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दशहरे के बाद जारी होगी कांग्रेस की सूची

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तीन दिवसीय कांग्रेस चुनाव समिति की बैठक दिल्ली में चल रही है। जिसमें मध्यप्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 71 सीटों पर प्रत्योशियों के सिंगल नाम तय कर लिए गए हैं। जिनकी घोषणा कांग्रेस जल्द ही कर सकती है। दिल्ली स्थित सोनिया गांधी के निवास पर लगातार बैठकों का सिलसिला जारी है। जिसमें राहुल गांधी, मध्यप्रदेश के प्रदेशाध्यक्ष कमलनाथ, चुनाव प्रचार समिति अध्यक्ष सिंधिया, प्रदेश प्रभारी दिपक बावरिया, नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह समेंत कई वरिष्ट नेता मौजूद थे।


बैठक के बाद लिस्ट सोशल मीडिया पर वायरल :-
चुनाव समिति की बैठक के बाद देर रात ही सोशल मीडिया पर 230 सीटों पर प्रत्याशियों के नाम वाली एक लिस्ट तेजी से वायरल हो रही है। जिसमें कमलनाथ, अजय सिंह और दिग्विजय के करीबियों के नाम भी शामिल हैं। पर कांग्रेस की तरफ से इसे भाजपा की साजिश बताया जा रहा है। चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष सिंधिया ने भी इस लिस्ट को गलत बताया है। साथ ही सिधिंया ने अगली बैठक के बाद प्रत्याशियों के नाम की घोषणा करनी की बात कही है।


टिकट वितरण प्रक्रिया :-
टिकटों के लिए बहुत से प्रत्याशियों के नामों की सिफारिशें की गई थी, पर कांग्रेसी नेताओं ने बहुत माथापच्ची करने के बाद सबसे पहले पिछले चुनाव में कम अंतर से हारने वाले नेताओं को टिकट देने की रणनीति बनाई, साथ ही कांग्रेस के बड़े नामी नेताओं जो वर्तमान में विधायक हैं, उनके नामों पर मोहर लगा दिया गया है। बाकि की सीटों पर बाद में निर्णय लिया जाएगा।


बैठकों में दिग्विजय नहीं रहे मौजूद :-
मध्यप्रदेश के टिकट वितरण में सिंधिया और कमलनाथ आगे नजर आ रहे हैं, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह टिकटों के वितरण प्रक्रिया से दूर नजर आ रहें हैं। हाल ही में सोशल मीडिया में वायरल वीडियो में दिग्विजय कहते नजर आ रहें है कि, उनके भाषण देने से कांग्रेस के वोट कट जाते है, साथ ही बड़े पदाधिकारियों ने उन्हें जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के साथ काम करने की जिम्मेदारी दी है।

स्वाथ्य कारणों के चलते अवकाश पर मध्‍यप्रदेश के डीजीपी शुक्ला,वीके सिंह को मिला कार्यवाहक डीजीपी का प्रभार

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मध्यप्रदेश के डीजीपी ऋषि शुक्ला के छह सप्ताह के मेडिकल लीव पर जाने से चुनाव अयोग ने मप्र कैडर के 1984 बैच के आईपीएस अफसर वीके सिंह को मध्यप्रदेश पुलिस का नया कार्यवाहक डीजीपी बनाया है। अब उन्‍हीं की निगरानी में विधानसभा चुनाव संपन्‍न कराए जाएंगे। पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) ऋषि कुमार शुक्ला को रविवार को हृदयाघात हो गया था। वे इलाज के लिए मंगलवार सुबह मुंबई रवाना हो चुके है.

चुनाव आयोग को भेजे गए पैनल में 1984 बैच के तीन अधिकारियों वीके सिंह, मैथिलीशरण गुप्त और संजय चौधरी के नाम थे। इनमें से चुनाव आयोग ने वीके सिंह के नाम को मंजूरी दे दी है। वह इस समय अध्यक्ष पुलिस हाउसिंग कॉरपोरेशन हैं, जबकि शुक्ला के 1983 बैच की एकमात्र अधिकारी रीना मित्रा इस समय केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं। आपको बता दें कि आईपीएस अफसर वीके सिंह ने अपना पदभार संभाल लिया है।

कांग्रेस प्रत्याशियों के चयन के लिए आज से CEC की बैठक, मौजूदा विधायकों पर लग सकती है मोहर

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विधानसभा चुनाव के लिए आज कांग्रेस में प्रत्याशियों के नाम पर मुहर लग सकती है। दिल्ली में सेंट्रल इलेक्शन कमेटी के इस बैठक में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान चुनाव के लिए प्रत्याशियों के नाम सुनिश्चित होने हैं। इस बैठक में सोनिया गांधी,राहुल गांधी के अलावा कमलनाथ, सिंधिया, अजय सिंह और दिग्विजय सिंह हिस्सा ले रहे हैं।

आज आ सकती है छत्तीसगढ़ चुनाव के पहले चरण की सूची

चुनाव आयोग ने छतीसगढ़ विधानसभा चुनाव के लिए मंगलवार को अधिसूचना जारी कर दी है। 23 अक्टूबर को नामंकन का आखिरी तारीख तय किया गया है। बता दें कि पहले चरण में बस्तर संभाग की 12 व राजनांदगांव जिले की सभी छह सीटों के लिए चुनाव होने हैं। जिसमें एक तरफ अजीत जोगी (जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़), बसपा और सीपीआई गठबंधन है तो दूसरी तरफ राजनांदगांव से खुद मुख्यमंत्री रमन सिंह चुनाव लड़ते आ रहे हैं। वहीं कांग्रेस को भी ऐसे बड़े चेहरे के रूप में प्रत्याशी का चुनाव करना होगा जो अजीत जोगी और रमन सिंह जैसे नेताओं को टक्कर दे सके। बैठक में मौजूदा सिंगल विधायकों पर भी मुहर लगने की सम्भावना ज्यादा है।

मध्यप्रदेश में सपा और गोंडवाना से समझौता की एक और कोशिश

वहीं गठबंधन करने से दुरी बना चुके समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के अध्यक्ष हीरा सिंह से भी मुलाकात होने की सम्भावना है। कहा जा रहा है कि गठबंधन को लेकर एक और कोशिश की जा सकती है।

मुख्यमंत्री पद की लड़ाई कहीं मध्यप्रदेश में सत्ता से चूक न जाए कांग्रेस

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मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री के पद को लेकर चल रही खींचतान कांग्रेस कहीं सत्ता में आने से चूक न जाए। कांग्रेस में उठ रहीं इस तरह की आशंकाओं को भारतीय जनता पार्टी के नेता लगातार हवा दे रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी अपने मध्यप्रदेश के दौरे में लगातार चेहरे को लेकर हवा दे रहे हैं। कांग्रेस के लिए यह चुनाव करो या मरो का चुनाव है। इस चुनाव कांग्रेस यदि सत्ता बनाने से चूक गई तो स्थितियां उत्तरप्रदेश और बिहार जैसी हो जाएंगीं।

पंद्रह साल की भाजपा सरकार से नाराज है वोटर

राज्य में कांग्रेस अब तक चुनाव कोई ऐसा मुद्दा तैयार नहीं कर पाई है, जिसके नारे के सहारे उसका सत्ता से वनवास समाप्त हो जाए। लगातार पंद्रह साल से विपक्ष में बैठी कांग्रेस जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ कमजोर कर चुकी है। पिछले दो विधानसभा चुनाव में नेतृत्व को लेकर जो प्रयोग कांग्रेस पार्टी द्वारा किए गए थे, वे असफल साबित हुए हैं। वर्ष 2008 में पार्टी ने सुरेश पचौरी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में कांग्रेस की सत्ता में वापसी की सबसे ज्यादा संभावनाएं थीं। पांच साल की अवधि में शिवराज सिंह चौहान भारतीय जनता पार्टी के तीसरे मुख्यमंत्री थे। पार्टी में चौहान का नेतृत्व स्वीकार करने वाले लोगों की भी कमी थी।

कांग्रेस की रणनीतिक कमजोरी ने उसे सत्ता से वंचित कर दिया था। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कांतिलाल भूरिया के जरिए आदिवासी कार्ड खेल था। पार्टी को इस कार्ड से आदिवासी क्षेत्रों में ही सफलता नहीं मिली। पिछले विधानसभा चुनाव में भी पार्टी के बड़े नेताओं के बीच निपटाओ का भाव उसी तरह देखने को मिला था, जिस तरह वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में मिला था। लोकसभा चुनाव में केन्द्र की सरकार जाने के बाद अरूण यादव को प्रदेश कांग्रेस का नेतृत्व सौंपा गया था। तीन साल से भी अधिक समय तक अध्यक्ष रहने के बाद भी वे अपना और पार्टी का जनाधार मजबूत नहीं कर पाए थे। पार्टी ने उन्हें हटाए जाने के फैसले में भी काफी देरी कर दी थी। उनके स्थान पर अध्यक्ष बनाए गए कमलनाथ राज्य की राजनीति के तौर-तरीके से भी परिचित नहीं है।

उनके व्यवहार को लेकर कांग्रेस के कार्यकर्त्ताओं की यह शिकायत हमेशा रहते है कि वे इस तरह पेश आते हैं जैसे कि केन्द्रीय मंत्री अथवा मुख्यमंत्री हैं। कमलनाथ ने राज्य में अपनी भूमिका को किंग मेकर की तरह पेश किया था। पहली बार वे किंग बनने के लिए उतावले दिखाई दे रहे हैं। सत्तर की उम्र पार कर चुके कमलनाथ का राज्य की राजनीति में नोसिखियापन कई मौकों पर देखने को मिला। मीडिया विभाग में परिवर्तन से लेकर उनके चुनावी मुद्दे तक में इस नौसिखिएपन को समझा जा सकता है। कमलनाथ छिंदवाड़ा के विकास मॉडल से राज्य की पंद्रह साल पुरानी भाजपा सरकार को उखाडना चाहते हैं। छिंदवाड़ा के विकास मॉडल को उभारने के पीछे उनकी सोच पार्टी में मुख्यमंत्री पद के दावेदार दूसरे नेताओं को पीछे करने की है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की सार्वजनिक मंचों से दी गई नसीहतों के बाद भी कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया से तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं। राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश में चुनाव जीतने की जो रणनीति बनाई है उसमें सिर्फ दो ही चेहरों को केन्द्र में रखा गया है। कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया। राज्य में भारतीय जनता पार्टी की पंद्रह साल की सरकार को लेकर लोगों में नाराजगी साफ दिखाई दे रही है। कांग्रेस इस नाराजगी को अपने पक्ष में मोड़ने का कोई रास्ता हीं ढूंढ पाई है।

सपाक्स और जयस भी बन सकते हैं राह में रोड़ा

कांग्रेस की राह में बड़ी रूकावट सपाक्स और जयस उभर कर सामने आ रही है। दोनों ही वर्ग विशेष की राजनीति कर रहे हैं। सपाक्स संगठन विशेष रूप से ठाकुर, ब्राह्मण एवं वैश्य वर्ग के वोटों की राजनीति कर रहा है। जबकि जयस संगठन आदिवासी वर्ग पर आधारित है। वैसे तो आदिवासी कांग्रेस का प्रतिबद्ध वोटर माना जाता है लेकिन , पिछले दो चुनावों से इसकी कांग्रेस से दूरी साफ दिखाई दे रही है। इस दूरी के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग कारण हैं। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जबलपुर संभाग की कुछ विधानसभा सीटों तक प्रभाव रखती है। इससे मिलने वाले कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के लिए पर्याप्त माने जाते हैं।

जयस चुनाव मैदान में कहां और कितने उम्मीदवार उतारता है यह अभी कहना मुश्किल है। सपाक्स जरूर यह दावा कर रहा है कि वह राज्य की सभी 230 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगा। स्वभाविक है कि अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित सीटें भी इसमें शामिल हैं। इन आरक्षित सीटों पर संबंधित वर्ग के ही लोगों को उम्मीदवार बनाना होगा। ऐसा होने पर सपाक्स के मूल उद्देश्य पर ही स्वभाविक तौर पर सवाल खड़े हांगे। सपाक्स का जन्म आरक्षण विरोध से हुआ है। सामान्य वर्ग के वोटर के बारे में यह माना जाता है कि वह भाजपा का प्रतिबद्ध वोटर है।

सपाक्स के मैदान में होने से नुकसान भाजपा को होगा ऐसा माना जाना स्वभाविक है। यह वोटर भी चुनाव के वक्त विभाजित होगा। इसका फायदा कितना कांग्रेस को मिलेगा यह कहना मुश्किल है। कांग्रेस वर्तमान राजनीतिक हालात अपने अनुकूल मान रही है। यही वजह है कि पार्टी में अभी से नेता एक-दूसरे के समर्थकों के टिकट कटवाने में लगे हुए हैं। कहा यह जा रहा है कि कांग्रेस के सारे नेता मिलकर सिंधिया की राह को रोकना चाहते हैं। राज्य में एक मात्र सिंधिया का चेहरा ही ऐसा है,जिस पर कोई दाग नहीं है। वोटर के बीच भी लोकप्रिय है।

मध्यप्रदेश में शिवसेना सभी 230 विधानसभा सीटों पर लड़ेगी चुनाव,प्रत्याशियों की पहली सूची जारी

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मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में इस बार कई राजनीतिक पार्टियां अपना भाग्य आजमाने मैदान में उतर रही हैं। प्रदेश में पहली बार शिवसेना सभी 230 विधानसभा सीटों पर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने जा रही है। शिवसेना ने विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों की प्रथम सूची घोषित कर दी है। इस सूची में 21 प्रत्याशियों के नाम हैं।

शिव सेना के प्रदेश प्रमुख ठाड़ेश्वर महावर और प्रदेश संगठक गुलाब चंद दुबे ने इन नामों की घोषणा की है। प्रत्याशियों की अगली सूची 25 अक्टूबर के बाद आएगी। वहीं शिवसेना प्रमुख उध्दव ठाकरे भी जल्द भोपाल आएंगे।

क्या नरसिंहपुर में आमने-सामने होंगे पचौरी-विवेक तन्खा

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पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी का प्रभाव क्षेत्र माने जाने वाले नरसिंहपुर जिले में कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य एवं सुप्रीम कोर्ट के वकील विवेक तन्खा का दखल बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। तन्खा की पहल पर ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कमलनाथ ने रविवार को जबलपुर एवं नरसिंहपुर जिले के टिकट के दावेदार नेताओं को बुलाकर चर्चा की है। यह माना जा रहा है कि कांग्रेस नरसिंहपुर सीट से तन्खा को विधानसभा का चुनाव लड़ा सकती है। तन्खा ने इस बात से इंकार किया है कि उनके पुत्र विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं।

तन्खा ने लड़ा था जबलपुर से लोकसभा का चुनाव

सुप्रीम कोर्ट के वकील विवेक तन्खा ने लोकसभा का पिछला चुनाव जबलपुर से लड़ा था। वे भारतीय जनता पार्टी के राकेश सिंह के खिलाफ चुनाव हार गए थे। राकेश सिंह वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष हैं। मध्यप्रदेश कांग्रेस में बने नए राजनीतिक समीकरणों में विवेक तन्खा ताकतवर रूप में उभरकर सामने आए हैं। माना यह जाता है कि कमलनाथ,ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह को एक करने में विवेक तन्खा की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है। विवेक तन्खा, कमलनाथ के ज्यादा करीबी माने जाते हैं।

कमलनाथ करीबियों में पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी भी माने जाते हैं। सुरेश पचौरी की सलाह पर ही कमलनाथ ने शोभा ओझा को मीडिया विभाग का अध्यक्ष और राजीव सिंह को प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रशासन और संगठन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है। सुरेश पचौरी के नरसिंहपुर-होशंगाबाद संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने की चर्चाएं हमेशा ही रहतीं हैं। सुरेश पचौरी नरसिंहपुर और होशंगाबाद की राजनीति में लगातार दिलचस्पी भी दिखाते हैं।

नरसिंहपुर के किसान आंदोलन में भी सुरेश पचौरी ने मुख्यमंत्री के समक्ष किसानों की मांगे रखीं थीं। ऐसे में नरसिंहपुर जिले में टिकट के दावेदारों को विवेक तन्खा के जरिए चर्चा के लिए कमलनाथ द्वारा बुलाया जाना नए राजनीतिक समीकरणों के बनने का संकेत दे रहा है।

मध्यप्रदेश के दौरे पर राहुल गाँधी, पीतांबरा देवी शक्तिपीठ पर की पूजा, मोदी सरकार पर बोला हमला.

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी अपने दो- दिन के मध्यप्रदेश दौरे के अंतर्गत आज ग्वालियर पहुंचे. जहां उन्होंने सबसे पहले मां पीतांबरा देवी के दर्शन किये और पूजा-अर्चना की. राहुल गाँधी के साथ मंदिर में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और संसद ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मौजूद रहे. राहुल गाँधी अगले दो दिन संसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभाव वाले ग्वालियर संभाग में रोड शो और जनसभाओं को संबोधित करेंगे.
राहुल गाँधी का यह दौरा विधानसभा चुनाव के नजरिये से काफी महत्वपूर्ण है. ग्वालियर संभाग में मध्यप्रदेश विधानसभा की तकरीबन 34 विधानसभा आती है. 2013 के चुनाव में भाजपा ने यहां 20 सीटों पर जीत दर्ज की थी. ऐसे में अगर कांग्रेस को मध्यप्रदेश की सत्ता में वापिस आना है तो उसे ग्वालियर संभाग में अपनी सीटें बड़ानी होंगी.

दतिया में राहुल गांधी की जनसभा, मोदी सरकार पर बोला हमला

पीतांबरा देवी शक्तिपीठ में पूजा अर्चना करने के बाद राहुल गाँधी ने दतिया पहुंचकर जनसभा को संबोधित किया. मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए राहुल गाँधी ने कहा की ‘जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी तो हमने किसानों का कर्जा माफ़ किया था लेकिन मोदी जी किसानों की अनदेखी कर सिर्फ उद्योगपतियों का कर्जा माफ कर रहे है’ प्रधानमंत्री मोदी से हुई एक मुलाकात का जिक्र करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि ‘मैं किसानों की बात करने पीएम ऑफिस गया था। मैंने उनसे कहा कि आप बड़े उद्योगपतियों का कर्जा माफ कर रहे हैं तो आप किसानों का कर्जा भी माफ कर दीजिए. जिसपर उन्होंने एक शब्द भी नहीं बोला।’
कर्जमाफी के बाद राहुल गांधी ने राफेल  मुद्दा उठाते हुए कहा की ‘अम्बानी की कंपनी के पास ना तो लड़ाकू विमान बनाने का अनुभव है और ना ही क्षमता है, ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी ने अम्बानी की कंपनी को राफेल विमान बनाने का कॉन्ट्रैक्ट क्यों दिया ? सरकार दलील देती है की HAL के पास राफेल बनाने की क्षमता नही है, में पूछना चाहता हूँ की जिसको आपने कांटेक्ट दिया उसके पास क्या राफेल बनाने की क्षमता है ?
राहुल गाँधी ने आगे कहा की प्रधानमंत्री मोदी जिस तरह किसानों के मुद्दे पर चुप थे उसी तरह वह आज राफेल के मुद्दे पर चुप है.

सरकार आने पर किसानो का कर्ज करेंगा माफ, युवाओं को देंगे रोजगार: राहुल गांधी

मोदी सरकार पर हमले के बाद राहुल गाँधी ने कहा की कांग्रेस की सरकार आने बाद फौरन किसानों का कर्जा माफ़ किया जाएगा. युवाओं को रोजगार देने के किये हमारे मुख्यमंत्री 18-18 घंटों तक काम करेंगे. राहुल गाँधी ने आगे कहा की में आपसे झूठे जाड़े नही करूंगा. में आपसे नही कहूँगा की में आपके खाते में 15-15 लाख डलवा दूंगा. में जो बोलूँगा वो करके दिखाऊंगा. सरकार आने पर हम हर जिले में फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाएंगे जिससे किसान सीधे अपने फसलों को बेच सकेंगे.

मध्यप्रदेश में भाजपा की हालत ख़राब, सवर्णों ने घर के बाहर लगाए नोटा को वोट देने के पोस्टर

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मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा की भारी नुक्सान होता दिख रहा है. इन तीनों हिंदी भाषी राज्यों में सवर्णों के अन्दर भाजपा को लेकर भारी आक्रोश है. एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद के रास्ते बदलना बीजेपी को काफी भारी पड़ता दिख रहा है.

समाचार एजेंसी ANI के मुताबिक मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में सवर्णों ने अपने घर के बाहर ‘एससी-एसटी एक्ट’ और आरक्षण के विरोध में पोस्टर लगाए गये है. इन पोस्टर में लिखा है की ‘में सामान्य वर्ग से आता हूँ, कोई भी राजनैतिक दल वोट मांगकर शर्मिंदा न करे. वोट फॉर नोटा’. स्थानीय लोगों ने समाचार एजेंसी से बात करते हुए कहा की ‘एससी-एसटी वर्ग को मिलने वाला आरक्षण, सामान्य वर्ग को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है. इसे रद्द करना चाहिए.

मध्यप्रदेश में भाजपा सवर्णों के बलबूते पिछले 3 बार से सरकार बनाते आ रही है. प्रदेश के सवर्ण काफी समय से भाजपा को वोट देते आए है. ऐसे में सवर्ण की नाराजगी का सबसे ज्यादा नुक्सान भाजपा को ही होगा. आगामी विधानसभा चुनाव में सवर्ण वोट अगर भाजपा के पाले से खिसकता है तो इसका फायदा कांग्रेस और सपाक्स जैसे दलों को हो सकता है.

मध्यप्रदेश में भाजपा की हालत ख़राब, सवर्णों ने घर के बाहर लगाए नोटा को वोट देने के पोस्टर

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मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा की भारी नुक्सान होता दिख रहा है. इन तीनों हिंदी भाषी राज्यों में सवर्णों के अन्दर भाजपा को लेकर भारी आक्रोश है. एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद के रास्ते बदलना बीजेपी को काफी भारी पड़ता दिख रहा है.  
समाचार एजेंसी ANI के मुताबिक मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में सवर्णों ने अपने घर के बाहर ‘एससी-एसटी एक्ट’ और आरक्षण के विरोध में पोस्टर लगाए गये है. इन पोस्टर में लिखा है की ‘में सामान्य वर्ग से आता हूँ, कोई भी राजनैतिक दल वोट मांगकर शर्मिंदा न करे. वोट फॉर नोटा’. स्थानीय लोगों ने समाचार एजेंसी से बात करते हुए कहा की ‘एससी-एसटी वर्ग को मिलने वाला आरक्षण, सामान्य वर्ग को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है. इसे रद्द करना चाहिए.  
मध्यप्रदेश में भाजपा सवर्णों के बलबूते पिछले 3 बार से सरकार बनाते आ रही है. प्रदेश के सवर्ण काफी समय से भाजपा को वोट देते आए है. ऐसे में सवर्ण की नाराजगी का सबसे ज्यादा नुक्सान भाजपा को ही होगा. आगामी विधानसभा चुनाव में सवर्ण वोट अगर भाजपा के पाले से खिसकता है तो इसका फायदा कांग्रेस और सपाक्स जैसे दलों को हो सकता है.

मध्यप्रदेश में बागियों पर नजर लगाए बैठे छोटे दल

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मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव हमेशा से ही द्विपक्षीय रहा है. यहाँ पर सीधी टक्कर कांग्रेस और भाजपा के बीच ही होती रही है. अन्य क्षेत्रीय दलों में सिर्फ बसपा ही कुछ सीटें जीतने में कामयाब रही है. बसपा का काम मध्यप्रदेश में हमेशा से ही वोट काटने का रहा है. भाजपा और कांग्रेस से नाखुश नेताओं को टिकट देकर बसपा मध्यप्रदेश में अपने पैर पसारने की कोशिश सन् 1990 से कर रही है. बसपा के अलावा सपा, एनसीपी और जेडीयू जैसे दल भी काफी समय से मध्यप्रदेश में अपना जनाधार बढ़ाने का असफल प्रयास करते रहे है.

मध्यप्रदेश में बसपा की रणनीति बागियों को टिकट देकर खेल बिगाड़ने की रही है. भाजपा और कांग्रेस से नाखुश नेता, टिकट न मिलने पर चुनाव के वक्त बसपा में शामिल हो जाते है. प्रदेश में हमेशा से ही बागी नेताओं के लिए बसपा एक मजबूत ठिकाना रहा है लेकिन 2018 विधानसभा चुनाव में स्पाक्स, जयस और गोंडवाना जैसी पार्टियों ने पूरा खेल ही बदल दी है.

वैसे तो इन दलों की स्थिति प्रदेश में सरकार बनाने की नही है लेकिन जीतने वाले दल को जिताने में यह दल महत्वपूर्ण भूमिका ज़रुर निभाएंगे.

मध्यप्रदेश में जहाँ महीने भर पहले महागठबंधन के कयास लगाए जा रहे थे वहीं अब हाल यह है की सपा, सपाक्स, जयस और गोंगपा और आप जैसी पार्टी तक पूरी 230 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का मन बना रही है. ऐसे में इन पार्टियों ने कांग्रेस और भाजपा के साथ- साथ बसपा का खेल भी बिगाड़ दिया है. पहले जहां टिकट कटने पर कांग्रेस और बीजेपी नेता सीधे बहनजी के पास पहुँच जाया करते थे वहीं इस बार सपा, स्पाक्स, आप, जयस और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जैसे दल भी इन नेताओं पर अपनी नजर लगाए बैठे है.

कांग्रेस और भाजपा जल्द ही उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर सकती है. इस बार दोनों ही पार्टी की रणनीति प्रत्याशी बदलने की है. मीडिया में आई ख़बरों के अनुसार भाजपा जहां इस बार 70 से ज्यादा मौजूदा विधायकों की टिकट काटने की तैयारी में है. वहीं कांग्रेस ज्यादातर विधान सभाओं में अपने हारे हुए उम्मीदवारों की टिकट काटने की तैयारी में कर रही है.

दलित बाहुल्य आरक्षित सीटों पर बागी जहाँ बसपा के पाले में जाएंगे, वहीं सवर्ण बाहुल्य सीटों पर बागी अब सपाक्स का रुख कर सकते है. साथ ही आदिवासियों के प्रभाव वाली और एसटी आरक्षित सीटों पर बागी नेता गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और जयस जैसे दलों का रुख कर सकते है.

ऐसे में इन छोटे दलों का इस विधानसभा चुनाव में प्रदर्शन इसी बात पर निर्भर करेगा की किसके पाले में कितने बागी नेता आएँगे।