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मिज़ोरम में कांग्रेस ने जारी की 36 प्रत्याशियों की पहली लिस्ट, 7 मौजूदा विधायकों की कटी टिकट

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मिजोरम विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने 36 प्रत्याशी की पहली लिस्ट जारी कर दी है. जारी की गई लिस्ट में सात मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए गए हैं, जबकि 12 उम्मीदवार ऐसे है जो पहली बार चुनाव लड़ेंगे. मिजोरम के मुख्यमंत्री एवं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ललथनहवला दो सीटें पर चुनाव लड़ेंगे. इस बार ललथनहवला सेरछिप और चंफाई दक्षिण से चुनाव लड़ेंगे. गौरतलब है की 2012 विधानसभा के दौरान भी वह दो सीटों पर चुनाव लड़े थे और जीते भी थे.
मिजोरम में कांग्रेस ने इस बार युवा चेहरों पर भरोसा जताया है. 36 उम्मीदवारों की लिस्ट में 33 प्रतिशत उम्मीदवारों की उम्र 40 वर्ष से कम हैं। नए चेहरों में सबसे कम उम्र, 37 वर्ष के लालहमचुआना हैं। उन्हें सरलुई विधानसभा सीट से लालरिनथांगा के स्थान पर टिकट दिया गया है।
मिजोरम में जिन विधायकों की टिकट काटी गयी है उनमे मंत्री आइजल, आर रोमाविया, लालरिनमाविया राल्टे, लालरिनावमा प्रमुख है.
वहीं सिहा जिले की दो, लुंगलेई जिले की एक और लवांगतलाई जिले की एक सीट पर अभी उम्मीदवारों की घोषणा बाकी है. 20 मौजूदा विधायकों को उनकी पुरानी सीटों से ही टिकट दी गई है. मिजोरम कांग्रेस में नए शामिल हुए मिजोरम के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एल टी हरांगचल को चलफिल सीट का टिकट दिया गया है.
बता दें कि विधानसभा चुनाव के लिए मिजोरम में भी मध्यप्रदेश के साथ ही 28 नवंबर को वोटिंग होगी और 11 दिसंबर को चुनाव परिणाम की घोषणा की जाएगी.

धार में नीना का पत्ता कटेगा या रंजना से हाथ जोड़ेगी पार्टी,शेखावत से भी है नाराजगी

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भारतीय जनता पार्टी का राष्टीय संगठन यह जानने की कोशिश कर रहा है कि नीना वर्मा और रंजना बघेल का टिकट काटने पर चुनाव परिणामों पर कोई विपरीत असर तो नहीं पड़ेगा। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और मध्यप्रदेश के प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे इन दिनों मालवा-निमाड़ अंचल की नौ सीटों पर कार्यकर्त्ताओं से आमने-सामने चर्चा कर राजनीतिक हालात समझने की कोशिश कर रहे हैं। मंदसौर पुलिस फायरिंग की घटना के बाद से मालवा-निमाड़ अंचल में भारतीय जनता पार्टी को भारी नुकसान होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इस इलाके के नगरीय निकाय के चुनाव परिणाम भी भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ गए थे।

धार जिले में पार्टी की गुटबाजी बनी है मुसीबत – विनय सहस्त्रकुद्धे ने धार जिले के कार्यकर्त्ताओं से वन-अू-वन चर्चा कर यह जानने की कोशिश की कि रंजना बघेल और नीना वर्मा के बीच तनातनी किस बात को लेकर रहती है। रंजना बघेल मनावर से विधायक हैं और नीना वर्मा धार से चुनी गईं थीं। नीना वर्मा भाजपा के वरिष्ठ नेता विक्रम वर्मा की पत्नी हैं। रंजना बघेल शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में 2013 से पहले तक मंत्री हुआ करतीं थीं। 2013 के बाद नीना वर्मा और रंजना बघेल में से किसी को मंत्री बनाने के लिए चयन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को करना था। मुख्यमंत्री ने पांच साल तक दोनों को ही मौका नहीं दिया।

नीना वर्मा सिर्फ ग्यारह हजार से अधिक वोटों से चुनाव जीतीं थीं। जबकि रंजना बघेल सोलह सौ से अधिक वोटों से चुनाव जीतीं थीं। पार्टी जिले में गुटबाजी पर काबू करने के लिए विवादास्पद विधायकों का टिकट काटने की तैयारी कर रही है। जिले की दोनों महिला नेत्रियां इस दायरे में आ रहीं हैं। दोनों महिला नेत्रियों के बीच की तनातनी मंत्रिमंडल में जगह पाने को लेकर ही रहती है। धार जिले में विधानसभा की कुल सात सीटें हैं। सरदारपुर में भाजपा मात्र 529 वोटों से चुनाव जीत पाई थी। विनय सहस्त्रबुद्धे से पार्टी कार्यकर्त्ताओं ने जिला भाजपा अध्यक्ष डा.राज बर्फा के रवैये को लेकर शिकायत भी की।

कार्यकर्त्ताओं का कहना था कि नगरीय निकाय के चुनाव में उम्मीदवारों का नाम तय करने से पहले डा. बर्फा ने पार्टी के किसी भी स्थानीय नेताओं को भरोसे में नहीं लिया। इसके कारण चुनाव परिणाम कांग्रेस के पक्ष में गए। सहस्त्रबुद्धे ने पूर्व सांसद छतर सिंह दरबार को चर्चा में उनसे मनावर से विधानसभा चुनाव लड़ने के बारे में भी पूछा। बदनाबर के भाजपा कार्यकर्त्ताओं ने स्थानीय उम्मीदवार को टिकट देने की मांग भी सहस्त्रबुद्धे के सामने रखी। बदनावर से भंवर सिंह शेखावत विधायक हैं। उनका घर इंदौर में है। शेखावत ने पिछला चुनाव 9812 वोटों से जीता था। जिले की पांच सीटें अभी भाजपा के पास हैं। धरमपुरी की सीट भाजपा ने 7573 वोटों से जीती थी।

चुनाव आया तो शिवराज सिंह चौहान को फिर याद आए पंडित कमल किशोर नागर

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वर्ष 2013 विधानसभा चुनाव के पहले मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जो दांव चले थे वहीं दांव वे इस चुनाव में जीत के लिए आजमा रहे हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ठीक पांच साल बाद शुक्रवार को एक बार फिर शाजापुर जिले के ग्राम सेमली धाम पहुंच गए। यहां पंडित कमल किशोर नागर का आश्रम है। मुख्यमंत्री चौहान ने लगभग चालीस मिनट तक पंडित नागर से बंद कमरे मं चर्चा की। इस चर्चा के बाद वे चेहरे पर मुस्कान लेकर कमरे से बाहर निकले और सीधे हेलीकॉप्टर में बैठकर भोपाल आ गए। मुख्यमंत्री की मुस्कराहट का अर्थ यह निकाला जा रहा है कि पंडित कमल किशोर नागर ने उन्हें इस बार भी चुनाव जीतने का अशीर्वाद दे दिया है।

मालवा क्षेत्र की तेरह सीटों पर है पंडित नागर का प्रभाव – कथा वचक कमल किशोर नागर मालवा के संत के नाम से भी जाने जाते हैं। गौ संरक्षण में पंडित नागर की काफी महत्वपूर्ण भूमिका है। पंडित नागर का प्रभाव मालवा अंचल की तेरह सीटों पर देखने को मिलता है। गांव-गांव में पंडित नागर के अनुयायी मौजूद हैं। सितंबर माह में एट्रोसिटी एक्ट के खिलाफ उज्जैन में हुए संत समागम में पंडित कमल किशोर नागर भी मौजूद थे। उनकी मौजूदगी में एट्रोसिटी एक्ट के बारे में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने का प्रस्ताव समागम में पारित किया गया था।

पंडित नागर की समागम में मौजूदगी से भाजपा की नींद उडी हुई थी। पिछला विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पंडित नागर से दूरी बनाई हुई थी। पंडित नागर मुख्यमंत्री के इस रवैये से भी नाराज थे। शुक्रवार को अचानक मुख्यमंत्री सेमली धाम जा पहुंचे। बताया जाता है कि पहले तो पंडित नागर ने चुनाव में समर्थन देने से साफ इंकार कर दिया। लेकिन, बाद में वे तटस्थ रहने को तैयार हो गए। पंडित नागर के नाराज होने का असर भाजपा के ब्राह्मण वोट बैंक पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है।

एकता परिषद को मनाने राहुल गांधी ने कुर्बान की मध्यप्रदेश की एक सीट

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6 अक्टूबर को एकता परिषद के दिल्ली मार्च में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हिस्सा लिया था। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को इस मंच तक पहुंचने के लिए अपने एक विधायक रामनिवास रावत की सीट बदलना पड़ रही है। रामनिवास रावत मध्यप्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक हैं। वे पिछले 28 साल से इस क्षेत्र में चुनाव लड़ रहे हैं। रामनिवास रावत का निर्वाचन क्षेत्र श्योपुर जिले की विजयपुर विधानसभा सीट है। श्योपुर जिला राजस्थान की सीमा से लगा हुआ है। श्योपुर जिले में सहरिया आदिवासी वोट निर्णायक माने जाते हैं। इस आदिवासी वोट बैंक पर एकता परिषद का गहरा प्रभाव है। आदिवासी उसे ही वोट देते हैं जिसे देने का निर्णय एकता परिषद के नेता करते हैं।

आदिवासी वोट कांग्रेस को दिलाने के बदले में एकता परिषद के नेताओं ने विजयपुर की सीट उनके उम्मीदवार को देने की मांग राहुल गांधी के समक्ष रखी थी। राहुल गांधी ने इस मांग को तत्काल मंजूर भी कर लिया। बताया जाता है कि उन्होंने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ को कहा था कि रामनिवास रावत को किसी ओर सीट पर चुनाव लड़ने के लिए भेज दिया जाए। रामनिवास रावत को दो विकल्प कमलनाथ की ओर से दिए गए थे। पहला श्योपुर और दूसरा सबलगढ़ विधानसभा सीट का विकल्प दिया गया था। सबलगढ़ सीट मुरैना जिले में आती है। बताया जाता है कि रामनिवास रावत ने पहले श्योपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का मन बनाया था। लेकिन, कांग्रेस नेता तुलसीनारायण मीणा के बसपा में शामिल होने के बाद उन्होंने अपना ध्यान सबलगढ़ पर केंद्रित कर दिया है।

सबलगढ़ मुरैना जिले में आता है। यह क्षेत्र रावत बाहुल्य क्षेत्र है। पिछले चुनाव में इस सीट पर भाजपा के मेहरबान सिंह रावत चुनाव जीते थे। मेहरबान सिंह रावत की टिकट कटने की चर्चाएं भी भाजपा में चल रहीं हैं। रामनिवास रावत को यदि कांग्रेस सबलगढ़ से उम्मीदवार बनाती है तो भाजपा को मजबूरी में मेहरबान सिंह रावत को उम्मीदवार बनाना होगा। रामनिवास रावत की सीट विजयपुर से जिला पंचायत के सदस्य गोपाल भास्कर का नाम कांग्रेस के टिकट के लिए एकता परिषद ने कांग्रेस अध्यक्ष को सुझाया है।

रामनिवास रावत कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के करीबी हैं। वे प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यवाहक अध्यक्ष भी हैं। श्री रावत ने वर्ष 1990 में विजयपुर से पहली बार चुनाव लड़ा था। वे वर्ष 2003 का विधानसभा चुनाव हार गए थे। पिछले दो चुनाव से उनकी जीत का अंतर लगातार कम हो रहा है। इसकी वजह एकता परिषद का झुकाव भाजपा की ओर रहा है। एकता परिषद पिछले दो चुनाव से इस क्षेत्र में भाजपा का समर्थन करती आ रही है। कोलारस विधानसभा के उप चुनाव के दौरान एकता परिषद और कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया करीब आए थे। राहुल गांधी की एकता परिषद के नेताओं से मुलाकात में भी सिंधिया की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही थी।

रहते हैं इंदौर में और टिकट के लिए नज़र दूसरे जिलों की सीट पर

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मालवा एवं निमाड की लगभग आधा दर्जन विधानसभा सीटें ऐसी हैं जिन पर टिकट के लिए इंदौर में रहने वाले नेताओं की नजर रहती है। नेता भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही दलों के हैं। जिन सीटों पर इंदौरी नेताओं की नजर रहती हैं वे सोनकच्छ,अलोट,बडवाह,महेश्वर,भोजपुर हैं। कांग्रेस में सोनकच्छ से टिकट के दावेदार पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा हैं। वर्मा इस सीट से लगातार चुनाव लड़ते रहे हैं। उनका घर और स्थायी पता इंदौर का है।

सोनकच्छ अनुसूचित जाति वर्ग के लिए सुरक्षित सीट है। वर्मा देवास-शाजापुर की लोकसभा सीट से सांसद भी रह चुके हैं। सोनकच्छ से विधायक राजेन्द्र वर्मा भी इंदौर में ही रहते हैं। वे भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं। इंदौर में ही रहने वाले नगर निगम के पूर्व महापौर एवं मध्यप्रदेश हाउसिंग बोर्ड के अध्यक्ष कृष्ण मुरारी मोघे खरगोन जिले की बडवाह सीट से टिकट मांग रहे हैं। मोघे खरगोन से सांसद रह चुके हैं।

इंदौर में ही रहने वाले कांग्रेस नेता एवं पूर्ण सांसद प्रेमचंद्र गुड्डू आलोट से टिकट मांग रहे हैं। आलोट अनुसूचित जाति वर्ग के लिए सुरक्षित सीट है। गुड्डू पहले भी यहां से विधायक रह चुके हैं। महेश्वर के भाजपा विधायक रमेश मेव भी इंदौर में रहते हैँ। महेश्वर भी अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित सीट है।

मालवा-निमाड़ की इन आरक्षित सीटों पर बाहरी व्यक्तियों के उम्मीदवार बनाए जाने के पीछे पार्टियों की अपनी मजबूरी है। इन क्षेत्रों में स्थानीय नेतृत्व का अभाव बड़ी समस्या है। इंदौर में ही रहने वाले शिवराज सिंह चौहान के संस्कृति मंत्री सुरेन्द्र पटवा रायसेन जिले के भोजपुर से चुनाव लड़ते हैं।

भाजपा में गुटबाजी, रूठों को मनाने की कवायद

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खंडवा एवं बुरहानपुर जिले में घोषित तौर पर भारतीय जनता पार्टी के दो गुट हैं, एक नंदकुमार चौहान का और दूसरा महिला एवं बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनीस का, इसको स्कूल शिक्षा मंत्री विजय शाह भी किसी जिले का प्रतिनिधित्व करते हैं। विजय शाह के भी काफी समर्थक हैं।

खंडवा जिले की तीनों विधानसभा क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। कार्यकर्ताओं की नाराजगी इतनी ज्यादा है कि लोग सार्वजनिक तौर पर टांग खींचने से नहीं चूकते। संगठन के पदाधिकारियों में सामंजस्य की कमी है और विधायकों का विरोध है। राज्य भाजपा के कई बड़े नेता मुख्यमंत्री की यात्रा से पहले डैमेज कंट्रोल की कवायद कर चुके हैं।

जिले के खंडवा पंधाना और मांधाता में मुख्यमंत्री की सभाएं हुई। तैयारियों के संबंध में हुई बैठक में संभाग के यात्रा प्रभारी ने कार्यकर्ताओं को खरगोन जिले का उदाहरण देते हुए बताया था कि वहां महेश्वर के विधायक राजकुमार मेव के खिलाफ सभा में नारेबाजी करने वालों को पार्टी से निलंबित कर दिया है। इसके बाद पार्टी कार्यकर्ताओं पर दबाव बनाया गया। यहां पर साम, दाम, दंड, भेद का उपयोग किया जा रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस क्षेत्र में पार्टी किस तरह से गुटबाजी से बाहर आ पाती है।

70 सालों से हम जातिवाद, धर्मवाद के जाल में फंसे हैं, अब तो राष्ट्रवाद की तरफ बढ़ें: हीरालाल त्रिवेदी

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सामान्य, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक कल्याण समाज संघ (सपाक्स) के संरक्षक एवं पूर्व आईएएस अधिकारी हीरालाल त्रिवेदी कहते हैं कि हम आजादी के इतने वर्षों के बाद भी जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद के जाल में ही फंसे हैं। अब समय है राष्ट्रवाद की तरफ बढ़ने का, लेकिन हमारे देश की राजनीति ने ऐसा मकड़जाल बिछा रखा है, जिसमें हर कोई उलझा हुआ है। हीरालाल त्रिवेदी कहते हैं कि राजनीति में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन कीचड़ को साफ करने के लिए कीचड़ में उतरना ही पड़ता है। पावर गैलरी ने उनसे कई मुद्दों पर चर्चा की। पेश है चर्चा के मुख्य अंश…

सपाक्स ने विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की थी। चुनावी तैयारियों को किस तरह से अंजाम दे रहे हैं?


जबाव : देखिए, सपाक्स ने मध्यप्रदेश की सभी 230 विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ने की घोषणा की थी और हम अपनी घोषणा पर कायम भी रहेंगे। चुनावी तैयारियों से पहले सपाक्स की जिला इकाइयों का गठन किया गया है। लगभग सभी जिलों में सपाक्स संगठन की कार्यकारिणी बन गई है। कुछ जगह तेजी से काम भी चल रहा है। हमारे साथ सभी समाज के लोग आ रहे हैं। इसके बाद हम पॉलिटिकल पार्टी के रूप में काम शुरू करेंगे।

क्या सपाक्स को चुनाव आयोग ने राजनीतिक दल की मान्यता दे दी है?


जबाव : सपाक्स द्वारा चुनाव आयोग में पंजीयन प्रक्रिया का आवेदन दिया है, जो प्रक्रियाधीन है। अब हमने चुनाव आयोग में चुनाव-चिन्ह आंवटन का आवेदन भी दिया है। उम्मीद है कि चुनाव से पहले हमें मान्यता और चुनाव चिन्ह दोनों मिल मिल जाएंगे। इसके बाद सपाक्स चुनाव मैदान में उतरेगा।

सपाक्स किन मुद्दों को लेकर चुनाव मैदान में उतरेगा?


जबाव : मुख्य रूप से हमारे दो मुद्दे हैं- एक एट्रोसिटी एक्ट और दूसरा आरक्षण। एट्रोसिटी एक्ट में वर्तमान सरकार ने वर्ष 2016 में 22 ऐसे छोटे-मोटे अपराध जोड़ दिए हैं, जिससे लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है। इसमें कई ऐसे छोटे-मोटे अपराध हैं जैसे, किसी जाति विशेष का नाम ले लेना, प्रताड़ित करना या अधिकारी कर्मचारी को नोटिस देता है तो कुछ विशेष शब्द बोल देने से अपराध बन जाते हैं और उसमें जमानत नहीं होती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में गाइड लाइन दी है। लेकिन अब उस कानून को ऐसे बना दिया है, जिससे इन छोटे-मोटे अपराध को करने वाले इस देश के सामान्य, अल्पसंख्यक, अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग बड़े हिंसक हों, आतंकवादी हों। यदि वे किसी जाति विशेष का नाम ले भी लें तो उनको अंदर करना है। अब जब ऐसी सोच रखने वाले राजनीतिक दल और जनप्रतिनिधि हैं, तो हमारे पास कोई विकल्प भी नहीं है, इसलिए हम लोग चुनाव में जाएंगे इन मुद्दों को लेकर। इसी तरह आरक्षण का मुद्दा है। यदि एक बार किसी को आरक्षण मिल गया तो उसकी पीढिय़ां उस आरक्षण का लाभ लेती रहती हैं। वर्तमान में भी यही स्थिति है। एक व्यक्ति को दो-दो बार आरक्षण मिल रहा है। एक तो वह नौकरी में भी आरक्षण लेकर आ रहा है और फिर प्रमोशन भी उसको आरक्षण का लाभ मिल रहा है। मध्यप्रदेश में तो यह स्थिति हो गई है कि जन्म से लेकर मरने तक लोगों को आरक्षण का लाभ मिल रहा है। सरकार ने सभी जातियों को अलग-अलग खंडों में बांट दिया है।

क्या आपको लगता है कि हिन्दू ही हिन्दू का दुश्मन बन रहा है?


जबाव : बिल्कुल सरकारों ने सभी जातियों को आपस में लड़वाने का काम किया है। यही कारण है कि हम लोग एक-दूसरे के दुश्मन बन रहे हैं। स्थिति यह है कि यदि कोई व्यक्ति सामान्य, ओबीसी या अल्पसंख्यक है तो उसको इतने पैसे मिलेंगे और यदि कोई व्यक्ति आरक्षित वर्ग का है तो उसको इतने पैसे मिलेंगे। हमारे यहां पर भाजपा यह दावा करती है वह हिन्दूवादी पार्टी है, कांगेस का दावा है कि वह अल्पसंख्यक और आरक्षित वर्ग के साथ है, बसपा केवल आरक्षित वर्ग की बात करती है। हम हर वर्ग की बात करते हैं। हम समाज में सदभाव लाने की बात करते हैं। जब हमारे संविधान में लिखा है कि जाति, धर्म, लिंग, संप्रदायवाद, भाषा, क्षेत्रवाद इनमें कहीं भेद नहीं करना चाहिए तो यह भेदभाव क्यों किया जा रहा है, इसे नहीं होना चाहिए। कानून, नियम ऐसे बनाओ कि यह भेद उसमें क्रिएट ही न हो, लोगों के मन में ऐसी भावनाएं ही नहीं पनपे। सरकार खुद कानून और नियम बनाकर भावनाएं पनपा रही है तो समाज कहां जाएगा।


क्या अब देश और प्रदेश में एक देश-एक आरक्षण की बात नहीं होनी चाहिए?


जबाव : बिल्कुल होनी चाहिए। यदि आरक्षण आर्थिक आधार पर लागू हो जाए तो यह व्यवस्था हो सकती है।

आपने लंबा समय प्रशासनिक सेवा में भी बिताया है और अब राजनीतिक की तरफ बढ़े हैं?


जबाव : देखिए, हमने तो कुछ मुद्दों को लेकर एक सामाजिक संगठन खड़ा किया है। हमारी राजनीति में कोई रूचि नहीं है, राजनीति में जाने में भी कोई रूचि नहीं है। लेकिन हो यह गया कि कीचड़ को साफ करने के लिए कीचड़ में उतरना होगा, गंदी नाली को साफ करना है तो गंदी नाली में उतरना पड़ेगा। हमारी राजनीति में आजकल झूठ बोलना अफवाहे फैलाना, भाई को भाई से लड़ाना, जाति के आधार पर लड़ाना, धर्म के आधार पर लड़ाना। यही सब हो रहा है। मुद्दों को लेकर कोई काम नहीं कर रहा है, लेकिन हम मुद्दों को लेकर राजनीतिक करना चाहते हैं। हम अच्छे लोगों को राजनीति में लाना चाहते हैं और यह चाहते हैं कि जो लोग आए कम से कम वे इन चीजों से ऊपर उठें।

इस समय सवर्ण समाज सरकार का विरोध कर रहा है। क्या यह विरोध जायज है?


जबाव : देखिए, सपाक्स कोई विरोध नहीं कर रहा है। यह विरोध तो स्वत: ही हो रहा है। किसी भी जाति का नाम लेना या आप ऐसे कोई शब्द बोल दो जो गांधीजी ने दिए थे, ऐसे कैसे कानून बना सकते हो, ऐसे कैसे ऊपर से थोप सकते हो। आरक्षित समाज के किसी भी व्यक्ति ने 2016 में यह मांग नहीं कि हमें ऐसे कानून चाहिए। जनता के पास से ऐसी कोई मांग नहीं आई। केवल रामविलास पासवान और उनकी पार्टी, उनके सुझाव उसके हिसाब से कानून बन जाता है, नियम बन जाता है और देश एक तरफ रह जाता है।

देश में जातिवाद, धर्मवाद हावी है, लेकिन राष्ट्रवाद को सब भूल रहे हैं, क्यों?


जबाव : इस देश के लोग आजादी के इतने वर्षों के बाद भी जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद से आगे नहीं निकल पा रहे हैं। यदि वाकई में देश का विकास करना है तो हमें राष्ट्रवाद पर आगे बढ़ना पड़ेगा। इस हिन्दुस्तान का एक ही धर्म है राष्ट्रीय धर्म, एक ही जाति रखना पड़ेगी राष्ट्रीय जाति। यदि सरकार जितने नियम-कानून जाति के आधार पर बने हैं उन सबको हटा दे तो लोग अपने आप जाति धर्म को भूल जाएंगे। लोग अपने घरों में कुछ भी करे, लेकिन घर से बाहर लोगों के दिमाग में जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद नहीं रहेगा। यदि आप इस जाति और इस धर्म की लड़ाई को कानून और नियम से हटा दें। लोगों से मेरा अनुरोध है कि एक बार ऐसे लोगों को ठुकराकर दिखाएं जो 68 साल से ऐसी राजनीति कर रहे हैं। एक बार ऐसे लोगों को लेकर आए कि जो इस जातिवाद को खत्म करके इस देश को राष्ट्रवाद की तरफ लेकर जाएं। यदि एक बार जनता ने ऐसे लोगों को सपोर्ट कर दिया तो इस देश की तस्वीर बदल जाएगी।

क्या आपको लगता है कि मध्यप्रदेश में अजाक्स इस स्थिति में है कि वह बदलाव कर सके?


जबाव : देखिए मध्यप्रदेश ही नहीं अब अजाक्स का दायरा मध्यप्रदेश से बाहर भी बढ़ रहा है। हमने इतने कम समय में एक बड़ा बदलाव किया है तो निश्चित रूप से हम मध्यप्रदेश में बदलाव ला सकते हैं। हमारी भावनाएं, हमारे लक्ष्य सिर्फ जातिवाद तक आकर नहीं सिमटे हैं, हमारी सोच सभी लोगों के विकास और सभी लोगों को संरक्षण देने की है। हमारा उद्देश्य संपूर्ण मध्यप्रदेश और मध्यप्रदेश में रहने वाले हरएक नागरिक का है। आज की राजनीति जातिवाद पर आधारित हो गई है, लेकिन इस जातिवाद से बाहर आकर भी राजनीति करने वालों को सोचना चाहिए। देश, प्रदेश का यह माहौल हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहद निराशाजनक साबित होगा। 

आखिर भाजपा को क्यों बदलनी पड़ी सिंधिया को घेरने की रणनीति

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ग्वालियर एवं चंबल की संभाग  की 34 विधानसभा सीट और तीन लोकसभा सीटों को जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को घेरने की रणनीति में बदलाव करना पड़ा है। भाजपा अब तक तक सिंधिया को अंग्रेजों का मित्र बताकर ज्योतिरादित्य सिंधिया पर हमले किया करती थी, अब पार्टी सिंधिया परिवार की तारीफ कर इस क्षेत्र में अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अपने ग्वालियर संभाग के दौरे में कार्यकर्त्ताओं से वोट सिंधिया परिवार के नाम पर ही मांगे। 

ग्वालियर संभाग कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभाव वाला क्षेत्र है। प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता अनिल सौमित्र कहते हैं कि सिंधिया परिवार के अधिकांश सदस्य भाजपा में है। इसका फायदा भी भाजपा को इस संभाग में मिलता रहा है और आगे भी मिलता रहेगा। यहां उल्लेखनीय है ज्योतिरादित्य सिंधिया को घेरने के लिए भाजपा अक्सर महारानी लक्ष्मीबाई की शहादत का जिक्र करती है। सिंधिया परिवार को अंग्रेजों का दोस्त बताती है। भाजपा को इस मुद्दे पर क्षेत्र में कभी समर्थन नहीं मिला। इसकी बड़ी वजह सिंधिया राजवंश द्वारा अपने रियासत में कराए गए विकास कार्य हैं।

सिंधिया परिवार के किसी भी सदस्य पर अब तक न तो कोई भ्रष्टाचार के आरोप हैं और न ही राजनीति को गंदा करने के उदाहरण उनके साथ जुड़े हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया का चेहरा प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में सबसे चमकदार और प्रभावी चेहरा माना जाता है। भाजपा के पास ऐसा कोई शस्त्र नहीं है जिसके जरिए वे सिंधिया के असर को कम कर सकें। संभवत: यही वजह है कि भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है।

सिंधिया परिवार की तारीफ कर अमित शाह अपनी पार्टी  के नाराज कार्यकर्त्ताओं को भी शांत करना चाहते हैं। अमित शाह ने शिवपुरी में विजयाराजे सिंधिया के योगदान का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी जन्मशती वर्ष में क्षेत्र के कार्यकर्त्ताओं को पार्टी को एतिहासिक विजय दिला कर अपनी श्रदांजलि अर्पित करना चाहिए। सिंधिया परिवार के खिलाफ गड़े मुर्दे उखाड़ने का दांव भाजपा के सामने भी कई सवाल खड़े कर रहा था। पार्टी को सबसे ज्यादा असुविधा राजस्थान में हो रही थी।

राजस्थान में विजयाराजे सिंधिया की बेटी वसुंधरा राजे सिंधिया नाराज थीं। मध्यप्रदेश में सिंधिया परिवार पर लगाए जा रहे आरोपों के कारण राजस्थान में भाजपा को जवाब देना मुश्किल पड़ रहा है। भाजपा से भी लोग पूछ रहे हैं कि आजादी की लड़ाई में उनके किस नेता का योगदान रहा है? भाजपा चुनाव अभियान में देशभक्ति की बात तो करती है लेकिन, स्वतंत्रता संग्राम में अपने योगदान को लेकर चुप रहती है।  

12 अक्टूबर को चुनाव समिति की बैठक में प्रत्याशियों की सूची पर मुहर लगाएगी कांग्रेस।

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मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण को लेकर बैठकों का सिलसिला जारी है। सोमवार को कांग्रेस स्कीनिंग कमेटी की बैठकों में लगभग 80 ऐसे उम्मीदवारों की लिस्ट फाइनल की गई जिसमें मौजूदा विधायक और 2013 में 3000 से कम वोटों से हारे प्रत्याशी शामिल है।

वहीं मंगलवार को हुई स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक में 3 हजार- 10 हजार वोटों से हारे प्रत्याशियों की लिस्ट पर चर्चा की गई।

मधुसूधन मिस्त्री की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के साथ दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह और प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया शामिल हुए थे।

12 अक्टूबर को प्रत्याशियों की लिस्ट हो सकती है फाइनल।

खबरों के अनुसार 12 अक्टूबर को चुनाव कमेटी की बैठक में प्रत्याशियों की लिस्ट फाइनल की जा सकती है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी इस बैठक में शामिल हो सकते है।

नाव पर सवार होकर आ रहीं अंबे कांग्रेस की नाव पार लगाएगीं या हाथी पर जाने से होगा नुकसान

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इस वर्ष की शारदीय नवरात्रि पर मां अंबे का आगमन नाव पर हो रहा है। नाव पर सवार मां अंबे मध्यप्रदेश सहित चार राज्यों में क्या कांग्रेस का सत्ता से वनवास समाप्त कर देगीं या फिर हाथी की उपेक्षा महंगी पड़ जाएगी। मां जगदंबा की वापसी भी इस बार हाथी पर बैठ कर हो रही है। मां अंबे का नाव पर आगमन पूरे देश के लिए अच्छे दिन आने का संकेत देने वाला है। क्या ये अच्छे दिन कांग्रेस की हिन्दी भाषी तीन राज्य मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सरकार में वापसी से आएंगे? कांग्रेस को इस सवाल का जवाब अपनी भक्ति के जरिए वोटर को खुश करके मिल सकता है। कांग्रेस को इन तीन राज्यों में अपने हाथ के कमाल पर ही भरोसा है। कांग्रेस ने अपनी नाव किनारे लगाने के लिए न तो साइकल की सवारी की है और न ही हाथी पर बैठने की हिम्मत दिखाई है।

मायावती और अखिलेश यादव को कांग्रेस ने किया है निराश

वैसे तो पिछले पांच विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाने का काम शारदीय नवरात्रि के बाद ही होता है। चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार इस मौके का उपयोग अपने चुनाव प्रचार के लिए करते हैं। इस वार की नवरात्रि पर जगदंबा नाव पर सवार होकर आ रहीं हैं। इस कारण राजनीतिक दलों के लिए यह नवरात्रि ज्यादा खास हैं। चुनाव वाले तीनों हिन्दी भाषी राज्यों में कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला होना तय माना जा रहा है। छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी और मायावती मिलकर मुकाबला त्रिकोणीय बनाने का पूरा प्रयत्न कर रहे हैं। मायावती को अजीत जोगी का साथ कांग्रेस द्वारा हाथ आगे न बढ़ाए जाने के कारण लेना पड़ा है।

मायावती इस उम्मीद में थीं कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जो महागठबंधन तैयार करना चाहते हैं,वह तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में बसपा को साथ लिए बगैर नहीं बन सकता। मायावती इंतजार करतीं रहीं,कांग्रेस ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार ही नहीं किया। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कमलनाथ कहते हैं कि मायावती वो सीटें चाहतीं थीं, जिन पर उन्हें हजार-दो हजार वोट ही पिछले चुनाव में मिले थे। दरअसल मायावती कांग्रेस के वोट के जरिए अपनी नाव पार लगाना चाहतीं थीं। कांग्रेस को लग रहा था कि इस गठबंधन से सत्ता मिल भी गई तो उसका रिमोट मायावती के हाथ में चला जाएगा।

अखिलेश यादव की उम्मीद भरी निगाहों को कांग्रेस ने अनदेखा कर दिया। अखिलेश यादव से कांग्रेस ने समझौते के संकेत तो दिए लेकिन, सहमति का जवाब नहीं भेजा। नतीजा समाजवादी पार्टी को अपनी नाव को बचाने के लिए अकेले ही चुनाव का चप्पू चलाना पड़ रहा है।

कांग्रेस को उम्मीद कि आरक्षित वर्ग और मुस्लिम के साथ लगेगी नाव पार

बसपा प्रमुख मायावती के हाथी को नाराज करने के बाद यह माना जा रहा है कि इससे कांग्रेस को नुकसान होगा। कांग्रेस एक बार फिर सत्ता में आने से चूक सकती है। इस तरह की अटकलों का आधार बसपा के प्रतिवद्ध वोट बैंक के कारण लगाया जा रहा है। राज्य में बसपा की ताकत निरंतर कम हो रही है। बसपा को पिछले चुनाव में सिर्फ चार सीटें ही मिलीं थीं। जबकि वह नौ सीटों पर दूसरे नंबर की पार्टी बनी थी। बसपा जिन सीटों पर नबंर दो पर रही थी ये श्योपुर,सुमावलीमुरैना,भिंड,महाराजपुर,पन्ना,रामपुर बघेलान,सेमरियादेबतालाव तथा रीवा विधानसभा सीट हैं।

पहले उत्तरप्रदेश के चुनाव फिर एट्रोसिटी एक्ट का सवर्णों द्वारा किए जा रहे विरोध के बाद कांग्रेस इस नतीजे पर पहुंची है कि अनुसूचित जाति वर्ग मायावती का साथ छोड़ रहा है। कांग्रेस का अनुमान है कि यह वर्ग भाजपा से नाराज है। इस कारण वह ऐसे दल को वोट देना चाहेगा जो सरकार बना सकता है। तीनों हिन्दी भाषी राज्यों में बसपा अकेले अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है।

राजस्थान में कांग्रेस को लग रहा है कि हर पांच साल में होने वाले सत्ता परिवर्तन में वोटर इस बार भाजपा को विपक्ष में बैठाएंगे। जबकि छत्तीसगढ़ में माया-जोगी के गठबंधन को अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के वोटर अभी विश्वास करने की स्थिति में नहीं है। वहीं सपा की स्थिति तीनों ही राज्यों में सिर्फ सांकेतिक ही मानी जा रही है। कांग्रेस में यह डर भी देखने को मिल रहा है कि कहीं हाथी सत्ता आने के सपने को कुचल न दे?