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शाह और जेटली द्वारा दिखाई गयी प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री फर्जी और जाली है : आम आदमी पार्टी

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Newbuzzindia: नरेंद्र मोदी डिग्री विवाद में आज नया मोड़ आया जब अमित शाह और अरुण जेटली ने प्रेस कांफ्रेंस करते हुए अरविन्द केजरीवाल पर हमला बोला । शाह और जेटली ने नरेंद्र मोदी की दोनों डिग्री सार्वजानिक की जिसमे दिल्ली यूनिवर्सिटी से BA और गुजरात यूनिवर्सिटी से MA है ।

इसके बाद अंदाजा लगाया जा रहा था की आम आदमी पार्टी बैकफुट पे पहुँच जाएगी । लेकिन आम आदमी पार्टी ने शाह-जेटली के वार पे पलटवार करते हुए ये दावा किया है की जो डिग्री अमित शाह और अरुण जेटली ने पेश की ही जो फर्जी और जाली है।

आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी की जो डिग्री बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और वित्तमंत्री अरुण जेटली ने दिखाई है, वह फर्जी है। जालसाजी करने के लिए भी अक्ल चाहिए। बीए और एमए की डिग्रियों में पीएम मोदी के नाम में अंतर है। नाम बदलने के लिए कानूनी प्रक्रिया होती है। आशुतोष ने यह भी बताया कि 1977 की मार्क शीट है, लेकिन डिग्री 1978 की है। मार्कशीट पर नाम नरेंद्र कुमार दामोदर दास मोदी है। बीए डिग्री में नरेंद्र दामोदर दास मोदी है।

आशुतोष ने मीडिया पर हमला करते हुए कहा कि कुछ चैनल जानबूझकर यह खबर नहीं दिखा रहे थे। अब उन्हें दिखाना होगा।

पीएम मोदी की शिक्षा से जुड़ी सारी जानकारी हमने जुटाई
आशुतोष का दावा है कि पीएम मोदी की शिक्षा से जुड़ी सारी जानकारी हमने जुटाई। उन्होंने कुछ डिग्रियों की फोटो कॉपी दिखाते हुए दावा किया है कि उनके नाम में भी गड़बड़ी है। उन्होंने कहा कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, वित्तमंत्री अरुण जेटली और पीएम नरेंद्र मोदी को इस मामले में माफी मांगनी चाहिए।

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अमित शाह और अरुण जेटली का केजरीवाल को करारा जवाब, सार्वजानिक की नरेंद्र मोदी की दोनों डिग्री !

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Newbuzzindia: नरेंद्र मोदी की डिग्री का विवाद था की थमने का नाम ही नही ले रहा था। एक ओर जहां केजरीवाल इस मुद्दे को लेकर हर रोज नए खुलासे कर रहे है तो दूसरी ओर कांग्रेस भी बहती गंगा में हाथ धोने से नही बच रही थी ।

हाल ही में पहले खबर आई थी की नरेंद्र मोदी की BA की डिग्री फर्जी है । उसके बाद अरविन्द केजरीवाल ने आरोप लगाया था की भाजपा द्वारा जो डिग्री सार्वजानिक की गई थी वो नरेंद्र दामोदर मोदी नही नरेंद्र महावीर मोदी के नाम पे ली गई है । इस सब के बाद पिछले कुछ समय से भाजपा सरकार बैकफुट पे नजर आ रही थी ।

लेकिन आज भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पत्रकार वार्ता करते हुए अरविन्द केजरीवाल पर जोरदार हमला किया है । आइये जानते है की क्या कुछ कहा अमित शाह और अरुण जेटली ने –

अमित शाह : अरविन्द केजरीवाल ने एक सफ़ेद झूट को सच बनाने की कोशिश कर के लोगो के बीच भ्रम फैलाया है की पीएम मोदी की डिग्री फर्जी है । साथ ही अमित शाह ने नरेंद्र मोदी की दोनों डिग्रियों को सार्वजानिक कर दिया है  । जिसमे दिल्ली यूनिवर्सिटी से BA और गुजरात यूनिवर्सिटी से MA की डिग्री है ।

अरविन्द केजरीवाल ने ना सिर्फ राजनीति का स्तर गिराया है बल्कि विश्व भर में भारत की छवि को भी नुक्सान पहुँचाया है ।

अरुण जेटली ने क्या कहा
इसके बाद अरुण जेटली ने केजरीवाल पे हमला बोलते हुए कहा की केजरीवाल ने बिना पर्याप्त जानकारी और तथ्य के मोदी जी पर आरोप लगाए है । ये दर्शाता है अरविन्द जी की राजनीती का स्तर कितना नीचे गिर चूका है । साथ की अरुण जेटली ने अरविन्द केजरीवाल से पुछा है की उन्होंने किस आधार पे नरेंद्र मोदी पर ये अरूप लगाए और जेटली ने आगे कहा की अरविन्द केजरीवाल को माफ़ी मंगनी चाहिए ।

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अगस्तावेस्टलैंड घोटाला : अरुण जेटली ने माना, नही है किसी के खिलाफ पुख्ता सबूत !

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Newbuzzindia: अगस्तावेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाले को लेकर कांग्रेस नेताओं को निशाना बनाए जाने के आरोपों के बीच वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सफाई दी है। NDTV से खास बाचतीत में जेटली ने कहा कि हम किसी को व्यक्तिगत रूप से टारगेट नहीं कर रहे हैं, लेकिन जब डील के लिए रिश्वत दी गई तो रिश्वत लेने वाले भी तो होंगे।

हम इसी सच को दुनिया के सामने लाना चाहते हैं, हालांकि किसी को पकड़ने के लिए हमारे पास पर्याप्त सबूत नहीं हैं। हमारा इरादा सिर्फ सच्चाई को सामने लाने का है न कि इसके पीछे कोई राजनीतिक मंशा है। अगस्तावेस्टलैंड को ब्लैकलिस्ट करने के सवाल पर जेटली ने कहा कि यूपीए सरकार ने कभी अगस्ता को ब्लैकलिस्ट किया ही नहीं था।

अरुण जेटली : आरोपों को बेबुनियाद बताकर दूसरी शंकाओं को जन्म देते हैं
मैं समझता हूं कि उन्हें आरोपों को बेबुनियाद नहीं बताना चाहिए। ये बिल्कुल सत्य है कि उन्होंने खुद कॉन्ट्रैक्ट रद्द किया था, इसका मतलब कुछ गलत था। जब वे आरोपों को बेबुनियाद बताते हैं तो वे दूसरी शंकाओं को जन्म देते हैं। आरोपों को बेबुनियाद बताने की बजाय उन्हें सच सामने लाने के लिए जांच में सहयोग करना चाहिए, जिससे साबित हो कि वह दोषी नहीं हैं।

घूस लेने वाले इटली में, उन्हें सजा हो चुकी है
सरकार की नीति बहुत साफ है। ऐसा कोई नहीं है, जिसे हम व्यक्तिगत तौर पर निशाना बनाना चाहते हैं, लेकिन सच्चाई सामने आनी चाहिए। यह सच्चाई है कि पैसों का लेन-देन हुआ है। यूपीए सरकार भी अगस्ता को ब्लैकलिस्ट करने का दावा करती है, हालांकि उन्होंने ब्लैकलिस्ट नहीं किया था, लेकिन उन्हें भी कुछ गलत होने का शक हुआ था। घूस देने वाले इटली में हैं और उन्हें सजा मिल चुकी है। ट्रांजैक्शन रद्द हो चुका है। दोनों तरफ के बिचौलियों की पहचान हो गई है। किसे फायदा पहुंचा, ये सवाल बाक़ी है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि किसी को पकड़ने के लिए पर्याप्त सबूत हैं, लेकिन निश्चित तौर पर इस बात का शक करने के लिए काफ़ी सबूत हैं कि किसी ने घूस ली है। अगर कोई घूस देने वाला है तो घूस लेने वाला भी होगा ही।

आज संदेह के उचित कारण
आज सभी तरह की पड़ताल और घूस देनेवालों को सज़ा मिलने के बाद जांच के लिए संदेह करने के उचित कारण हैं। एक बार आपको पास किसी व्यक्ति के खिलाफ पुख्ता सबूत मिल जाएं तब हम साफतौर पर नाम लेकर कह सकेंगे कि इन लोगों ने पैसे लिए। अभी कुछ नामों की चर्चा है, जिससे एक शक पैदा होता है और मेरे हिसाब से उन लोगों को सफाई देनी चाहिए।

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आम आदमी पार्टी को लगा बड़ा झटका , बीजेपी से राज्यसभा जाएंगे नवजोत सिंह सिध्दू

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Newbuzzindia: क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू के राज्यसभा में मनोनयन से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने काफी आस लगा रखी है। पार्टी को विश्वास है कि सिद्धू के मनोनयन से अगले साल पंजाब में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में उसकी जीत की संभावना बढ़ेगी, साथ ही उच्च सदन में उनके साफ-साफ बोलने का भी पार्टी को लाभ मिलेगा।

सिद्धू के राज्यसभा जाने के बाद सबसे बड़ा झटका लगा है आम आदमी पार्टी को । अरविन्द केजरीवाल पंजाब विधानसभा चुनाव में नवजोत सिंह सिद्धू को बड़ी भूमिका देने के मूड में थे । सिद्धू की लोकप्रियता आम आदमी पार्टी को पंजाब में काफी फायदा दिलवा सकती थी ।

भापजा के सहयोगी शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) के प्रति आलोचनात्मक नजरिए की वजह से सिद्धू पार्टी में हाशिए पर कर दिए गए थे। उन्होंने भी एक रणनीति के तहत खुद को बहुत सक्रिय नहीं रखा।

सिद्धू वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर अमृतसर से जीते थे। लेकिन, 2014 में पार्टी ने उनकी जगह अरुण जेटली को अमृतसर से टिकट दिया। बताया जाता है कि अकाली दल के दबाव में जेटली ने वहां से नामांकन दाखिल किया था, लेकिन वह हार गए थे।

सिद्धू के नामांकन से इन अटकलों पर भी विराम लगा है कि वह अकाली दल के नेतृत्व से चल रही नाराजगी की वजह से आम आदमी पार्टी में शामिल हो सकते हैं।

उनकी पत्नी नवजोत कौर अमृतसर पूर्वी क्षेत्र से विधायक हैं और वह कई बार अकाली दल को आड़े हाथों ले चुकी हैं।

पंजाब में भाजपा और एसएडी के बीच गठबंधन है और उम्मीद है कि अगले साल विधानसभा चुनाव भी दोनों मिलकर लड़ेंगे।

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कोहिनूर नहीं लाना है तो निवेश, कालाधन और दाऊद को लाए मोदी सरकार

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Newbuzzindia: तीन असंबद्ध, अलग विषय। किन्तु एक ही पाठ पढ़ा रहे हैं। कि जल्दबाज़ी बहुत ही बुरी होती है। कहा जा सकता है कि हम सभी इस कालजयी कहावत को जानते हैं, इसमें नया क्या है? यही समझने का प्रयास है कि हम जानते तो हैं, किन्तु मानते नहीं। और इसीलिए ज़ल्दबाज़ी करते चले जाते हैं। पिछला सप्ताह कोहिनूर हीरे से दमकता रहा। देश की विरासत को वापस लाने से सुप्रीम कोर्ट में सरकार के इनकार से काफी हल्ला मचा। और चौबीस घंटे में सरकार ने कहा कि वह हीरा वापस लाएगी।

ऐसा क्यों हुआ?
केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल ने वैसा जवाब सुप्रीम कोर्ट में दे दिया था। कि महाराजा रणजीत सिंह के वंशज ने कोहिनूर ब्रिटिश राजघराने को भेंट किया था। अब आप सोचिए, क्या सॉलिसिटर जनरल ऐसा कह सकते हैं? और यदि किया, तो यह घातक जल्दबाज़ी ही तो हुई।

वास्तव में सॉलिसिटर जनरल ने ऐसा तथ्य पेश करने में कोई जल्दबाज़ी नहीं की थी। वे तो 1956 के पं. नेहरू के मत को ही केन्द्र सरकार के अधिकृत मत के रूप में व्यक्त कर रहे थे। जिसमें कहा गया था कि उपहार में दिया गया हीरा वापस मांगना अनुचित होगा। जल्दबाज़ी तो यह थी कि सॉलिसिटर जनरल ने तत्काल सारी जानकारी पेश कर दी। वर्तमान सरकार से पूछे बग़ैर। क्योंकि यदि पूछते तो पाते कि मोदी सरकार उल्टा पक्ष रखती। कहती कि भले ही पं. नेहरू ने ऐसा तय किया था- किन्तु हम इसे, ‘भारत का गौरव’ मानकर वापस लाएंगे।

यदि पूछते तो मोदी सरकार यह भी तथ्य सुप्रीम कोर्ट को बताती कि कैसे वह 10वीं शताब्दी की दुर्लभ दुर्गा प्रतिमा जर्मनी से वापस लाई। फिर उसने कैनेडा से 400 वर्ष पुरानी ‘पैरेट लेडी’ शिल्प प्राप्त किया। अॉस्ट्रेलिया से भी देवी-देवताओं की प्राचीन मूर्तियां वापस लीं। यह, सॉलिसिटर जनरल के कथन के बाद प्रचारित भी किया गया। 

प्रश्न हालांकि और भी हैं।
चाहिए किसे कोहिनूर?

लाना ही है मोदी सरकार को, तो विदेश और देश से भी, निवेश लाए। 
लाना ही है मोदी सरकार को, तो नौकरियां लाए।

और विदेश में मौजूद यदि हमारे यहां से गया हुआ, भेजा हुआ कुछ ला सकती है मोदी सरकार, तो हजारों करोड़ का काला धन वापस लाए।
और, हत्यारों-हमलावरों की एक पूरी पंक्ति बसी-बसाई है पाकिस्तान, दुबई या कि ऐसे ही किसी देश में। दाऊद इब्राहिम को खींचकर लाए। पैसे लेकर, बांटकर खून बहाने वाले कई हैं लखवी या मसूद या दाऊद गिलानी हेडली।

इन्हें वापस लाए।
जल्दबाज़ी न करें, किन्तु यहां भी।
जल्दी कर सकें, तो बेहतर होगा।
जल्दी और जल्दबाज़ी में महीन किन्तु स्पष्ट अंतर है।
जल्दी में गति है।
जल्दबाज़ी में दुर्गति है।
जल्दी का अर्थ तत्काल करना है।
जल्दबाज़ी तात्कालिक है।

जैसे, कोहिनूर (यदि भेंट किया गया हो तो) जल्दबाज़ी थी। उस समय का -तात्कालिक लाभ को ध्यान में रखते हुए- लिया निर्णय था। जिसमें निश्चित ही बहुत सारे स्वर शामिल नहीं होंगे।
किन्तु कोहिनूर को सीधे ब्रिटेन पहुंचाया या कि ब्रिटिश ताज में जड़ देना -जल्दी उठाया कदम था। कारोबारी बनकर आए धूर्त ब्रितानी समझते थे कि यह भारी-भरकम नायाब हीरा कल भावनाओं को आहत करने का कारण बनेगा।

एक जल्द फैसला रोचक भी है।
ब्रिटेन ने इसे ‘अशुभ’ मानते हुए टावर ऑफ लंदन में रखवा दिया। और राजघराने ने तय किया कि केवल महारानियां ही इसे पहनेंगी! रोचक इसलिए कि हो सकता है, इतने बड़े हीरे को राजा-युवराज अपने पास रख लें -और महारानी इसे कभी पा ही न सके- ऐसी आशंका से तो उनकी महारानी द्वारा कहीं इसे ‘अशुभ’ प्रचारित नहीं किया गया! एक जल्दी में किया गया प्रचार -और संभवत: जल्दबाज़ी में पाया गया निर्णय।

कोहिनूर के लिए, किन्तु हमें कोई न जल्दी है। न जल्दबाज़ी।
कोहिनूर आ भी जाए तो क्या? म्यूज़ियम में रखा जाएगा।
अब बात पीएफ की।

बजट में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने पीएफ को लेकर बड़ी ग़लतियां की थीं। टैक्स तो जल्दबाज़ी में लगाया था। फिर वापस लेना पड़ा भारी रोष के कारण। यहां उन्हें जल्दी करना चाहिए था निर्णय। जो उन्होंने नहीं किया। और इस तरह वेतन पाने वाले देश के महत्वपूर्ण मध्यम वर्ग को उन्होंने भारी नाराज़ कर दिया। 

एक जल्दबाज़ी तब की थी। फिर पीएफ को लेकर की गई नई जल्दबाज़ी का और नुकसान उन्होंने पिछले पखवाड़े में झेला। 
नए नियमों के अंतर्गत उन्होंने पीएफ निकालने पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। 58 वर्ष की उम्र से पहले नहीं निकाल सकते। नौकरी चली जाने या छोड़ने के बाद ‘बिटविन द जॉब्स’ यानी नई नौकरी पाने से पहले के समय में रकम नहीं निकाल सकते आदि। 

भारी आक्रोश के बाद मोदी सरकार को इसे भी वापस लेना पड़ा। 
वापस जल्दी लेना चाहिए था। क्योंकि इस बीच देश को भारी उग्र प्रदर्शन, हिंसक वातावरण  का सामना करना पड़ा। 

प्रश्न यह है कि लोगों के बचत के पैसे पर सरकार का अधिकार ही कैसे है? फूटी कौड़ी की सुविधाएं छोटी बचत के लिए सरकार दे नहीं रही। एक नियम, एक रुपए तक का लाभ किसी बचत के लिए ला नहीं रही। कोई प्रोत्साहन है ही नहीं। फिर जब आप कुछ दे नहीं सकते, तो लेने-छीनने और रोक लगाने का गलत अधिकार कहां से ले आए?

और देश में दो तरह के मापदण्ड, दोहरे भेदभाव वाले नियम कैसे हो सकते हैं? तनख्वाह पाने वाले सरकारी तो सवा सौ-डेढ़ सौ प्रतिशत की वेतनवृद्धियां लें -और उन्हें उनके जीपीएफ पर न कोई टैक्स का प्रावधान कभी प्रस्ताव तक के रूप में न झेलना पड़े। जबकि निजी क्षेत्र में तनख्वाह पाने वालों को उन्हीं के पैसे बच्चों की शादियां, घर बनाने और कोई आपात स्थिति में निकालने तक पर रोक लगे- ऐसा कैसे हो सकता है?

स्पष्ट है, जेटली ने बगैर प्रभावित पक्षों की दलील सुने, जल्दबाज़ी में ऐसा फैसला कर लिया। और बहुत ही बुरे परिणाम सामने आए। 
ताज़ा मामला उत्तराखंड की खंडित राजनीति का है। 
रातोरात मोदी मंत्रिमंडल ने एक आपात बैठक बुलाकर वहां राष्ट्रपति शासन लागू किया था। कांग्रेस की हरीश रावत सरकार बगावत के बाद वहां अल्पमत में आ गई थी। नौ विधायकों को अयोग्य करार देने के बाद भारी नाटकीय स्थितियों में हर कदम जल्दबाज़ी भरा लिया गया। 

इसी कारण हाईकोर्ट ने राष्ट्रपति शासन रद्द करते हुए भारी फटकार लगाई। 
किन्तु सुप्रीम कोर्ट ने उस पर रोक लगा दी।

क्योंकि यहां कारण रावत की जल्दबाज़ी थी। हाईकोर्ट के जिस फैसले में रावत को पुन: मुख्यमंत्री बनाने की बात कही गई थी उसकी प्रति प्राप्त किए बग़ैर ही रावत ने मुख्यमंत्री पद का काम संभाल लिया। देर रात मंत्रिमंडल बैठक की। 

कई फैसले भी ले लिए। 
प्रश्न यह उठता है कि जो कुछ फैसले लिए गए, वे यदि उतने ही आवश्यक थे, तो उन्होंने मुख्यमंत्री रहते क्यों नहीं लिए? 

सरकार बचाने के लिए करोड़ों की खरीद करने के प्रयास के आरोप -कैमरे में दर्ज स्टिंग- के बाद रावत हाईकोर्ट से लौटें या कि सदन में बहुमत सिद्ध कर, उनकी विश्वसनीयता पर संदेह नहीं हटेगा। जैसे कि सुप्रीम कोर्ट से रोक मिल भी गई हो, मोदी सरकार क्यों धारा 356 में इंदिरा गांधी शैली में विरोधी सरकारें बर्खास्त करने पर लौट रही है, यह प्रश्न बना ही रहेगा। 

जल्दबाज़ी करने में जितना कम समय लगता है – उतना ही लम्बा समय जल्दबाज़ी के कारण पछतावे में लगाना पड़ता है। 
जहां हमें जल्दी करनी हो, वहां हम जल्दी करें – असंभव है। किन्तु करनी ही होगी। जल्दबाज़ी रोकना असंभव है। किन्तु रोकनी ही होगी। 

हम इन्सान हैं। 
जल्दबाज़ी का काम किसका है, यह अलग से लिखने की अावश्यकता नहीं है।

ये लेख कल्पेश याग्निक (दैनिक भास्कर) द्वारा लिखा गया है ।

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पीडीपी से गठबंधन पर अरुण जेटली ने दिया विरोधिओं को करारा जवाब..

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भाजपा के वरिष्ट नेता एवं वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि उनकी पार्टी ने बीजेपी-पीडीपी की पूरी तरह भिन्न विचारधाराओं के बावजूद अलगाववादी ताकतों से लड़ने और जम्मू कश्मीर की सेवा करने के लिए गठजोड़ बनाया है। उन्होंने मंगलवार को कहा कि बीजेपी ने जम्मू कश्मीर के साथ ‘भावनात्मक और वैचारिक’ रिश्ता बनाया है।

अरुण जेटली ने कहा कि बीजेपी किसी तरह के अलगाववाद से कभी समझौता नहीं करेगी। केंद्रीय वित्त और सूचना प्रसारण मंत्री जेटली ने यहां पार्टी के एक कार्यक्रम में शामिल होते हुए कहा, ‘हमारा राजनीतिक सिद्धांत है कि हम कभी किसी तरह के अलगाववाद से समझौता नहीं करेंगे। हम इसका विरोध करेंगे।’

जेटली ने कहा, ‘आज की राजनीतिक हकीकत है कि कश्मीर क्षेत्र के मुख्यधारा के राजनीतिक दल और लोग अलगाववाद के खिलाफ हमारी लड़ाई में साथ आए हैं और हमें इस गठबंधन का इस्तेमाल इस दिशा में करना होगा।’ जेटली ने राज्य की सभी राजनीतिक ताकतों से साथ में आने और अलगाववादी ताकतों से लड़ने का अनुरोध किया।’

उन्होंने कहा कि सभी यह बात जानते हैं और पीडीपी में हमारे दोस्त भी जानते हैं कि हमारी विचारधाराएं पूरी तरह अलग हैं लेकिन ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में देश और राज्य की सेवा के लिए बीजेपी को राज्य की सेवा करने का अवसर मिला है। पीडीपी और बीजेपी ने करीब 3 महीने की अनिश्चितता के बाद महबूबा मुफ्ती की अगुवाई में राज्य में नए सिरे से सरकार बनाई है।

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जेटली जी को चुनाव तो लड़ना नहीं, फिर क्यों करें जनता की फिक्र : भाजपा सांसद

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हाल ही में भाजपा आलाकमान ने अपने नेताओं को जुबान पर लगाम लगाने का सख्त निर्देश दिया हो लेकिन नेता अपनी आदतों से बाज नहीं आ रहे हैं। कुशीनगर के भाजपा सांसद राजेश पांडेय ने सनसनीखेज बयान देकर सबको चौंका दिया है।

गोल्ड पर से एक्साइज ड्यूटी हटाने के मुद्दे पर पडरौना के स्वर्ण व्यवसायियों के बीच बैठे भाजपा सांसद ने कहा कि वित्त मंत्री अरुण जेतली को चुनाव नहीं लडऩा है इसलिए उन्हें जनता की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है। भाजपा सांसद ने कहा, ‘‘जेटली को चुनाव तो लडऩा नहीं, फिर क्यों हो जनता की फिक्र।’’

गौरतलब है की 2014 के आम चुनाव में अरुण जेटली की करारी हार हुई थी । जिसके बाद उन्हें राज्यसभा से भेजकर भाजपा ने केंद्रीय मंत्री बनाया था और वित्त मंत्रालय जैसा अहम् विभाग अरुण जेटली को मिला है ।

भाजपा कइ इस सांसद ने कहा कि एक्साइज ड्यूटी हटाने के लिए कई सांसदों ने जेटली जी से आग्रह किया लेकिन वह किसी की बात सुनने को तैयार नहीं हैं। भाजपा सांसद के इस बयान से यह जाहिर हो गया है कि पार्टी के अंदर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। मोदी को अपने सांसदों की जुबान पर लगाम कसने के लिए ठोस उपाय करना पड़ेगा नहीं तो सांसद केन्द्र सरकार की ऐसे ही किरकिरी कराते रहेंगे।

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पंजाब के लिए अमित शाह का “सिद्धू” प्लान ।

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संगठन के कामकाज से बुरी तरह नाराज भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पंजाब में विधानसभा चुनाव के लिए नई टीम तैयार करेंगे। दरअसल शनिवार को हुई बैठक में राज्य के ज्यादातर नेताओं ने शिरोमणि अकाली दल (शिअद) से नाता तोड़ने की सलाह तो दी, मगर अपने दम पर अधिकतम 60 सीटों पर ही चुनाव लड़ने की हिम्मत जुटा पाए।

पार्टी ने प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए न कहने वाले पूर्व सांसद और पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू को किसी भी रूप में राज्य में पार्टी का चेहरा बनाने का मन बनाया है। इसके लिए सिद्धू के समक्ष अप्रैल में राज्यसभा की खाली होने वाली सीट पर चुनाव लड़ने की पेशकश की जाएगी।

गौरतलब है कि राज्य में शिअद से गठबंधन बनाए रखने के लिए पार्टी के शीर्ष नेता सक्रिय हुए हैं। बताते हैं कि शनिवार को राज्य के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की पार्टी अध्यक्ष शाह के साथ बैठक कराने में गृह मंत्री राजनाथ सिंह और वित्त मंत्री अरुण जेटली की भूमिका अहम रही। जेटली ने आलाकमान को सिद्धू को मना लेने का भी भरोसा दिया है। शनिवार की बैठक से साफ हो गया है कि राज्य में भाजपा-शिअद गठबंधन बरकरार रखेगा, मगर भाजपा इस बार शिअद पर अधिक से अधिक सीट हासिल करने का दबाव डालेगी।

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