Home Tags Madhya pradesh election

Tag: madhya pradesh election

CM शिवराज आज जन आशीर्वाद यात्रा को देंगे विराम, 187 विधानसभा क्षेत्र तक ही जा पाई यात्रा

0

मध्यप्रदेश के 230 विधानसभा सीटों पर जन आशीर्वाद यात्रा लेने निकले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आज जबलपुर में यात्रा को विराम देंगे। बता दें कि 230 विधानसभा सीट में से सिर्फ 187 सीटों तक ही यात्रा पहुंच पाई। बाकी के 43 सीटें यात्रा से छूटी।

क्या है यात्रा रोकने का कारण

बताया जा रहा है कि चुनावी तैयारियों के चलते इस यात्रा को विराम दिया जा रहा. गौरतलब है कि जन आशीर्वाद यात्रा की शुरुआत 14 जुलाई को उज्जैन से हुआ था. अब इसका समापन आज यानि 25 अक्टूबर को जबलपुर में होगा।

छिंदवाड़ा जिला : जनसंख्या, राजनीति, और चुनावी समीकरण

0

कमलनाथ मध्यप्रदेश की राजनीति का बड़ा नाम है, जिन्हें मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव की कमान कांग्रेस पार्टी ने सौंपी है। छिंदवाड़ा से लगातार दस बार सांसद कमलनाथ, छिंदवाड़ा मॉडल को लेकर पूरे मध्यप्रदेश में प्रसिद्ध हैं। इसी मॉडल के बलबूते कमलनाथ मैदानी जंग जीतने का प्रयास कर रहें हैं।

छिंदवाड़ा की 24.16 प्रतिशत जनता शहरी क्षेत्र में रहती है, जबकि 75.84 प्रतिशत लोग ग्रामीण इलाके में रहते हैं। छिंदवाड़ा आदिवासी बहुल इलाका है, जहां परासिया, जुन्नारदेव, अमरवाड़ा, छिंदवाड़ा, सौंसर, पांढुर्णा और चौरई मिलाकर सात विधानसभा आती हैं। जिनमें तीन अनुसूचित जनजाति(एससी) और एक अनुसूचित जाति की सीटें है। वर्तमान में चार पर भाजपा तो वहीं तीन पर कांग्रेस काबिज है।

छिंदवाड़ा की जनसंख्या,मतदाता और लिंग अनुपात

  1. आबादी : 2,090,922 (महिला : 1,026,454 पुरुष : 1,064,468)
  2. लिंग अनुपात : 964 प्रति 1000 व्यक्तिs
  3. साक्षरता दर : 81.46%
  4. मतदाता संख्या : 1,151,325

छिंदवाड़ा का जातिगत समीकरण

  1. हिंदू : 81 %
  2. मुसलिम : 13 %
  3. ईसाई : 1.6 %
  4. जैन : 3.4 %
  5. अन्य : 1 % (Source)

छिंदवाड़ा : 2013 विधानसभा चुनाव के नतीजे

2013 के नवंबर में हुए विधानसभा चुनाव में छिंदवाड़ा जिले की सात सीटों में से भाजपा चार और कांग्रेस तीन सीटों पर कब्जा कर पाई थी।

  1. जुन्नारदेव विधानसभा सीट : नाथनशाह केवरती भाजपा विधायक हैं। जुन्नारदेव आरक्षित सीट (एसटी) है, जहां भाजपा के नाथनशाह केवरती ने कांग्रेस उम्मीदवार सुनील उईके को 20,121 वोटों से हरा कर जीत हासिल की थी।
  2. अमरवाड़ा विधानसभा सीट : कमलेश शाह कांग्रेस विधायक हैं। अमरवाड़ा आरक्षित सीट (एसटी) है, जहां कांग्रेस के कमलेश शाह ने भाजपा प्रत्याशी उत्तम प्रेमनारायण ठाकुर को 4,063 वोटों से हरा कर जीत दर्ज की थी।
  3. चौरई विधानसभा सीट : पंडित रमेश दुबे भाजपा विधायक हैं। चौरई सीट से भाजपा के पंडित रमेश दुबे ने कांग्रेस के उम्मीदवार चौधरी गंभीर सिंह को 13,631 वोटों से हरा कर जीत हासिल की थी।
  4. सौसर विधानसभा सीट : नानाभाऊ नोहोद भाजपा विधायक हैं। सौसर सीट से भाजपा नानाभाउ ने कांग्रेस के उम्मीदवार भागवत महाजन को 8,416 वोटों से हरा कर जीत हासिल किया।
  5. छिंदवाड़ा विधानसभा सीट : चौधरी चंद्रभान सिंह भाजपा विधायक हैं। छिंदवाड़ा सीट से भाजपा के चंद्रभान सिंह ने कांग्रेस के प्रत्याशी दिपक सक्सेना को 24,778 वोटों से हराया।
  6. परासिया विधानसभा सीट : सोहनलाल वालमीक कांग्रेस विधायक हैं। परासिया सीट (एससी) से जहां से कांग्रेस के सोहनलाल ने भाजपा के उम्मीदवार को 6,862 वोटों से हराकर जीत हासिल की।
  7. पांढुर्णा विधानसभा सीट : जतन उईके कांग्रेस विधायक हैं। पांढुर्णा सीट (एसटी) है, जहां से कांग्रेस के जतन उईके ने भाजपा के टीकाराम कोराची को 14,478 वोटों से हराकर जीत दर्ज की है।

छिंदवाड़ा की राजनीति :

छिंदवाड़ा की राजनीति में कमलनाथ का नाम सबसे बड़ा है। कमलनाथ लगातार 10 बार सांसद भी रह चुकें है, इसके बावजूद कांग्रेस कभी सातों विधानसभा सीटों पर कब्जा करने में कामयाब नहीं हो पाई। वहीं भाजपा हर चुनाव में कांग्रेस से ज्यादा सीटों पर बाजी मार ले जाती है।

कांग्रेस और भाजपा के अलावा गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, गोंडवाना मुक्ति सेना, नेशनल पीपुल्स पार्टी, पीपुल्स रिपब्लिकन, लोकजन शक्ति, भारतीय जनशक्ति, जनता दल यूनाईटेड जैसी कई पार्टिंयां इस बार चुनाव में उतर रहीं है। विपक्षी गठबंधन ना होने की वजह से सभी पार्टियां अलग अलग चुनाव लड़ने वाली हैं।

छिंदवाड़ा में फ्लोराइड की समस्या

प्रदेश के 14 फ्लोराइड प्रभावित जिलों में से छिंदवाड़ा चौथे स्थान पर आता हैं। सरकार की तरफ से करोड़ो रुपय खर्च करने के बावजूद वहां के लोगों को फ्लोराईड पानी पीना पड़ रहा है। जिले में परासिया, जुन्नारदेव, तामिया और चौरई फ्लोराईड प्रभावित क्षेत्र है।

छिंदवाड़ा की सस्कृति

सतपुड़ा के जंगलो से घिरे छिंदवाड़ा जिले में आदिवासियों की तादात ज्यादा है। गोंड, परधान, भारिया, कोरकू जैसे जनजाति समुदाय रहते हैं। जिले में हिंदी, उर्दू, कोरकू, मूसई जैसी भाषा और बोलियों का प्रयोग किया जाता है। जिले के पोलू, भुजलिया, मेघनाथ, अखाड़ी, हरिज्योति जैसे त्योहारो को धूमधाम से मनाया जाता है। पांदुर्णा का गोटेमार मेला विश्वभर में प्रसिद्ध है। जिसमें दोनों तरफ के लोग एक दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं। छिंदवाड़ा को कई मंदिरो और मस्जिदों का आर्शिवाद भी प्राप्त है।

र्शनीय स्थल :

जंगलो, झिलों और पहाड़ो के बीच में बसा खूबसूरत शहर छिंदवाड़ा ना सिर्फ कमलनाथ की राजनीति के लिए प्रसिद्ध है बल्कि यहां कई दर्शनीय स्थल हैं जिसे लोग दूर दूर से देखने आते हैं।
सिमरिया हनुमान मन्दिर (नागपुर रोड),हिंगलाज माता मन्दिर अम्बाडा, भरतादेव, तामिया, सप्तधारा मटकुली,पातालकोट,डोंगरदेव, खेडापति माता मन्दिर चांदामेटा, कपुरदा मन्दिर, चौरई, पेंच राष्ट्रीय उद्यान,जामसावली (हनुमान मन्दिर) सौसर,जुन्नारदेव पहली पायरी, अर्द्धनारीश्वर ज्योतिर्लिंग, मोहगांव हवेली, राजमहल हर्रई, कोकन पाठ झण्डा मन्दिर हर्रई, छोटा महादेव तामिया, वर-दिया (अमरवाड़ा) हनुमान दादा का सिद्ध मन्दिर, देवगढ़ का किला मोहखेड़, घोगरा वॉटर फॉल।

उघोग की स्थिति :

छिंदवाड़ा के सांसद कमलनाथ खुद एक उघोगपति है और छिंदवाड़ा के विकास और बेरोजगारी को दूर करने के लिए बाहरी उघोगों को जिले में स्थापित करने का प्रयाश करते रहते है। जिसमें हिंदुस्थान यूनीलिवर लिमिटेड, नकोडा टी.एम.टी, रेमंड ग्रूप, टेक पैक और कोयले की खदाने है जो हजारो लोगों को नौकरी देने का दावा करती हैं।

समस्या : एक ही जिले में इतने उघोग होने के बावजूद वहां के लोगों को नागपुर जैसे बड़े शहरों का रूख करना पड़ रहा है। बरोजगारी छिंदवाड़ा जिले की बहुत बड़ी समस्या है।

भाजपा या कांग्रेस, कौन जाएगा तेल लेने ?

0

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में इस बार प्रचार और प्रहार के लिए वीडियो का काफी इस्तेमाल हो रहा है. कभी शिवराज मामा अंगद बने दिखाई देते हैं तो कभी कमलनाथ भगवान श्री कृष्णा. कभी दिग्विजय सिंह कहते हैं कि उनके प्रचार करने से कांग्रेस के वोट कटते हैं तो अब कांग्रेस नेता जीतू पटवारी कह रहे हैं कि ‘पार्टी गयी तेल लेने’.

दरअसल कांग्रेस नेता जीतू पटवारी का एक वीडियो इस समय सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. 3 सेकंड के इस वीडियो में पटवारी एक व्यक्ति से गले मिलते हुए कहते हैं कि ‘पार्टी गयी तेल लेने’. अब इस आधे-अधूरे वीडियो में यह बात साफ़ नही थी कि जीतू पटवारी इसमें अपनी ही पार्टी कांग्रेस की बात कर रहे हैं या सत्ता में बैठी भाजपा की. वीडियो के वायरल होते ही भाजपा ने भी तंज कसने का मौका नही छोड़ा और जीतू पटवारी के इस वीडियो पर तंज कसते हुए भाजपा नेताओं ने कहा कि ‘अब तो कांग्रेस नेता भी मानने लग गये कि कांग्रेस अब तेल लेने जा रही है और सोशल मीडिया पर #CongressGayiTelLene ट्रेंड करने लगा.

वीडियो वायरल होने के बाद विधायक जीतू पटवारी ने सफाई दी कि वह इस वीडियो में कांग्रेस नही बल्कि भाजपा की बात कर रहे थे. जीतू पटवारी ने अपने ट्विटर अकाउंट पर वीडियो शेयर करते हुए कहा कि “मैं ही नहीं, पूरे देश की जनता अब कह रही है कि ‘बीजेपी जाये तेल लेने’ . भाजपा अपने दामन के दाग छिपाने के लिये तरह-तरह के हथकंडे अपना रही है, पर जनता सब जानती है। मैं आज जनसंपर्क के दौरान में भाजपा के एक कार्यकर्त्ता के यहाँ गया, मैंने उनसे कहा कि आप जिस भी पार्टी के हो, जीतू पटवारी आपके परिवार का सदस्य है. आपको मेरी इज्जत रखनी है”.

इस पूरे घटनाक्रम के बाद कांग्रेस ने भाजपा पर पलटवार किया. यूथ कांग्रेस अध्यक्ष केशव चन्द्र यादव ने कहा ” 2014 में पेट्रोल की कीमत 63 रुपये/लीटर था और आज कच्चे तेल के दाम कम होने के बाद भी 90 रुपये/लीटर मिल रहा है. जब मेरा पीएम चोर है फिर क्यों नही ‘कांग्रेस गयी तेल लेने’ की बजाय भाजपा जाए तेल लेने.”

लेखक संघमित्रा ने कहा कि “मोदी जी के राज में, वोटर गये तेल लेने, लोकतंत्र गया तेल लेने, राम मंदिर गया तेल लेने, गंगा की सफाई गयी तेल लेने, कालाधन गया तेल लेने और अर्थव्यवस्था गयी तेल लेने. बैठकर देखो, 2019 में बीजेपी और आरएसएस जाएँगे तेल लेने.”

भाजपा के ‘समृद्ध मध्यप्रदेश’ अभियान के तहत पहले दिन ही मिले 20 हजार से ज्यादा सुझाव

0

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए तैयारियां जोरो शोरो पर है. सभी दल के नेता कार्यकर्ता तरह-तरह के अभियान का सहारा लेते हुए प्रचार प्रसार में लगे हुए हैं. भाजपा भी ‘समृद्ध मध्यप्रदेश’ अभियान के तहत अब तक 50 रथ निकालकर लोगों से मध्य प्रदेश को समृद्ध बनाने का सुझाव मांग रही है. दिलचस्प बात ये है कि अभियान शुरू होने के पहले दिन ही 20 हजार से ज्यादा लोगों ने सुझाव दिए हैं. जिनमे से कुछ ने सुझाव की जगह शिकायतें भी की है.

व्हाट्स ऐप, वेबसाइट के जरिये सुझाव

अभियान के पहले दिन ही फोन, व्हाट्सऐप और वेबसाइट के माध्यम से 20 हजार 700 लगभग सुझाव मिले हैं. बता दें कि भाजपा का ये रथ अभियान और भी जिलों में पहुंचना बाकी है. भाजपा कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि ये आकड़ें और भी बढ़ेंगे।

कांग्रेस ने चुनाव आयोग से की शिकायत

भाजपा के इस अभियान को लेकर कांग्रेस मीडिया सेल के उपाध्यक्ष भूपेंद्र गुप्ता ने कहा कि ‘ये सभी ढोंग है, जो भाजपा आम लोगों को बहलाने के लिए कर रही है. पार्टी को शर्म आनी चाहिए अगर, सत्ता में 15 साल रहने के बाद भी जनता से सुझाव लेने की जरूरत पड़ती है.’

बहरहाल, पहले ही दिन 20  हजार से ज्यादा के सुझाव में भले ही शिकायत भी हों लेकिन इससे भाजपा को आम जनता का नब्ज टटोलने का मौका मिल गया है.

उमरिया जिलें में अबकी बार किसका बेड़ा पार ?

0

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव का शंखनाद हो चुका है. सभी दल इसको अंतिम रूप देने के लिए नगर मोहल्ले में चुनाव प्रसार करते हुए नजर आ रहे हैं. ऐसे में हम आपको मध्यप्रदेश के उमरिया जिले के बारे में बताएंगे जहां दो विधानसभा सीटों पर अबकी बार किसका बेड़ा पार होता दिखाई दे रहा ? साथ ही इसी साल नए अस्तित्व में आई सपाक्स पार्टी कितना छाप छोड़ पायेगी?

उमरिया जिले के बारे में


जनसंख्या 2011 जनगणना के हिसाब से

64,3579

पुरुष 

34,560

महिला

30,605

साक्षरता दर

67. 37

नदियां

सोन, जोलिया

उमरिया जिलें में दो विधानसभा सीट

उमरिया जिले में दो विधानसभा सीट है. बांधवगढ़ और मानपुर। दोनों सीट पर भाजपा के विधायक हैं. बांधवगढ़ से शिवनारायण सिंह (सांसद ज्ञान सिंह का बेटा ) तो मानपुर से मीना सिंह विधायक के रूप में कार्यरत हैं. साथ ही दूसरी और तीसरी बड़ी पार्टी के रूप में कांग्रेस और बसपा मौजूद है. वहीं इस बार सपाक्स चौथी पार्टी के रूप में उभरी है।

बांधवगढ़ विधानसभा

बांधवगढ़ विधानसभा सीट पर अब तक दो बार 2008 और 2013 में चुनाव हुए हैं.  वहीं एक बार 2017 में उपचुनाव हुए थे. दोनों बार के चुनाव में भाजपा के ज्ञान सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी को हराकर जीत दर्ज कराई थी. 2017 में हुए उप चुनाव में ज्ञान सिंह के बेटे शिवनारायण सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी सावित्री सिंह को 25,476  मतों से शिकस्त देकर भाजपा के लिए जीत की हैट्रिक जमाई.

बांधवगढ़ के कॅामन मुद्दे

कहने को तो पिछले 3 बार से बांधवगढ़ में भाजपा की सरकार है लेकिन अभी भी कई सारे मुद्दों से बांधवगढ़ संघर्ष करता हुआ नजर आता है. बांधवगढ़ में सबसे बड़ी समस्या है रोजगार क्योंकि यहां भले ही कोयला की खदाने है लेकिन स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं मिल पता. दूसरी पानी की समस्या से बांधवगढ़ के कई गांव प्रभावित हैं.

मानपुर विधानसभा

पिछले दो बार से मानपुर विधानसभा सीट पर भाजपा के विधायक मौजूद हैं. 2013 में हुए चुनाव में भाजपा की मीना सिंह ने 2,16,002 में से 70,024 वोट यानी 43.71 प्रतिशत वोटों से जीत दर्ज कराई थी. वहीं निर्दलीय उम्मीदवार गायत्री सिंह 26,396 वोट लेकर रनरअप रही थीं. जबकि कांग्रेस की शकुंतला प्रधान 25,778 वोट मतलब 16.09 मत प्रतिशत के साथ तीसरे स्थान पर रही थीं.

मानपुर के कॅामन मुद्दे

उमरिया के इस जिलें में सबसे बड़ी समस्या है शिक्षा और स्वास्थ. चुनाव नजदीक आते ही नेतागढ़ कुपोषण और बेरोजगारी जैसी समस्या हटाने की बात करते हैं लेकिन चुनाव परिणाम के बाद ये मुद्दे किसी कोने में पड़ी हुई रहती हैं.

सपाक्स में कितना दम

कहा जा रहा है कि इस बार उमरिया जिले के दोनों विधानसभा सीटों पर सपाक्स अपना छाप छोड़ेगी. राजनीतिक सूत्रों की माने तो उमरिया जिले के दोनों विधानसभा सीटों पर अबकी बार जनता का मूड बदलता हुआ दिखाई रहा है और यही वजह है कि इस बार सपाक्स के अच्छे प्रदर्शन की उम्मीदें हैं. हालांकि सपाक्स के लिए भी उम्मीदवार चुनना टेढ़ी खीर माना जा रहा है. क्योंकि जहां एक तरफ बांधवगढ़ गोंड आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है तो वहीं मानपुर में ब्राह्मण,ठाकुर और बनिया की वोट संख्या ज्यादा है ऐसे में सपाक्स किसको टिकट देगी या किसको नहीं ये उनके लिए परेशानी का सबब बना हुआ है.

मध्यप्रदेश में कांग्रेस से ज्यादा अपने सम्मान की चिंता कर रहे हैं दिग्गज कांग्रेसी

0
मध्यप्रदेश में कांग्रेस के नेताओं के बीच की लड़ाई पार्टी के मुद्दे काफी दिलचस्प हैं। स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक में अहम की यह लड़ाई गंभीर गुटबाजी में बदलती जा रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की लोकप्रियता को भी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। सिंधिया से कांग्रेस के नेताओं की अपेक्षा वैसी ही दिखाई दे रही है,जैसी वे अपने समर्थकों से करते हैं।

कांग्रेस की इस गुटबाजी का लाभ उठाते हुए पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी ने अपने समर्थकों को हर नेता के साथ फीट कर दिया है।

स्क्रीनिंग कमेटी में सिंधिया बनाम ऑल की लड़ाई

मध्यप्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी की एतिहासिक पृष्ठभूमि रही है। इस एतिहासिक पृष्ठभूमि में कमलनाथ हमेशा ही माधवराव सिंधिया के खिलाफ ही खड़े हुए नजर आए। माधवराव सिंधिया का नाम जब भी मुख्यमंत्री पद के लिए उभर कर सामने आया तब-तब अर्जुन सिंह-कमलनाथ ने इसका खुला विरोध किया। चुरहट लॉटरी कांड में आए फैसले के बाद जब कांगे्रस हाईकमान ने अर्जुन सिंह को हटाने का फैसला लिया तब विधायकों के समर्थन के आधार पर माधवराव सिंधिया को मुख्यमंत्री पद पर आने से रोका गया। अर्जुन सिंह समर्थक ठाकुर हरवंश सिंह के चार बंगले स्थिति निवास पर तीन दिन तक कांगे्रसी विधायक नजरबंद रहे। बाद में राजीव गांधी को समझौते का रास्ता निकालते हुए मोतीलाल वोरा को दुबारा राज्य का मुख्यमंत्री बनाना पड़ा था। वोरा,माधवराव सिंधिया के करीबी थे। लगभग चार दशक पुरानी यह गुटबाजी पीढ़ी बदलने के बाद भी खत्म होती नजर नहीं आ रही हैं। प्रदेश कांगे्रस कमेटी के अध्यक्ष कमलनाथ आज भी इस गुटबाजी के केन्द्र में हैं।

केन्द्र से कांग्रेस की सरकार जाने के बाद कमलनाथ किंगमेकर की भूमिका छोड़कर किंग बनने के लिए तैयार दिखाई दे रहे हैं। पिछले चार दशक में कमलनाथ कभी भी छिंदवाड़ा जिले से बाहर नहीं निकले हैं। विधानसभा के इस चुनाव में भी वे छिंदवाड़ा के कथित विकास को ही अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। छिंदवाड़ा के कमलनाथ मॉडल को वोटरों ने वोटरों ने खास तव्वजों नहीं दी है। 72 साल के कमलनाथ ने पिछले छह माह में दो अंकों की संख्या में बताया जा सके इतनी रैलियां भी नहीं कर पाए हैं। क

मलनाथ ने अपनी पूरी ताकत सिंधिया को रोकने में लगा रखी है। पार्टी की चुनाव प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष होने के बाद भी प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने राज्य भर में सिंधिया की सभा भी नहीं होने दी। जबकि राज्य में कमलनाथ के मुकाबले में सिंधिया का चेहरा ज्यादा लोकप्रिय है। कई चुनावी सर्वेक्षणों में भी मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर कमलनाथ के पक्ष में उत्साहजनक राय सामने नहीं आई है। अब कमलनाथ की कोशिश है कि अपने समर्थकों को ज्यादा से ज्यादा टिकट दिलाकर सिंधिया को मुख्यमंत्री पद की दौड़ से बाहर कर दिया जाए। राज्य में परंपरागत तौर सिंधिया विरोधी नेता एक साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। इन नेताओं में दिग्विजय सिंह, कमलनाथ,अजय सिंह और कांतिलाल भूरिया प्रमुख हैं। पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी दोनों गुट में समान रूप से सक्रिय नजर आ रहे हैं। बताया जाता है कि पचौरी ने अपने कुछ समर्थकों के नाम सिंधिया गुट से और कुछ समर्थकों के नाम कमलनाथ गुट की ओर से आगे बढ़ाया हैं। विवेक तन्खा भी दोनों गुटों को साध कर अपने समर्थकों को टिकट दिलाने की कोशिश कर रहे हैं।

भाजपा से समझौते की उड़ रहीं अपवाहें

चुनाव के लिए उम्मीदवारों की सूची जारी होने से पहले एक बार फिर भूल छाप कांगे्रसियों के सक्रिय दिखाई देने से प्रतिबद्ध कांगे्रसी हैरान हैं। प्रतिबद्ध कांगे्रसी यह महसूस कर रहे हैं कि पार्टी के कुछ बड़े नेताओं ने इस चुनाव से पहले भाजपा से अंदरूनी समझौता कर लिया है। अधिकांश कांगे्रसी यह मानते हैं कि कमलनाथ की तुलना में ज्योतिरादित्य सिंधिया का चेहरा राज्य में ज्यादा लोकप्रिय है। राज्य के वोटर भी यह मानते हैं भाजपा की पंद्रह साल की सरकार को चुनौती सिर्फ सिंधिया दे सकते हैं। प्रदेश कांगे्रस के अधिकांश नेता भी यह महसूस करते हैं कि सिंधिया का लाभ पाटर्भ् को मिल सकता है, लेकिन वे पार्टी से ज्यादा अपने अहम को ज्यादा महत्व दे रहे हैं। सिंधिया से उनके विरोधियों को शिकायत इस बात की रहती है कि वे उम्र में काफी बड़े अजय सिंह, कांतिलाल भूरिया और सुरेश पचौरी जैसे नेताओं को भी पहले नाम से बुलाते हैं। पार्टी नेताओं की यह अपेक्षा है कि सिंधिया उनकी वरिष्ठता को स्वीकार करें। सिंधिया वर्ष 2002 में सक्रिय राजनीति में आए हैं। जबकि उनके मुकाबले में खड़े विरोधी नेता अस्सी के दशक से राजनीति कर रहे हैं। कांग्रेस के नेता यह भी चाहते हैं कि सिंधिया अपने संसदीय क्षेत्र तक सीमित रहे हैं।

दिग्विजय सिंह-कमलनाथ की जोड़ी ग्वालियर संभाग में अपने उन समर्थकों को टिकट दिलाना चाहते हैं पंद्रह साल में जिनकी मैदानी पकड़ कमजोर हो गई है। मध्यप्रदेश की स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमेन मधूसूदन मिस्त्री हैं। मिस्त्री भी सिंधिया द्वारा दिए गए नामों पर क्ैंची चला रहे हैं। सिंधिया को राहुल गांधी का करीबी मानी जाता है। हर चुनावी सभा में वे कमलनाथ से ज्यादा महत्व सिंधिया को दे रहे हैं। सिंधिया सिर्फ 47 साल के हैं।

क्या पीके मध्यप्रदेश में कर पाएँगे जेडीयू का बेडा पार ?

0
Patna: Bihar Chief Minister and Janta Dal United JD(U) National President Nitish Kumar greets electoral strategist Prashant Kishor after he joined JD(U) during party's state executive meeting at Anne Marg, in Patna.

नवंबर में होने वाले मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में अब एक महीने से कुछ ही दिन ज्यादा बचे है. चुनाव के नजदीक आते-आते प्रदेश के बाहर की छेत्रीय पार्टी भी अब प्रदेश का रुख कर रही है. बसपा, सपा, आप, एनसीपी और शिवसेना के बाद अब नितीश कुमार की जेडीयू ने भी मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है. जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष सूरज जैसवाल ने कहा की पार्टी विंध्य, बुंदेलखंड, महाकौशल और नर्मदांचल की 150 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति पर काम कर रही है.

भाजपा के लिए 2014 और महागठबंधन के लिए बिहार विधानसभा 2015 में चुनावी रणनीति तैयार करने वाले प्रशांत किशोर कुछ दिनों पहले ही जेडीयू में शामिल हुए है. शामिल होते ही नितीश कुमार ने प्रशांत किशोर को नंबर 2 की पोजीशन देते हुए पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त कर दिया है. जेडीयू की चुनावी रणनीति अब प्रशांत किशोरे के जिम्मे ही है. मध्यप्रदेश में भाजपा के साथ गठबंधन न करके जेडीयू ने अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया है. हालाँकि जेडीयू मध्यप्रदेश में अपना दल, भारतीय शक्ति चेतना, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जैसे छोटे दलों के साथ गठबंधन की संभावनाएं जरूर तलाश रही है.

मध्यप्रदेश चुनाव की रणनीति पर चर्चा करने के लिए नितीश कुमार ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सूरज जैसवाल को पटना बुलाया है. उम्मीद है की इस बैठक में प्रशांत किशोर भी शामिल होंगे.

तीन विधानसभा चुनाव, 107 प्रत्याशी, 1 जीत, 102 पर जमानत जब्त

मध्यप्रदेश में जेडीयू अब तक तीन विधानसभा चुनाव लड़ने के बाद भी प्रदेश में कोई ख़ासा असर नही बना पाई है. जेडीयू ने पहली बार मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2003 में लड़ा था. पार्टी ने तब प्रदेश की 36 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और 1 सीट पर जीत दर्ज की थी. वहीं 33 सीटों पर जेडीयू उम्मीदवार की जमानत जब्त हो गयी थी. इसके बाद 2008 विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने 49 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशी उतारे. इस चुनाव में पार्टी अपना खाता भी नही खोल पाई और 49 में 48 सीटों पर जेडीयू के उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई. 2013 में जेडीयू ने 22 उम्मीदवार उतारे और बिना कोई सीट जीते 21 सीटों पर जेडीयू की जमानत जब्त हो गई.

साफ़ है की मध्यप्रदेश में जेडीयू की स्तिथि सुधारना प्रशांत किशोर के लिए बड़ी चुनौती होगी. प्रशांत किशोर की कोशिश चुनाव में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के साथ गठबंधन करने की है. गठबंधन के प्रयास के साथ ही जेडीयू, गपा से नाराज चल रहे लोगों को भी संपर्क में ले रही है. पार्टी के पदाधिकारियों और छोटे दलों के कुछ नेताओं के साथ 22 अक्टूबर को बैठक करके जेडीयू 23 अक्टूबर को प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर सकती है.

शिवराज सिंह चौहान ने स्वर्णिम को छोड़कर समृद्ध मध्यप्रदेश को क्यों अपनाया ?

0

वर्ष 2018 के विधानसभा के आम चुनाव में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समृद्ध मध्यप्रदेश की परिकल्पना लेकर वोटरों के बीच जा रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के भोपाल स्थित मुख्यालय दीनदयाल परिसर से लगभग पचास रथों को राज्य भर में भेजा जा रहा है। रविवार को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इन रथों को हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। ये रथ पार्टी का प्रचार करेंगे और वोटरों से समृद्ध मध्यप्रदेश बनाने के लिए सुझाव भी लेंगे। शिवराज सिंह चौहान अब तक स्वर्णिम मध्यप्रदेश की बात करते रहे हैं। समृद्ध मध्यप्रदेश का नारा पार्टी बड़े नेताओं के गले भी नहीं उतर रहा है। स्वर्णिम और समृद्ध मध्यप्रदेश का फर्क भी लोग नहीं समझ पा रहे हैं।


वोटरों को लुभाने का नारा भी नहीं दे पाई है भाजपा


मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को पंद्रह साल पूरे हो चुके हैं। पहली बार भारतीय जनता पार्टी इतने लंबे समय से राज्य की सत्ता को संभाल रही है। पंद्रह सालों की सरकार में तेरह साल से शिवराज सिंह चौहान राज्य के मुख्यमंत्री हैं। पार्टी उनके नेतृत्व में तीसरा चुनाव लड़ने जा रही है। तीसरे चुनाव की पूरी तैयारियां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद कर रहे हैं। उनके भरोसे के अफसरों और रणनीतिकारों ने इंवेट मेनेजमेंट कंपनियों के जरिए चुनाव प्रचार की रणनीति तैयार कर रही है। पंद्रह साल की सरकार के बाद भारतीय जनता पार्टी में ऐसे मुद्दों का अभाव साफ दिखाई दे रहा है,जो कि चौथी बार सरकार बनाने में मदद कर सकें। पार्टी ने चुनाव घोषणा पत्र तैयार करने की जिम्मेदारी पूर्व केन्द्रीय मंत्री विक्रम वर्मा को दी है। घोषणा पत्र को पार्टी ने दृष्टि पत्र का नाम दिया है। दृष्टि पत्र में समृद्ध मध्यप्रदेश खाका खींचा जाएगा। राज्य में एट्रोसिटी एक्ट के खिलाफ उभरे असंतोष के कारण पार्टी अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग को विशेष तव्वजों देने से बचने की कोशिश भी कर रही है। सामान्य वर्ग के लिए आर्थिक आधार पर योजनाओं का लाभ देने का वादा इस दृष्टि पत्र में किया जा सकता है। पिछले पांच सालों में शिवराज सिंह चौहान ने राज्य में कई नई योजनाएं शुरू की हैं। इनमें किसानों के लिए शुरू की गई भावातंर योजना प्रमुख है। इसके बाद भी किसान सरकार से नाराज है। कांगे्रस ने किसान वोटरों को लुभाने के लिए कर्ज मुक्ति का कार्ड खेला है।


बेरोजगारी का मुद्दा भी बड़ा रहा है भाजपा की मुश्किल


एक समद्ध राज्य की कल्पना में समाज के हर वर्ग को खुश होना चाहिए। महिलाओं को सुरक्षा और बेरोजगार को काम दिलाए बगैर समृद्ध राज्य नहीं बन सकता। कांगे्रस किसानों के अलावा बेरोजगारी और महिला सुरक्षा को भी चुनाव में भुनाने की कोशिश में लगी हुई है। राज्य का औद्योगिक विकास भी पंद्रह साल में उतना नहीं हुआ है जितना कि इंवेस्टर समिट में दावा किया गया था। अपवाद स्वरूप कुछ उद्योगों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश उद्योगपतियों ने एमओयू करने के बाद भी राज्य की ओर पलट कर नहीं देखा । सरकारी क्षेत्र की भर्तियों से जुड़े व्यापम घोटाले ने बेरोजगारी को समस्या को और भी गंभीर कर दिया था। सरकारी क्षेत्र का भ्रष्टाचार भी शिवराज सिंह चौहान की सरकार के लिए मुसीबत बना हुआ है। मजबूरन मुख्यमंत्री को निगेटिव कैंपेन के जरिए कांगे्रस पर हमला बोलना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लगातार अपने भाषणों में दिग्विजय सिंह सरकार के कार्यकाल को याद दिला रहे हैं। राज्य में वर्ष 1993 से 2003 तक दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली कांगे्रस सरकार थी। सड़क,बिजली और पानी की समस्या ने दिग्विजय सिंह को मिस्टर बंटाधार नाम दिला दिया। जबकि दलित एजेंडा के कारण उच्च वर्ग सरकार से नाराज थे। यही हालात अभी भी बने हुए हैं। एट्रोसिटी एक्ट के नए रूप से उच्च वर्ग गुस्से में है। उच्च वर्ग पिछले तीन चुनावों से लगातार भाजपा का साथ दे रहा था। उसकी नाराजगी से भी भाजपा चिंता में है।

Kamal Nath

मुरैना में बसपा बदल रही है उम्मीदवार, हो सकती है बगावत

0

कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन बनाने में असफल रही बहुजन समाज पार्टी की मैदानी दिक्कतें बढ़ती जा रही है. मध्यप्रदेश में मुरैना की गिनती उन चुनिंदा  जिलों में की जाती है जहाँ बसपा लड़ने और जीतने की स्तिथि में दिखाई देती है.

जिले की मुरैना विधानसभा सीट को लेकर पार्टी में गुटबाजी और खींचतान देखने को मिल रही है. पार्टी ने पिछले दिनों मुरैना विधानसभा सीट से जिला अध्यक्ष रामप्रकाश राजौरिया को उम्मीदवार घोषित किया था. जिसके बाद राजोरिया तेजी से अपना चुनाव प्रचार कर रहे थे. 

प्रचार शुरू होने के कुछ दिनों बाद अब अचानक उनके स्थान पर नया उम्मीदवार घोषित किये जाने की चर्चाएं तेज हो गई है.

बताया जा रहा है कि दिमनी के विधायक बलवीर दंडोतिया मुरैना विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहते हैं. बलवीर के साथ ही एक अन्य नाम, शिव सिंह गुर्जर का भी सामने आया है. पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रदीप अहिरवार ने कहा की ‘काकी राजोरिया का टिकट बदला जा रहा है या नहीं इस बारे में कुछ नहीं कह सकते सूची जारी होने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी’

पार्टी के जिला अध्यक्ष राकेश कुमार कहा कि सितंबर में राजोरिया को उम्मीदवार घोषित करने के निर्देश पार्टी मुख्यालय से प्राप्त हुए थे इसलिए उन्हें अधिकृत उम्मीदवार का पत्र दिया गया था अगर पार्टी कोई नया नाम भेजेगी दो उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी.

सूत्रों ने बताया कि मुरैना में चल रहे घमासान के कारण पार्टी ने अपनी सूची को जारी होने से फिलहाल रोक दिया है

संघ मैदान में आया है तो चुनाव का मुद्दा राम और पाकिस्तान ही होगा

0

हिन्दी भाषी तीन राज्यों की चुनाव प्रक्रिया के बीच आए दशहरे के त्यौहार ने इस बात के स्पष्ट संकेत दिए हैं कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की भाजपा सरकार को बचाने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्त्ता राम और पाकिस्तान का अस्त्र लेकर चुनाव मैदान में प्रचार करते नजर आएंगे।

अब तक तीनों राज्यों में सरकार की नाकामी चुनाव का मुद्दा बने हुए हैं। कांग्रेस भाजपा के तीनों मुख्यमंत्रियों पर लगातार हमलावर है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मध्यप्रदेश पर विशेष तौर पर फोकस कर रहे हैं। भाजपा के नेताओं द्वारा राहुल गांधी का बाबा कह कर उठाया जा रहा उपहास पर भी वोटर ताली नहीं बजा रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यह महसूस कर रहा है कि इन तीनों राज्यों में भाजपा को अपनी सत्ता बचाने के लिए चुनावी रणनीति में व्यापक बदलाव करना होंगे। 

मोहन भागवत के राम मंत्र को ब्रह्मास्त्र के तौर पर उपयोग करेगी भाजपा 

हिन्दू ग्रंथों और शास्त्रों में ब्रह्मास्त्र का उल्लेख कई स्थानों पर देखने को मिलता है। अर्जुन के पास भी ब्रह्मास्त्र था। उन्होंने इसका उपयोग महाभारत में किया था। भारतीय जनता पार्टी देश की चुनावी राजनीति में राम का उपयोग ब्रह्मास्त्र के तौर पर करती है। राम के नाम का उपयोग वोटों का बंटवारा हिन्दू-मुस्लिम के तौर पर किए जाने के लिए किया जाता है। राम का यह मुद्दा केवल हिन्दीभाषी राज्यों में असर करता दिखाई देता है। दक्षिण भारत में राम का असर राजनीति पर नहीं पड़ता है। उत्तरप्रदेश से लेकर हरियाणा तक के चुनाव में भाजपा के नेताओं ने अपने-अपने तरीके से राम नाम का जप किया था। पाकिस्तान और घुसपैठिया जैसे मुद्दे, वोटों के धुर्वीकरण के लिए उभरे गए।

मध्यप्रदेश,राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव के लिए वोट डाले जाने की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है वैसे-वैसे मुद्दे भी बदलते हुए दिखाई दे रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने दशहरे के मौके पर अपने वार्षिक संबोधन में राम का जिक्र कर भावी चुनावी रणनीति के संकेत दिए हैं। भागवत ने कहा कि अब राम मंदिर निर्माण के लिए केन्द्र सरकार को कानून बनाना चाहिए। अयोध्या की विवादास्पद बाबरी मस्जिद जिस स्थान पर है उसी स्थान पर भगवान श्री राम का जन्म हुआ था, यह दावा विश्व हिन्दू परिषद द्वारा कई शोध के आधार पर लगातार किया जाता रहा है। जमीन के स्वामित्व को लेकर मामला अभी ऊपरी अदालत में चल रहा है। इस पर सुनवाई भी जल्द शुरू होने वाली है। संघ चाहता है कि केन्द्र सरकार कानून बनाकर जमीन के स्वामित्व का मसला हल कर दे। संघ को यह उम्मीद है कि कानून बनने के बाद हिन्दू समुदाय स्वत: इसके पक्ष में खड़ा हो जाएगा। कांग्रेस अथवा अन्य दलों का विरोध भाजपा को लाभ देने वाला होगा।

माना यह जा रहा है कि संघ प्रमुख ने यह बयान देने से पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से विमर्श किया होगा। मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने जिस तरह से अदालत के आदेश को दरकिनार कर एट्रोसिटी एक्ट में बदलाव किया है,उससे उच्च वर्ग में भाजपा की स्थिति कमजोर हुई है। भाजपा उच्च वर्ग को वापस अपनी और लाने के लिए मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने का कार्ड खेल रही है। इससे पहले मंदिर निर्माण के मामले में भाजपा अदालत के आदेश का पालन करने की बात करती रही है। राहुल के मंदिर-मंदिर जाने से कमजोर पड़ रहा है.

गुजरात चुनाव के बाद से कांग्रेस की रणनीति में बदलाव ने भी भाजपा और संघ को राम मंदिर को लेकर बैकफुट पर लाकर खड़ा कर दिया है। राहुल गांधी पिछले एक साल से लगातार कांग्रेस की छवि में बदलाव लाने के लिए देश के सभी प्रमुख हिन्दू धर्म स्थानों पर जाकर पूजा-अर्चना कर रहे हैं। पिछले दो दशक में कांग्रेस की छवि अल्पसंख्यकों का पक्ष लेने वाली पार्टी के तौर गहरी हो गई है। भाजपा, कांग्रेस को बहुसंख्यक विरोधी पार्टी के रूप में प्रचारित करती रही है। राहुल गांधी के मंदिर-मंदिर जाने से भाजपा को कांग्रेस के खिलाफ अपनी मुहिम चलाने में भी मुश्किल आ रही है।

गुजरात चुनाव में राहुल की रणनीति का असर देखने को मिला। भाजपा बमुश्किल अपनी सरकार बचा पाई थी। मध्यप्रदेश में भी राहुल गांधी की कोशिश है कि वोटों का धुर्वीकरण धर्म के आधार पर न हो। राहुल गांधी,भाजपा से नाराज उच्च वर्ग को अपने साथ लाने के लिए अल्पसंख्यकों के समर्थन की बात से लगातार बच रहे हैं। वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर राफेल को लेकर लगातार हमले कर रहे हैं। मध्यप्रदेश में पचास से अधिक ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां वोटों का धुर्वीकरण होने पर कांग्रेस को बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है। राम का नाम न होने के कारण भाजपा को ऐसी सीटें बचाना मुश्किल दिखाई दे रहा है।

संघ के जरिए असंतुष्टों को साधना चाहते हैं शिवराज

मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव से अब तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपने आपको दूर रखा था। हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भोपाल स्थित संघ कार्यालय समिधा में जाकर वहां पदाधिकारियों से मुलाकात की थी। शाह को मध्यप्रदेश के बारे में जो फीडबैक मिला हैं, उसमें जमीनी हालात सरकार बनने लायक नहीं दिखी कार्यकर्त्ता नाराज हैं। उच्च वर्ग सपाक्स की ओर जाता दिखाई दे रहा है। कुछ स्थानों पर तो शाह को भी एट्रोसिटी एक्ट के खिलाफ प्रदर्शन देखना पड़ा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के चेहरे को लेकर भी जनता में नाराजगी देखने को मिली है। शाह के आग्रह पर संघ राज्य में भाजपा की मदद के लिए तैयार हो गया है। संघ ने जो फीडबैक भाजपा को दिया है, उसमें अस्सी मौजूदा विधायकों को बदलने के लिए कहा गया है। पार्टी उम्मीदवारों के चयन में भी संघ की राय ले रही है। संघ के पदाधिकारी लगातार भाजपा नेताओं के साथ बैठक कर रहे हैं। संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान के बाद संघ के कार्यकर्त्ताओं को राम मंदिर पर काननू की चर्चा के लिए लोगों के बीच भेजा जा रहा है।