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शिवराज कैबिनेट ने दी किसानों को बड़ी सौगात , 2 हजार करोड़ की ब्याज राशि की जाएगी माफ

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भोपाल। किसानों के हित को देखते हुए शिवराज कैबिनेट ने आज किसानों के लिए कई बड़े फैसले लिए। किसानों के लिए गेहूं खरीदी की तारीख 10 मई से बढ़ाकर 20 मई की गई है। 30 अप्रैल तक बेची जाने वाली फसल पर मिलने वाला जीरो प्रतिशत ब्याज का लाभ अब 20 मई तक कर दिया गया है।

प्रदेश के सहकारिता मंत्री अरविंद भदौरिया ने कहा कि कैबिनेट बैठक में किसानों के हित में बड़ा फैसला लिया गया है। 31 मार्च की 2023 तक में डिफॉल्टर किसान जिनका दो लाख रुपये का कर्ज बकाया है, सरकार उन सभी का ब्याज भरेगी।

जानकारी के अनुसार इसमें 11 लाख 19 हजार डिफॉल्टर किसानों की लगभग 2 हजार करोड़ से अधिक की ब्याज राशि माफ की जाएगी। इसके लिए 12 तारीख को सूची चस्पा की जाएगी। 13 से 15 मई तक पैक्स सोसाइटियों के ज़रिए आवेदन लिए जाएंगे। 16 से 18 मई तक आवेदनों की जांच की जाएगी और 22 मई को बैंकों में पैसा ट्रांसफर कर दिया जाएगा।

वहीं 25 मई को राज्य स्तरीय किसान सम्मेलन होने जा रहा है, जिसमें प्रदेश के सभी किसानों को बुलाया जाएगा। 26 मई को समितियों के माध्यम से किसानों को डिफॉल्ट मुक्त प्रमाण पत्र दिया जाएगा। खाद बीज का वितरण 1 जून से किया जाएगा।

जानकारी देते हुए कृषि मंत्री कमल पटेल ने कहा कि कैबिनेट में फैसला लिया गया कि अब गेंहू खरीद की तारीख 10 मई से बढ़ाकर 20 मई कर दी गई है। अब 20 मई तक जो भी किसान फसल बेचेगा उन सभी को जीरो परसेंट का लाभ मिलेगा।

प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने बताया कि छतरपुर के गौरीहार में नए अनुभाग एवं 11 पद स्वीकृत किए गए हैं। देवास में नए अनुभाग टोंकखुर्द की स्वीकृति एवं इसमें कुल 69 पटवारी हल्के शामिल कर 11 पद स्वीकृत किए गए हैं। 10 मई से मुख्यमंत्री जनसेवा अभियान पुन: प्रारंभ हो रहा है, इसमें 67 तरह की सेवाएं चिह्नित की गई हैं।

उन्होंने कहा कि पहले चरण के लंबित प्रकरणों को निपटाया जाएगा एवं सीएम हेल्पलाइन में लंबित समस्याओं का निराकरण किया जाएगा। साथ ही मणिपुर से प्रदेश के 24 बच्चों को लाने एवं उनसे संवाद स्थापित किया जा रहा है। चीन में मृत हुई रीवा की रहवासी को भारत लाए जाने का खर्च मध्यप्रदेश सरकार उठाएगी।

ओलावृष्टि से फसल को हुए नुकसान को लेकर सीएम शिवराज ने की कलेक्टरों से चर्चा

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भोपाल। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश के किसानों की मुश्किलें दूर करने को लेकर कलेक्टरों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस द्वारा चर्चा की। सीएम ने कहा कि प्रदेश में गेहूं उपार्जन के बाद किसानों को राशि के भुगतान का कार्य बिना विलंब के किया जाए। किसानों को किसी तरह की कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। उपार्जन केन्द्रों पर आवश्यक बैठक व्यवस्था और पेयजल प्रबंध भी होना चाहिए। उपार्जित गेहूं की सुरक्षा, तोल कांटे, हम्माल की व्यवस्था, परिवहन कार्य और अनाज को गोदाम तक पहुंचाने का कार्य भी सुचारू रूप से किया जाए।

ओलावृष्टि से गेहूं की फसल को काफी क्षति पहुंची है और चमकविहीन गेहूं उपार्जित हुआ है। इस मुश्किल को दूर करने के लिए किसानों को पूर्ण राशि का भुगतान किया जाए। इस कार्य में जन-प्रतिनिधि भी सहयोग करें। मुख्यमंत्री चौहान ने शुक्रवार को वीडियो कॉन्फ्रेंस द्वारा कलेक्टर्स से चर्चा के दौरान ये सभी ज़रूरी कदम उठाने के लिए कहा।
मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि कर्जमाफी के कारण जो किसान डिफॉल्टर मान लिए गए थे, उनके ब्याज की राशि का भुगतान राज्य सरकार द्वारा जल्द ही किया जाएगा।

प्रदेश में 17 मार्च के बाद और अप्रैल के पहले सप्ताह में हुई ओलावृष्टि से संबंधित सर्वे कार्य लगभग पूरा हो चला है। राज्य शासन द्वारा राहत राशि के लिए नई दरों का निर्धारण भी किया गया है। उसके मुताबिक ही किसानों के खातों में राशि का अंतरण शीघ्र किया जाएगा। इसके लिए ज़रूरी तैयारियां अंतिम चरण में हैं।
सीएम ने कहा कि आगामी 10 से 25 मई की अवधि में प्रदेश में नामांतरण और बंटवारे के साथ सीएम हेल्पलाइन में दर्ज शिकायतों का शिविर लगाकर समाधान किया जाएगा। यह कार्य पिछले वर्ष लगाए गए मुख्यमंत्री जन सेवा शिविर की तर्ज पर किया जाएगा। इसके लिए कलेक्टर्स आवश्यक तैयारियां शुरू कर दें। शहरों में वार्ड स्तर और ग्राम पंचायतों में शिविर लगाकर जनता की समस्याओं का समाधान किया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने कॉन्फ्रेंस में लाड़ली बहना योजना का भी ज़िक्र किया और कहा कि पूरे प्रदेश में लाडली बहना योजना को लेकर जागरूकता देखी जा रही है। प्रदेश की बहनों में योजना के प्रति बहुत उत्साह है। मुख्यमंत्री ने लाड़ली बहना योजना के लिए आवेदन दर्ज किए जाने के कार्य में जन-प्रतिनिधियों के सहयोग, प्रशासनिक अमले की सक्रियता एवं किए गए परिश्रम के लिए बधाई दी।

मध्यप्रदेश के इस जिले में झोलाछाप डॉक्टर कर रहे है खेतों में इलाज

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कोरोना से पूरे देश मे हाल बत्तर हो रही है। ऐसे में मरीजों की बढती संख्या के कारण ग्रामीण इलाकों की स्वास्थ्य सेवाओं के हाल बुरा होता जा रहा है। हालत इतने बुरे है कि झोलाछाप डॉक्टर पेड़ों पर बोतलें लटका कर मरीजों का इलाज कर रहे हैं।

दरअसल ये मामला आगर मालवा जिले का है। ग्राम धानियाखेड़ी से करीब आधा किलोमीटर दूर यह खेत-अस्पताल देखा जा सकता है। यहां एक बगीचे में दरी और कार्टन पर ही मरीजों को लेटाकर निजी डाॅक्टर पेड़ पर लटकी हुई बोतलों से उनका उपचार कर रहे हैं। खेत को अस्पताल बनाने वाले झोलाछाप डॉक्टर का नाम देवीलाल बताया जा रहा है। अफसरों की जानकारी में होने के बाद भी कोई इसपर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।

बता दे कि इस अस्पताल में करीब 10 गांव के मरीज बड़ी संख्या में अपना इलाज करवाने के लिए पहुंच गए है । यहां इलाज करा रहे मरीजों को न तो कोरोना का खौफ है और न ही जान जाने का डर है।

इस मामले में सुसनेर बीएमओ मनीष कुरील का कहना है कि ऐसे चिकित्सकों पर कार्रवाई भी की जा रही है। साथ ही उनको समझाइश भी दी जा रही है कि मरीजों को सही सलाह दे।

26 जनवरी के किसान आंदलोन के बाद 400 किसान लापता

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किसान परेड के दौरान 26 जनवरी को लाल किला और दिल्ली के विभिन्न इलाकों में हिंसा के दौरान किसानों के लापता होने का मामला पंजाब में सियासी तौर पर गरमाने लगा है। सूबे के किसान संगठनों और धार्मिक संगठनों ने 400 से अधिक किसानों व नौजवानों के लापता होने का आरोप लगाया है और इस संबंध में दिल्ली पुलिस पर उंगली उठाई जा रही है।

पंजाब से जुड़े कई किसान संगठनों और धार्मिक संगठनों ने आरोप लगाया है कि दिल्ली हिंसा के दौरान 400 से ज्यादा युवा और बुजुर्ग किसान लापता हैं। अमृतसर के खालड़ा मिशन ने आरोप लगाया है कि गायब हुए सभी लोग दिल्ली पुलिस की अवैध हिरासत में हैं।

पंजाब के मानवाधिकार संगठन के जांच अधिकारी सरबजीत सिंह वेरका ने दिल्ली पुलिस पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को बिना किसी केस के ज्यादा समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है, इसलिए पकड़े गए लोगों के बारे में पुलिस जानकारी दे।

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के वकील हाकम सिंह का कहना है कि पंजाब के 80-90 नौजवान 26 जनवरी को सिंघु और टिकरी बॉर्डर गए थे। हिंसा की घटना के बाद वे सभी नौजवान किसान अब तक अपने शिविरों में नहीं लौटे हैं। वकीलों का एक ग्रुप उन्हें ढूंढने की कोशिश में जुटा है और इसके लिए हम पुलिस, किसान संगठनों और अस्पतालों के संपर्क में हैं।

शुक्रवार को भोपाल में हो रहे किसान आंदोलन में पुलिस प्रशासन ने की यह बड़ी कार्यवाही

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किसानों का प्रदर्शन पूरे भारत मे अब उर्ग हो चुका है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान(Shivraj Singh Chauhan) ने भी किसानों के खिलाफ प्रशासन को लगा दिया है। भोपाल(Bhopal) में धरने पर बैठे किसानों को शुक्रवार देर रात पुलिस ने हटा दिया। पुलिस ने मौजूदा जगह पहुच कर टेंट और माइक भी हटवा दिए। विजय कुमार जो अखिल भारतीय क्रांतिकारी किसान सभा मध्यप्रदेश के संयोजक है उन्होंने बताया कि , किसान आंदोलन के समर्थन में भोपाल के करोंद कृषि उपज मंडी के गेट के सामने संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में चल रहे शांतिपूर्ण धरने को आधीरात में बलपूर्वक हटाया गया है

उन्होंने बताया कि यह कार्यवाही इस सरकार के किसान विरोधी चेहरे को उजागर करती है। भाजपा की इस तानाशाही की हम सभी निंदा करते हैं। अपने आप को किसान बताने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान किसानों को विरोध दर्ज कराने का अधिकार भी नहीं दे रहे हैं।

बताया जा रहा है कि धरने में सीहोर, विदिशा, रायसेन और भोपाल संभाग के किसान संगठन बैठे थे। उसके अलावा जिला स्तर पर भी प्रदर्शन जारी है। बड़ी बात यह है कि 26 जनवरी को विरोध में किसान अपना विरोध दर्ज करने के लिए परेड निकालेगी और इसमें ट्रैक्टर और बाइक रहेंग ।

किसान संगठनों ने भोपाल में 21 जनवरी की रात धरना शुरू किया था, लेकिन यह धरना 48 घंटे भी नहीं चला और पुलिस ने इसे बर्बरता से हटा दिया। यह भी अभी साफ नही हुआ है कि इस किसान आंदोलन के लिए संगठन के अध्यक्ष ने कलेक्टर से अनुमति ली थी या नहीं।

केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच नहीं बन पा रही है कृषि कानून को लेकर सहमति

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बुधवार को किसान संगठनों और केंद्र सरकार के बीच 10वें दौर की बातचीत खत्म हो गई और किसी भी नतीजे पर नहीं पहुची। बैठक के दौरान सरकार ने सहमति बनने तक कृषि कानूनों को स्थगित करने का प्रस्ताव दिया है। सरकार के प्रस्ताव को लेकर किसान नेताओं ने विज्ञान भवन में अलग से बैठक की। कुछ देर बैठक करने के बाद किसान नेताओं ने तय किया कि वह गुरुवार को अन्य किसानों से बातचीत करने के बाद ही फैसला लेंगे।

केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच होने वाली 10वें दौर की वार्ता आज नई दिल्ली में विज्ञान भवन में सम्पन्न हुई। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल तथा वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री सोम प्रकाश के अलावा विभिन्न किसान संगठनों के प्रतिनिधि बैठक में मौजूद रहे।

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर पत्रकारों को बताया कि बातचीत के दौरान सरकार की ओर से यह कहा गया कि तीनों कृषि कानूनों पर एक या डेढ़ साल के लिए अमल को रोका जा सकता है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि किसान संगठनों ने इस बात को गंभीरता से लिया है और वह इस प्रस्ताव पर कल विचार करके अपना फैसला 22 जनवरी को होने वाली बैठक में स्पष्ट करेंगे। तोमर ने कहा कि बातचीत सही दिशा में आगे बढ़ रही है और अगले दौर की बातचीत में किसानों से संबंधित मुद्दों पर कोई संभावित हल निकाल लिया जाएगा।

पीएम मोदी से ज्यादा समझदार हैं किसान, उन्हें पता कि देश में क्या हो रहा है: राहुल गांधी का सरकार पर हमला

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कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आज मीडिया से बात करते हुए कहा कि देश की आम जनता की लड़ाई आज किसान लड़ रहे हैं। वे हमारे भोजन की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमें उनका पूरा समर्थन करना चाहिए। अभी तक खेती में किसी का एकाधिकार नहीं था। इन कृषि कानूनों से किसानों का हाल आजादी से पहले वाला हो जाएगा। सरकार को इन तीनों कानून को वापस लेना होगा। हम सरकार पर दबाव बना रहे हैं। ये प्रेस कॉन्फ्रेस भी सरकार पर दबाव बनाने के लिए की जा रही है। किसानों को न थकाया जा सकता है और न ही बेवकूफ बनाया जा सकता है। किसान प्रधानमंत्री मोदी से ज्यादा समझदार हैं। उन्हें पता है कि देश में क्या हो रहा है।

“आज देश के सामने एक त्रासदी आ गई है, सरकार देश की समस्या नजरअंदाज करना चाहती है और गलत सूचना दे रही है। मैं अकेले किसानों के बारे में बोलने वाला नहीं हूं क्योंकि यह त्रासदी का हिस्सा है। यह युवाओं के लिए महत्वपूर्ण है। यह वर्तमान के बारे में नहीं बल्कि आपके भविष्य के बारे में है।”

केंद्रीय मंत्री ने गणतंत्र दिवस के मौके पर प्रस्तावित ट्रैक्टर परेड पर पुर्नविचार की अपील की

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ग्वालियर पहुंचे नरेंद्र सिंह तोमर से सोमवार को संवाददाताओं ने जब किसान आंदोलन और किसानों के गणतंत्र दिवस के मौके पर दिल्ली में ट्रैक्टर परेड निकालने के ऐलान को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि सभी किसान यूनियनों से आग्रह करता हूं कि 26 जनवरी हमारा गणतंत्र दिवस है, यह राष्ट्रीय त्योहार है, यह आजादी बड़ी कुर्बानी के बाद देश को मिली है, किसान के किसी भी कदम से गणतंत्र दिवस की गरिमा प्रभावित न हो यह जिम्मेवारी किसान की भी है।

किसानों की माली हालत सुधारने के लिए बीते छह सालों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने कई कदम उठाए हैं। किसानी का क्षेत्र फायदे का क्षेत्र बने, नए नौजवान भी इस ओर आकर्षित हो सकें, किसान तकनीक का उपयोग करके महंगी फसलों की ओर जा पाए। इसके लिए दो नए कानून और एक बिल में संशोधन कुल मिलाकर तीन नए कानून बनाए गए हैं।

किसान यूनियनों से हर बार यही कहा गया है कि, वह प्रावधान पर चर्चा करें, जिस प्रावधान से किसान को तकलीफ है उस पर विचार करने के लिए और उसमें संशोधन करने के लिए सरकार खुले मन से चर्चा कर रही है और करना चाहती है मगर यूनियन की तरफ से प्रावधान पर चर्चा नहीं हो पा रही है।

सुप्रीम कोर्ट की केन्द्र सरकार को फटकार, मुख्य न्यायाधीश बोले, आपमें समझ है तो कानून पर लगाएं रोक

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किसान आंदोलन से जुड़ी याचिकाओं सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमें पता नहीं कि सरकार इन कानूनों को लेकर कैसे डील कर रही है। सरकार को फटकार लगाते हुए मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने सरकार से कहा कि अगर आप में समझ है तो इन कानूनों पर अमल ना करें। सुनवाई करने वाली पीठ में न्यायमूर्ति एस. एस. बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी. सुब्रमण्यम भी शामिल थे।
या तो सरकार लगाए रोक या हम लगाएंगे- कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि या तो आप इन कानूनों पर रोक लगाइए या फिर हम लगा देंगे। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि सिर्फ विवादित हिस्सों पर ही रोक लगाई जाए लेकिन कोर्ट का कहना है कि नहीं हम पूरे कानून पर रोक लगाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि लोग मर रहे हैं और हम कानूनों पर रोक नहीं लगा रहे हैं।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि नए कृषि कानूनों को लेकर जिस तरह से सरकार और किसानों के बीच बातचीत चल रही है, उससे हम बेहद निराश हैं। कोर्ट ने आगे कहा कि आपके राज्य कानूनों के खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं। हम फिलहाल इन कानूनों को निरस्त करने की बात नहीं कर रहे हैं, यह काफी नाजुक स्थिति है।

इसके आगे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि हम नहीं जानते कि आप समाधान का हिस्सा हैं या समस्या का हिस्सा हैं। इसके अलावा कोर्ट ने कहा कि हम कमेटी बनाने जा रहे हैं, अगर किसी को दिक्कत है तो वो बोल सकता है। सभी आदेश एक ही सुनवाई के दौरान नहीं दी जा सकती है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि आपने इसे उचित ढंग से नहीं संभाला है, हमें इस पर एक्शन लेना ही होगा।

कोर्ट ने आगे कहा कि हमारे सामने एक भी ऐसी याचिका नहीं है, जो यह बताए कि ये कानून किसानों के हित में हैं। इसके अलावा कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसी आशंका है कि एन दिन आंदोलन में हिंसा हो सकती है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि क्या किसान नागरिकों के लिए रास्ता छोड़ेंगे। कोर्ट ने कहा कि हम बीच का रास्ता निकालना चाहते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा कि केंद्र सरकार को इस सब की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। केंद्र सरकार कानून ला रही है और इसे बेहतर तरीके से कर सकती थी। कोर्ट ने आगे कहा कि अगर कुछ गलत हो गया तो इसके जिम्मेदार हम सब होंगे। हम नहीं चाहते कि हमारे हाथ किसी के खून से रंगे हो।

कोर्ट ने किसानों से कहा कि हम कानूनों पर रोक लगा सकते हैं और आप अपना आंदोलन जारी कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने किसान संगठनों से कहा कि चाहे आप विश्वास करें या ना करें, लेकिन हम देश का सुप्रीम कोर्ट हैं और हम अपना काम करेंगे।कोर्ट ने आगे कहा कि हमें नहीं पता कि लोग सामाजिक दूरी के नियम का पालन कर रहे हैं कि नहीं लेकिन हमें उनके (किसानों) भोजन पानी की चिंता है।

सरकार के वकील और अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि अदालतों का इतिहास रहा है कि वो कानून पर रोक नहीं लगा सकती। केके वेणुगोपाल ने कहा कि कोर्ट तब तक संसद के कानून पर रोक नहीं लगा सकती, जब तक कानून विधायी क्षमता के बिना पारित हुआ हो या फिर कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो।

इस पर जबाव देते हुए कोर्ट ने कहा कि हम कानून पर रोक नहीं लगा रहे हैं लेकिन उनके अमल होने पर रोक लगा रहे हैं। इस पर अटॉर्नी जनरल ने सवाल किया कि कोर्ट किन हिस्सों के अमल होने पर रोक लगाएगी तो इस पर कोर्ट ने जवाब देते हुए कहा कि इस बात को हम दोहराना नहीं चाहते लेकिन कोर्ट कानून पर रोक नहीं लगा रहा है।

वहीं किसान संगठन के प्रतिनिधि दुष्यंत दवे ने रामलीला मैदान में जाने की अनुमति मांगी है। दुष्यंत दवे ने कहा कि हम रामलीला मैदान में जाना चाहते हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर आंदोलन के दौरान हिंसा भड़कती है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?

वहीं आम जनता के वकील हरीश साल्वे ने कहा कि क्या किसान संगठन आम जनता की परेशानी को समझ रहे हैं। वहीं कोर्ट ने आगे कहा कि हम कानून पर नहीं बल्कि कानून के अमल होने पर रोक लगाएंगे। हरीश साल्वे ने कहा कि कोर्ट साफ करे कि आंदोलनकारियों की बात सही ठहरा रहे हैं, इससे गलत संदेश जाएगा।

इधर कोर्ट ने कहा कि हम कानून की वैधता पर आदेश सभी पक्षो को सुनकर देंगे। इधर वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने सुझाव दिया है कि इस मामले को कल के लिए स्थगित कर दिया जाए। वकील ने कोर्ट ने इस पर विचार करने का अनुरोध किया है।

कोर्ट ने एक याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि हम एक कमेटी बनाने औऱ कानून के अमल पर रोक लगाने पर विचार कर रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि हम कुछ नहीं कह रहे हैं, आंदोलन को जारी रखिए लेकिन अगर कुछ हो गया तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

कोर्ट ने आगे कहा कि हम यह सुझाव दे रहे हैं कि समिति के समक्ष वार्ता को सुविधाजनक बनाने के लिए कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगाई जा सकती है। केंद्र और किसान संगठनों के बीच सात जनवरी को हुई आठवें दौर की बाचतीच में भी कोई समाधान निकलता नजर नहीं आया क्योंकि केंद्र ने विवादास्पद कानून निरस्त करने से इनकार कर दिया था जबकि किसान नेताओं ने कहा था कि वे अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ने के लिये तैयार हैं और उनकी “घर वापसी” सिर्फ “कानून वापसी” के बाद होगी।

एक साल में 42480 किसानों ने की आत्हत्या, मीडिया और सरकार खामोश

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एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, साल 2019 में 42480 किसानों -मजदूरों को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा है। 2018 के मुकाबले इन आंकड़ों में लगभग 6% की वृद्धि दर्ज की गई है।


एनसीआरबी के मुताबिक 2019 में कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,281 लोगों ने आत्महत्या की, जिसमें 5,957 किसान और 4,324 खेतिहर मजदूर शामिल हैं।


कोरोना के कारण जब देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है तब अकेला कृषि सेक्टर है जो फायदे में है और 3 फीसदी से ज्यादा की दर से विकास कर रहा है। जाहिर है कि अब भी भारत में कृषि क्षेत्र ही है जो अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना हुआ है।

अभिनेता सुशांत की मौत पर इतना हंगामा करने वाली मीडिया किसानों की आत्महत्या पर चुप क्यों है।