Home Tags Farmer Protest

Tag: Farmer Protest

अभय चौटाला का अपने भतीजे को चैलेंज, अगर चौधरी देवीलाल के वारिस हो तो….. कर दो

0

इनेलो नेता और किसान आंदोलन के समर्थन में इस्तीफा देने वाले ऐलनाबाद के पूर्व विधायक अभय चौटाला ने हरियाणा के डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला पर तीखा हमला बोला है।

चौटाला ने कहा कि मेरे भतीजे नरेंद्र मोदी को पत्र लिखने की बजाए हरियाणा सरकार को अपना इस्तीफा सौंप दी और किसानों की लड़ाई में साथ खड़े हों।

चौटाला ने हरियाणा सरकार के उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला को चुनौती देते हुए कहा कि अगर वो चौधरी देवीलाल के सच्चे वारिस है तो जल्द से जल्द सरकार से इस्तीफा दे दें।

उक्त बातें सिरसा अनाज मंडी का दौरा करने आये अभय चौटाला ने मीडिया से बातचीत के दौरान कही। अभय यही नही रुके उन्होंने इस दौरान भाजपा-जजपा सरकार पर कई आरोप भी लगाए।

अभय ने कहा कि दुष्यंत के पिता अजय चौटाला कहते हैं कि दुष्यंत का इस्तीफा उनकी जेब में है लेकिन वे इस्तीफे के नाम पर केवल राजनीति कर रहे हैं। अभय ने कहा अब अजय चौटाला जेल में वापस लौट गए हैं और इस्तीफा अभी भी अपनी जेब में होने का दावा करते हैं। अब अगर जनता जजपा के नेताओं से इस्तीफे की बात कहेगी तो कहने लगेंगे अजय चौटाला जेल में वापस लौट गए है इस्तीफा कैसे देंगे। कुल मिलाकर ये लोग चाहते ही नहीं हैं इस्तीफा देना।

जजपा की गुटबाजी पर तंज कसते हुए अभय ने कहा कि टोहाना के विधायक बार-बार भाजपा-जजपा सरकार के खिलाफ बयानबाजी करते हैं। अब दुष्यंत चौटाला देवेंद्र बबली को शांत करवाने के लिए उनको मंत्रिमंडल में शामिल करवाने का ड्रामा रच रहे हैं लेकिन सच्चाई यह है कि दुष्यंत देवेंद्र बबली की बजाए दिग्विजय चौटाला को मंत्री बनाना चाहते हैं। 

अभय के मुताबिक दुष्यंत अपने भाई को मंत्री बनाने के लिए ऐलनाबाद सीट से उप चुनाव लड़वाना चाहता है। अगर ऐसा होता है तो दिग्विजय चौटाला का ऐलनाबाद उप चुनाव के लिए स्वागत है। उन्होंने कहा कि अगर दिग्विजय चौटाला देवीलाल की नीतियों पर चल रहे हैं तो ऐलनाबाद सीट से चुनाव लड़कर देख लें उनको हकीकत पता चल जाएगी।

26 जनवरी के किसान आंदलोन के बाद 400 किसान लापता

0

किसान परेड के दौरान 26 जनवरी को लाल किला और दिल्ली के विभिन्न इलाकों में हिंसा के दौरान किसानों के लापता होने का मामला पंजाब में सियासी तौर पर गरमाने लगा है। सूबे के किसान संगठनों और धार्मिक संगठनों ने 400 से अधिक किसानों व नौजवानों के लापता होने का आरोप लगाया है और इस संबंध में दिल्ली पुलिस पर उंगली उठाई जा रही है।

पंजाब से जुड़े कई किसान संगठनों और धार्मिक संगठनों ने आरोप लगाया है कि दिल्ली हिंसा के दौरान 400 से ज्यादा युवा और बुजुर्ग किसान लापता हैं। अमृतसर के खालड़ा मिशन ने आरोप लगाया है कि गायब हुए सभी लोग दिल्ली पुलिस की अवैध हिरासत में हैं।

पंजाब के मानवाधिकार संगठन के जांच अधिकारी सरबजीत सिंह वेरका ने दिल्ली पुलिस पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को बिना किसी केस के ज्यादा समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है, इसलिए पकड़े गए लोगों के बारे में पुलिस जानकारी दे।

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के वकील हाकम सिंह का कहना है कि पंजाब के 80-90 नौजवान 26 जनवरी को सिंघु और टिकरी बॉर्डर गए थे। हिंसा की घटना के बाद वे सभी नौजवान किसान अब तक अपने शिविरों में नहीं लौटे हैं। वकीलों का एक ग्रुप उन्हें ढूंढने की कोशिश में जुटा है और इसके लिए हम पुलिस, किसान संगठनों और अस्पतालों के संपर्क में हैं।

राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह समेत कई दिग्गज नेताओं ने राजभवन में सौपा कृषि कानून के खिलाफ ज्ञापन

0

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह(Digvijay Singh) के नेतृत्व में कांग्रेस के नेता राजभवन(Governor House) पहुंचे और अपना ज्ञापन सौंपा। कई दिग्गज नेता जैसे जयवर्धन सिंह, पीसी शर्मा, कुणाल चौधरी भी शामिल रहे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की तरफ से लिखे गए इस ज्ञापन में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से कृषि कानूनों को वापस लेने का आग्रह किया गया है।

नया कृषि कानून किसी भी रूप में देश के अन्न दाताओं के लिए सही नहीं हैं। चार पन्नों के इस ज्ञापन में कुल 9 बिंदुओं के आधार पर बताया गया कि कृषि कानूनों का क्यों इतना विरोध हो रहा है और इन्हें रद्द करना क्यों ज़रूरी है। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की तरफ से यह ज्ञापन उनके अतिरिक्त सचिव राजेश कुमार कौल ने स्वीकार किया।

आज कांग्रेस ने भोपाल में कृषि कानूनों के खिलाफ ज़ोरदार प्रदर्शन किया। कांग्रेस के प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने कांग्रेस नेताओं पर बर्बरतापूर्ण कार्रवाई करनी शुरू कर दी। पुलिस ने लाठीचार्ज करने के साथ आंसू गैस के गोले भी छोड़े। पुलिस की इस कार्रवाई में कांग्रेस नेताओं के साथ किसानों, महिलाओं और मीडियाकर्मियों को भी चोट आईं।

राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह समेत 20 कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था। पुलिस ने कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर केन्द्रीय जेल भेजा था। कांग्रेस ने इस कार्रवाई को लोकतंत्र की हत्या करार दिया है। कांग्रेस नेताओं ने पुलिस की कार्रवाई पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि कांग्रेस किसानों के लिए संघर्ष करती रहेगी। सरकार की इस दमनकारी नीति के विरुद्ध कांग्रेस दबने और डरने वाली नहीं है।

शुक्रवार को भोपाल में हो रहे किसान आंदोलन में पुलिस प्रशासन ने की यह बड़ी कार्यवाही

0

किसानों का प्रदर्शन पूरे भारत मे अब उर्ग हो चुका है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान(Shivraj Singh Chauhan) ने भी किसानों के खिलाफ प्रशासन को लगा दिया है। भोपाल(Bhopal) में धरने पर बैठे किसानों को शुक्रवार देर रात पुलिस ने हटा दिया। पुलिस ने मौजूदा जगह पहुच कर टेंट और माइक भी हटवा दिए। विजय कुमार जो अखिल भारतीय क्रांतिकारी किसान सभा मध्यप्रदेश के संयोजक है उन्होंने बताया कि , किसान आंदोलन के समर्थन में भोपाल के करोंद कृषि उपज मंडी के गेट के सामने संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में चल रहे शांतिपूर्ण धरने को आधीरात में बलपूर्वक हटाया गया है

उन्होंने बताया कि यह कार्यवाही इस सरकार के किसान विरोधी चेहरे को उजागर करती है। भाजपा की इस तानाशाही की हम सभी निंदा करते हैं। अपने आप को किसान बताने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान किसानों को विरोध दर्ज कराने का अधिकार भी नहीं दे रहे हैं।

बताया जा रहा है कि धरने में सीहोर, विदिशा, रायसेन और भोपाल संभाग के किसान संगठन बैठे थे। उसके अलावा जिला स्तर पर भी प्रदर्शन जारी है। बड़ी बात यह है कि 26 जनवरी को विरोध में किसान अपना विरोध दर्ज करने के लिए परेड निकालेगी और इसमें ट्रैक्टर और बाइक रहेंग ।

किसान संगठनों ने भोपाल में 21 जनवरी की रात धरना शुरू किया था, लेकिन यह धरना 48 घंटे भी नहीं चला और पुलिस ने इसे बर्बरता से हटा दिया। यह भी अभी साफ नही हुआ है कि इस किसान आंदोलन के लिए संगठन के अध्यक्ष ने कलेक्टर से अनुमति ली थी या नहीं।

केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच नहीं बन पा रही है कृषि कानून को लेकर सहमति

0

बुधवार को किसान संगठनों और केंद्र सरकार के बीच 10वें दौर की बातचीत खत्म हो गई और किसी भी नतीजे पर नहीं पहुची। बैठक के दौरान सरकार ने सहमति बनने तक कृषि कानूनों को स्थगित करने का प्रस्ताव दिया है। सरकार के प्रस्ताव को लेकर किसान नेताओं ने विज्ञान भवन में अलग से बैठक की। कुछ देर बैठक करने के बाद किसान नेताओं ने तय किया कि वह गुरुवार को अन्य किसानों से बातचीत करने के बाद ही फैसला लेंगे।

केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच होने वाली 10वें दौर की वार्ता आज नई दिल्ली में विज्ञान भवन में सम्पन्न हुई। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल तथा वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री सोम प्रकाश के अलावा विभिन्न किसान संगठनों के प्रतिनिधि बैठक में मौजूद रहे।

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर पत्रकारों को बताया कि बातचीत के दौरान सरकार की ओर से यह कहा गया कि तीनों कृषि कानूनों पर एक या डेढ़ साल के लिए अमल को रोका जा सकता है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि किसान संगठनों ने इस बात को गंभीरता से लिया है और वह इस प्रस्ताव पर कल विचार करके अपना फैसला 22 जनवरी को होने वाली बैठक में स्पष्ट करेंगे। तोमर ने कहा कि बातचीत सही दिशा में आगे बढ़ रही है और अगले दौर की बातचीत में किसानों से संबंधित मुद्दों पर कोई संभावित हल निकाल लिया जाएगा।

केंद्रीय मंत्री ने गणतंत्र दिवस के मौके पर प्रस्तावित ट्रैक्टर परेड पर पुर्नविचार की अपील की

0

ग्वालियर पहुंचे नरेंद्र सिंह तोमर से सोमवार को संवाददाताओं ने जब किसान आंदोलन और किसानों के गणतंत्र दिवस के मौके पर दिल्ली में ट्रैक्टर परेड निकालने के ऐलान को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि सभी किसान यूनियनों से आग्रह करता हूं कि 26 जनवरी हमारा गणतंत्र दिवस है, यह राष्ट्रीय त्योहार है, यह आजादी बड़ी कुर्बानी के बाद देश को मिली है, किसान के किसी भी कदम से गणतंत्र दिवस की गरिमा प्रभावित न हो यह जिम्मेवारी किसान की भी है।

किसानों की माली हालत सुधारने के लिए बीते छह सालों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने कई कदम उठाए हैं। किसानी का क्षेत्र फायदे का क्षेत्र बने, नए नौजवान भी इस ओर आकर्षित हो सकें, किसान तकनीक का उपयोग करके महंगी फसलों की ओर जा पाए। इसके लिए दो नए कानून और एक बिल में संशोधन कुल मिलाकर तीन नए कानून बनाए गए हैं।

किसान यूनियनों से हर बार यही कहा गया है कि, वह प्रावधान पर चर्चा करें, जिस प्रावधान से किसान को तकलीफ है उस पर विचार करने के लिए और उसमें संशोधन करने के लिए सरकार खुले मन से चर्चा कर रही है और करना चाहती है मगर यूनियन की तरफ से प्रावधान पर चर्चा नहीं हो पा रही है।

सुप्रीम कोर्ट की केन्द्र सरकार को फटकार, मुख्य न्यायाधीश बोले, आपमें समझ है तो कानून पर लगाएं रोक

0

किसान आंदोलन से जुड़ी याचिकाओं सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमें पता नहीं कि सरकार इन कानूनों को लेकर कैसे डील कर रही है। सरकार को फटकार लगाते हुए मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने सरकार से कहा कि अगर आप में समझ है तो इन कानूनों पर अमल ना करें। सुनवाई करने वाली पीठ में न्यायमूर्ति एस. एस. बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी. सुब्रमण्यम भी शामिल थे।
या तो सरकार लगाए रोक या हम लगाएंगे- कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि या तो आप इन कानूनों पर रोक लगाइए या फिर हम लगा देंगे। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि सिर्फ विवादित हिस्सों पर ही रोक लगाई जाए लेकिन कोर्ट का कहना है कि नहीं हम पूरे कानून पर रोक लगाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि लोग मर रहे हैं और हम कानूनों पर रोक नहीं लगा रहे हैं।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि नए कृषि कानूनों को लेकर जिस तरह से सरकार और किसानों के बीच बातचीत चल रही है, उससे हम बेहद निराश हैं। कोर्ट ने आगे कहा कि आपके राज्य कानूनों के खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं। हम फिलहाल इन कानूनों को निरस्त करने की बात नहीं कर रहे हैं, यह काफी नाजुक स्थिति है।

इसके आगे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि हम नहीं जानते कि आप समाधान का हिस्सा हैं या समस्या का हिस्सा हैं। इसके अलावा कोर्ट ने कहा कि हम कमेटी बनाने जा रहे हैं, अगर किसी को दिक्कत है तो वो बोल सकता है। सभी आदेश एक ही सुनवाई के दौरान नहीं दी जा सकती है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि आपने इसे उचित ढंग से नहीं संभाला है, हमें इस पर एक्शन लेना ही होगा।

कोर्ट ने आगे कहा कि हमारे सामने एक भी ऐसी याचिका नहीं है, जो यह बताए कि ये कानून किसानों के हित में हैं। इसके अलावा कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसी आशंका है कि एन दिन आंदोलन में हिंसा हो सकती है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि क्या किसान नागरिकों के लिए रास्ता छोड़ेंगे। कोर्ट ने कहा कि हम बीच का रास्ता निकालना चाहते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा कि केंद्र सरकार को इस सब की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। केंद्र सरकार कानून ला रही है और इसे बेहतर तरीके से कर सकती थी। कोर्ट ने आगे कहा कि अगर कुछ गलत हो गया तो इसके जिम्मेदार हम सब होंगे। हम नहीं चाहते कि हमारे हाथ किसी के खून से रंगे हो।

कोर्ट ने किसानों से कहा कि हम कानूनों पर रोक लगा सकते हैं और आप अपना आंदोलन जारी कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने किसान संगठनों से कहा कि चाहे आप विश्वास करें या ना करें, लेकिन हम देश का सुप्रीम कोर्ट हैं और हम अपना काम करेंगे।कोर्ट ने आगे कहा कि हमें नहीं पता कि लोग सामाजिक दूरी के नियम का पालन कर रहे हैं कि नहीं लेकिन हमें उनके (किसानों) भोजन पानी की चिंता है।

सरकार के वकील और अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि अदालतों का इतिहास रहा है कि वो कानून पर रोक नहीं लगा सकती। केके वेणुगोपाल ने कहा कि कोर्ट तब तक संसद के कानून पर रोक नहीं लगा सकती, जब तक कानून विधायी क्षमता के बिना पारित हुआ हो या फिर कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो।

इस पर जबाव देते हुए कोर्ट ने कहा कि हम कानून पर रोक नहीं लगा रहे हैं लेकिन उनके अमल होने पर रोक लगा रहे हैं। इस पर अटॉर्नी जनरल ने सवाल किया कि कोर्ट किन हिस्सों के अमल होने पर रोक लगाएगी तो इस पर कोर्ट ने जवाब देते हुए कहा कि इस बात को हम दोहराना नहीं चाहते लेकिन कोर्ट कानून पर रोक नहीं लगा रहा है।

वहीं किसान संगठन के प्रतिनिधि दुष्यंत दवे ने रामलीला मैदान में जाने की अनुमति मांगी है। दुष्यंत दवे ने कहा कि हम रामलीला मैदान में जाना चाहते हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर आंदोलन के दौरान हिंसा भड़कती है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?

वहीं आम जनता के वकील हरीश साल्वे ने कहा कि क्या किसान संगठन आम जनता की परेशानी को समझ रहे हैं। वहीं कोर्ट ने आगे कहा कि हम कानून पर नहीं बल्कि कानून के अमल होने पर रोक लगाएंगे। हरीश साल्वे ने कहा कि कोर्ट साफ करे कि आंदोलनकारियों की बात सही ठहरा रहे हैं, इससे गलत संदेश जाएगा।

इधर कोर्ट ने कहा कि हम कानून की वैधता पर आदेश सभी पक्षो को सुनकर देंगे। इधर वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने सुझाव दिया है कि इस मामले को कल के लिए स्थगित कर दिया जाए। वकील ने कोर्ट ने इस पर विचार करने का अनुरोध किया है।

कोर्ट ने एक याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि हम एक कमेटी बनाने औऱ कानून के अमल पर रोक लगाने पर विचार कर रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि हम कुछ नहीं कह रहे हैं, आंदोलन को जारी रखिए लेकिन अगर कुछ हो गया तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

कोर्ट ने आगे कहा कि हम यह सुझाव दे रहे हैं कि समिति के समक्ष वार्ता को सुविधाजनक बनाने के लिए कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगाई जा सकती है। केंद्र और किसान संगठनों के बीच सात जनवरी को हुई आठवें दौर की बाचतीच में भी कोई समाधान निकलता नजर नहीं आया क्योंकि केंद्र ने विवादास्पद कानून निरस्त करने से इनकार कर दिया था जबकि किसान नेताओं ने कहा था कि वे अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ने के लिये तैयार हैं और उनकी “घर वापसी” सिर्फ “कानून वापसी” के बाद होगी।