहा है कि नोटबंदी के कारण 090% लोग कंगाल हो गए है । मायावती ने आगे कहा कि “नोटबंदी मोदी सरकार द्वारा अपनी कमियों और विफलताओं से प्रदेश और देश की जनता का ध्यान बंटाने के लिए सोची समझी साजिश है”
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में बसपा की सरकार बनने का भरोसा व्यक्त करते हुए पार्टी प्रमुख मायावती ने रविवार (15 जनवरी) को कहा कि नोटबंदी का फैसला केंद्र की भाजपा सरकार की सोची समझी साजिश है और राजनीतिक स्वार्थ में लिये गये इस फैसले से देश का आम आदमी अभी तक उबर नहीं पाया है। मायावती ने यहां अपने 61वें जन्मदिन के मौके पर संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘‘अपनी कमियों और विफलताओं से प्रदेश और देश की जनता का ध्यान बंटाने के लिए सोची समझी साजिश के तहत केंद्र की भाजपा सरकार ने राजनीतिक स्वार्थ में विधानसभा चुनाव घोषित होने से कुछ समय पहले आठ नवंबर 2016 को नोटबंदी का फैसला किया।’’

उन्होंने कहा कि जल्दबाजी में लिये गये इस फैसले से देश की जनता विशेषकर मध्यम वर्ग अभी उबर नहीं पा रहा है। पचास दिन से ज्यादा बीत गये लेकिन अभी तक देश में हालात पहले की तरह सामान्य नहीं हुए। नोटबंदी से देश में डेढ़ सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। मायावती ने कहा, ‘‘देश भर में ये भी आम चर्चा है कि नोटबंदी का ये फैसला लेने से पहले दस महीने में भाजपा व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पार्टी और राष्ट्रीय नेताओं और चंद पूंजीपतियों एवं धन्नासेठों के काले धन को पूरे तौर से ठिकाने लगवा दिया था।’’

उन्होंने कहा कि इस बात में काफी कुछ सच्चाई इसलिए भी नजर आ रही है क्योंकि गत वर्ष हमारी पार्टी व परिवार के कुछ सदस्यों द्वारा एक ‘रूटीन’ में नियमों के तहत बैंक खाते में जमा धन को भी भाजपा व केंद्र की सरकार ने सोची समझी राजनीतिक साजिश के तहत उसे मीडिया में ऐसे उजागर कराया जैसे कि ये हमारा धन काला धन है।
मायावती ने कहा कि भाजपा और मोदी में थोड़ी सी भी ईमानदारी और सच्चाई है और वे खुद को पूरी तरह बेदाग और दूध के धुले समझते हैं तो नोटबंदी का फैसला लागू करने से पहले के दस महीने और आठ नवंबर के बाद का पार्टी नेताओं और पूंजीपतियों के बैंक खातों का ब्यौरा सार्वजनिक करें। उन्होंने कहा, ‘‘इन खातों में कितना धन जमा हुआ और किन किन कार्यों पर कितना खर्च किया गया है, उसका भी हिसाब किताब देशवासियों के सामने देना चाहिए। लेकिन वे :भाजपा: ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि इससे उनका असली चेहरा सामने आ जाएगा कि वे कितने बेदाग हैं।’’

मायावती ने कहा, ‘‘ऐसी स्थिति में भाजपा एंड कंपनी के लोगों को अपने विरोधियों और उनके रिश्तेदारों के पास खासकर उनके काम को लेकर कुछ भी आरोप लगाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं रहा है लेकिन फिर भी ये लोग अपने राजनीतिक स्वार्थ में नैतिकता को दरकिनार करते हुए मान मर्यादा की हदों को पार कर रहे हैं।’’

उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश चुनाव में खासकर बसपा की मजबूती देखकर और उसे सत्ता में आने से रोकने के लिए बसपा कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराने के मकसद से भाजपा आये दिन कभी पार्टी तो कभी परिवार के लोगों पर आरोप लगा रही है।

मायावती ने कहा, ‘‘मेरे परिवार के लोग जो भी छोटा मोटा कारोबार पिछले कई साल से कर रहे हैं और यदि केंद्र सरकार को उनके कारोबार में कुछ गड़बड़ी नजर आ रही थी तो ये लोग अब तक के आधे शासनकाल में क्या कर रहे थे। चुनाव के नजदीक आते ही मेरे परिवार में गड़बड़ी नजर आयी अर्थात चुनाव के दौरान पार्टी और परिवार में सभी कमियां नजर आने लगी हैं।’’ जन्मदिन के मौके पर मायावती ने ‘मेरे संघर्षमय जीवन और बीएसपी मूवमेंट का सफरनामा’ पुस्तक का विमोचन भी किया।