बोलें कुछ भी पर नेहरू और गांधी के सिद्धांतों पर चल रहे है प्रधानमंत्री मोदी..!

“वैसे तो प्रधानमंत्री मोदी भाजपा और आरएसएस से ताल्लुक रखते है । सरदार वल्लभ भाई पटेल, स्वामी विवेकानंद और गुरु गोवलकर को अपना आदर्श बताते है । लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक नरेंद्र मोदी ने जो कदम उठाए हैं, उनमें इंदिरा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की नीतियों और कार्यक्रमों की ही झलक ज्यादा दिखती है”

Newbuzzindia: यह प्रसंग मार्च 2014 का है. तब तक नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री से कुछ ज्यादा हो गए थे. भाजपा उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुकी थी. वे भी अपने और पार्टी के पक्ष में देशभर में हवा बनाने के लिए जुटे थे. उसी दौरान उन्होंने किसी कार्यक्रम में दावा किया कि तीन महापुरुष उनके जीवन में ‘आदर्श’ हैं, सरदार वल्लभभाई पटेल, स्वामी विवेकानंद और गुरु गोलवलकर (आरएसएस के दूसरे प्रमुख माधव सदाशिव गोलवलकर). आदर्श के लिहाज से मोदी के दावे पर कोई सवाल नहीं. लेकिन प्रधानमंत्री के तौर पर उनके दो साल चार महीने के कार्यकाल से एक नहीं कई ऐसी मिसालें मिलती हैं, जो बताती हैं कि उनकी नीति-राजनीति, नियम-कार्यक्रम इंदिरा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के नक्शे कदम पर हैं. इसी को परत-दर-परत उल्टे क्रम में खंगालते हैं. यानी पहले इंदिरा जैसे मोदी और फिर नेहरू से मोदी.

इंदिरा के वक्त ‘मैं’ और मोदी के समय भी

देश की राजनीति में करीब साढ़े तीन दशक बाद पहली बार है, जब केंद्र में सत्तासीन किसी पार्टी की सरकार और उसके संगठन पर सिर्फ ‘मैं’ यानी एक व्यक्ति का प्रभुत्व है. मगर इस ‘मैं’ के प्रभुत्व की शुरुआत कड़े संघर्ष से होती है.

याद कीजिए सितंबर 2013. तब भाजपा ने गोवा में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान नरेंद्र मोदी को अपने चुनाव अभियान समिति की मुखिया घोषित किया था. लेकिन पार्टी के फैसले से नाराज भाजपा के ‘लौह पुरुष’ लालकृष्ण आडवाणी उस बैठक में शामिल तक नहीं हुए. पार्टी के अन्य नेताओं ने भी विरोध बुलंद किया. बाहर नीतीश कुमार जैसे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के सहयोगियों ने अपना रास्ता अलग कर लिया. कांग्रेस जैसी पार्टियों को तो इसका फायदा उठाने के प्रयास करना ही था.

मंत्रियों पर इंदिरा गांधी का ऐसा असर या कहिए कि खौफ था कि वे उन्हें ‘सर’ कहने लगे थे. नीति-निर्णय, सत्ता-शक्ति का केंद्र उनके समय में सिर्फ वे ही थीं

दिल्ली की राजनीति में नए-नए आए मोदी ने यहीं से हवा का रुख अपनी तरफ मोड़ना शुरू किया. वे देश के हर कोने में घूमे. त्रिपुरा जैसे राज्य तक हो आए, जहां भाजपा के लिए संभावना न के बराबर थी. लेकिन उनका लक्ष्य अपनी छवि को देशव्यापी बनाना और चुनावी माहौल को अपने ही गिर्द केन्द्रित करना था. इस दौरान उन्होंने खुद को पीड़ित सा पेश किया और विपक्ष को देश में मौजूद हर बुराई की जड़ जैसा. उन्होंने नारा दिया, ‘वे (विरोधी) कहते हैं- मोदी हटाओ, मोदी हटाओ. लेकिन मैं कहता हूं- भ्रष्टाचार हटाओ, भ्रष्टाचार हटाओ.’ केंद्र की कांग्रेस सरकार का भ्रष्टाचार उस वक्त जनता की दुखती रग थी. मोदी ने उसे छुआ. ‘कांग्रेस हटाओ, मोदी लाओ, देश बचाओ’ उस समय लगभग हर रैली में संदेश यही था, ‘मुझे वोट दीजिए. मुझे आशीर्वाद दीजिए.’

अब जरा 1969-70 का फ्लैशबैक. उस वक्त प्रधानमंत्री कार्यालय में इंदिरा गांधी का पहला कार्यकाल था. कांग्रेस पर एस निजलिंगप्पा जैसे असरदार नेता हावी थे, जिनसे इंदिरा के तमाम मसलों पर मतभेद थे. हालात ऐसे बन आए कि निजलिंगप्पा ने (जो तब कांग्रेस अध्यक्ष थे) इंदिरा को पार्टी से ही निकाल दिया. कांग्रेस का ‘इंदिरा’ और इंदिरा का ‘इंडिया’ हो जाना यहीं से शुरू हुआ. इस घटनाक्रम के बाद हुए 1971 के चुनाव में इंदिरा अपनी छवि को देशव्यापी बनाने निकल पड़ीं. कोई कोना नहीं छोड़ा, जहां वे न गई हों. खुद को विरोधियों का निशाना बताया. कहा, ‘विरोधी कहते हैं, इंदिरा हटाओ. मैं कहती हूं, गरीबी हटाओ’ उस दौर में जनता की नब्ज गरीबी थी. इंदिरा ने उसे छुआ और नारा दिया, ‘गरीबी हटाओ, इंदिरा लाओ, देश बचाओ.’ कांग्रेस अब ‘आई’ यानी इंदिरा हो चुकी थी, इसलिए उन्होंने जनता से एक ही अपील की, ‘मुझे वोट दीजिए.’

अतीत और वर्तमान की ये दो धाराएं और कैसे, कहां एक होती हैं, इस पर नजर डालते हैं. नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही आदेश निकाला कि केंद्र का कोई मंत्री निजी स्टाफ में पीएमओ (प्रधानमंत्री कार्यालय) की इजाजत के बिना नियुक्ति नहीं कर सकेगा. फिर पता चला कि उनका दफ्तर हर मंत्री के कार्य और सार्वजनिक व्यवहार पर नजदीकी नजर रखता है. देखते ही देखते तमाम अहम मसलों पर अंतिम निर्णय की धुरी और सत्ता-शक्ति का केंद्र सिर्फ और सिर्फ पीएमओ बन गया. अमित शाह को पार्टी अध्यक्ष बनवाया गया, तो स्थापित हुआ कि सिर्फ यही एक शख्स है, जिस पर मोदी अपने सोचे हुए को सच करने का भरोसा रखते हैं. विरोधियों को (भले वे पार्टी के बुजुर्गवार क्यों न हों) बिना दर्शन के मार्ग दिखा दिया गया तो जाहिर हुआ कि उन्हें विवादी सुर अच्छे नहीं लगते. लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त 2014 से अब तक हर बार बिना बुलेटप्रूफ शीशे की दीवार के भाषण देकर मोदी दबंग नेता की छवि बनाते दिखे. फिर इसी प्राचीर से जब बलूचिस्तान का जिक्र किया तो मुश्किल पड़ोसी के साथ उनकी आगे की नीति का संकेत मिला.

नेहरू देश के तेज औद्योगिक विकास के पक्षधर थे और नरेंद्र मोदी ने देश को मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाने का मंसूबा बांधा है, ‘मेक इन इंडिया’ के जरिए

यही सब तो तीन-साढ़े तीन दशक पहले इंदिरा ने किया था. मंत्रियों पर उनका ऐसा असर या कहिए कि खौफ था कि वे उन्हें ‘सर’ कहने लगे थे. नीति-निर्णय, सत्ता-शक्ति का केंद्र अपने समय में सिर्फ वे ही थीं. तीन कार्यकाल में उनका भरोसेमंद एक वक्त में सिर्फ एक ही शख्स रहा. पीएन हक्सर 1969 से 74 तक, संजय गांधी 1974 से 80 तक और राजीव गांधी 1981 के बाद से आखिरी वक्त तक. विरोध करने वालों का तो कोई नामलेवा भी नहीं बचा. बल्कि मूल कांग्रेस ही उस विरोध के साथ खत्म हो गई. पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की मुक्ति वाहिनी को खुला समर्थन देकर देश की विदेश नीति में आक्रामक परिवर्तन पहली बार उन्होंने ही किया. और बांग्लादेश की आजादी के बाद से लगातार जान का खतरा होने के बावजूद लाल किले से देश को संबोधित करने के लिए उन्होंने कभी बुलेटप्रूफ कांच की दीवार खड़ी करने की इजाजत नहीं दी. यकीनन यही कारण रहे, जिनके चलते एकबारगी अटलबिहारी वाजपेयी जैसे विपक्ष के नेता ने उन्हें ‘दुर्गा’ बता दिया. तो, तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांता बरुआ ने कह दिया, ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा.’ फिलहाल, मोदी की राह और रफ्तार भी कुछ ऐसी ही दिखती है.

नेहरू ने वैश्विक नेता बनने की राह पकड़ी और मोदी ने भी

अब 26 मई 2014 की तारीख को ध्यान में लाइए. उस रोज नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ले रहे थे. और उनके सामने विशेष तौर पर बुलाए गए मेहमानों की लाइन में सार्क (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन) सदस्य देशों के करीब-करीब सभी राष्ट्र तथा शासन प्रमुख बैठे थे. तब मोदी के शपथग्रहण समारोह को ‘मिनी सार्क शिखर सम्मेलन’ तक कह दिया गया था. पद संभालने के अगले महीने यानी जून 2014 में मोदी ने पहली विदेश यात्रा के लिए सार्क के सदस्य देश भूटान को चुना. फिर उसी महीने उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष संगठन (इसरो) से सार्क देशों के लिए संचार और मौसम उपग्रह तैयार करने को कहा. हालांकि पाकिस्तान इस कार्यक्रम से खुद बाहर हो गया लेकिन बाकी पड़ोसियों को भारत का यह ‘उपहार’ दिसंबर 2016 में मिल सकता है.

सार्क को मोदी की ओर से दी जा रही यह अहमियत उनमें नेहरू की झलक दिखाती है. याद रखना और गौर करना, दोनों लाजमी है कि नेहरू की पहल पर ही अप्रैल 1947 में पहली बार दिल्ली के एशियाई संबंध सम्मेलन (एशियन रिलेशन कॉन्फ्रेंस) में सार्क जैसे संगठन के गठन पर विचार हुआ. और फिर 70 का दशक खत्म होने तक भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, भूटान, मालदीव, नेपाल और श्रीलंका आपसी व्यापार के लिए ऐसा संगठन (सार्क) बनाने पर सहमत हो गए थे.

नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद खुद को ‘प्रधान सेवक’ का विशेषण दिया था. लेकिन कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की मानें तो यह संबोधन अपने लिए पहली बार 1947 में जवाहरलाल नेहरू ने इस्तेमाल किया था

नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद खुद को ‘प्रधान सेवक’ का विशेषण दिया था. लेकिन कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की मानें तो यह संबोधन अपने लिए पहली बार 1947 में जवाहरलाल नेहरू ने इस्तेमाल किया था. उन्होंने कहा था, ‘मैं प्रधानमंत्री नहीं, प्रधानसेवक हूं.’

नेहरू देश के तेज औद्योगिक विकास के पक्षधर थे. वे गांवों को भी विकास की मुख्यधारा से जोड़ना चाहते थे. इसी सोच के चलते उनके कार्यकाल में सोवियत संघ के सहयोग से बोकारो और जर्मनी की मदद से राउरकेला में स्टील संयंत्र शुरू हुए. इन्हीं कोशिशों से 1950 के बाद देश की विकास दर 1962-65 तक करीब सात फीसदी रही. योजनाबद्ध तरीके से देश आगे भी आर्थिक तरक्की करता रहे, इसलिए नेहरू ने योजना आयोग का गठन किया. इसी तरह, मोदी ने देश को मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाने का मंसूबा बांधा है, ‘मेक इन इंडिया’ के जरिए. उनकी ‘ग्रामोदय से भारत उदय’ योजना और बदले आर्थिक हालात में योजना आयोग की जगह नीति आयोग के गठन का फैसला भी नेहरू से प्रेरित लगता है.

जवाहरलाल नेहरू ने देश में वैकल्पिक (परमाणु) ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया. ब्रिटेन की मदद से देश में अगस्त 1956 में पहला परमाणु रिएक्टर ‘अप्सरा’ लगा. इसके बाद कनाडा तथा रूस के सहयोग से रिएक्टर लगाए गए और सिलसिला चल पड़ा. नरेंद्र मोदी भी वैकल्पिक ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं. लद्दाख, गुजरात, पंजाब आदि राज्यों में उनकी सरकार ने इस लिहाज से ध्यान केन्द्रित किया है. विश्वस्तर पर भी उन्होंने पेरिस में नवंबर 2015 को संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में अपनी इस परिकल्पना को आगे बढ़ाने का प्रयास किया. इसके बाद 121 देशों का समूह (अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन) बना. इसे इंटरनेशनल एजेंसी फॉर सोलर पॉलिसी एंड एप्लीकेशन (आइअस्पा) भी कहते हैं. इसका मुख्यालय गुड़गांव में जनवरी 2016 में शुरू हुआ. यह समूह 2022 तक 175 गीगावॉट सौर ऊर्जा पैदा करने की दिशा में काम करेगा.

नेहरू को भारत-अफ्रीकी संबंधों का मुख्य शिल्पकार समझा जाता है. उनकी यह परिकल्पना आज भारत-अफ्रीका फोरम के रूप में सामने है. इस फोरम की पिछले साल दिल्ली में हुई बैठक में 54 में से 41 देश शामिल हुए थे. इसी तरह, मोदी की पहल के बाद नवंबर 2014 में फोरम फॉर इंडिया-पैसिफिक आइलैंड्स को-ऑपरेशन गठित हुआ. इसमें भारत और प्रशांत महाद्वीप के 14 देश हैं. इसका पहला सम्मेलन 2014 में फिजी में हुआ और दूसरा अगस्त 2015 में जयपुर में.

लेमोआ समझौते को नरेंद्र मोदी की सरकार और पार्टी देश की ‘सामरिक विजय’ और ‘ऐतिहासिक’ बता रही है. जबकि दिलचस्प तथ्य है कि अमेरिका के साथ ऐसा ही समझौता 1942 से 1966 तक रह चुका है.

मोदी संभवत: विश्व नेता बनने की आकांक्षा के तहत ही तमाम अंतर्राष्ट्रीय गुटों में भारत को पहली लाइन में लाने की कोशिश में हैं. जैसे-मिसाइल तकनीक नियंत्रण समूह (एमटीसीआर) में भारत को सदस्यता दिलाना, परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में सदस्यता के लिए आक्रामक प्रयास, ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का समूह) बैंक की स्थापना (या न्यू डेवलपमेंट बैंक, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह नाम मोदी ने प्रस्तावित किया) में सक्रिय भागीदारी आदि. और बीती छह सितंबर को जी-20 की चीन के हांगझोऊ शहर में हुई बैठक में उनकी कोशिशें अगले चरण में दिखीं. मोदी को इस सम्मेलन के फोटो सेशन में पहली पंक्ति में जगह मिली. उनके साथ 11 राष्ट्रपति और सम्मेलन के अगले मेजबान जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल थीं. जबकि अमूमन ऐसे सम्मेलनों में भारतीय प्रधानमंत्री दूसरी पंक्ति में होते रहे हैं. इसी तरह की कोशिशें नेहरू भी अपने समय में किया करते थे. बेलग्राद में 1961 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन (अमेरिका और सोवियत संघ से अलग रहने वाले देशों का समूह) का गठन, इसकी एक बानगी है.

नेहरू ने 1960 के दशक में भारत-चीन के संबंधों को लेकर ‘पंचशील का सिद्धांत’ दिया था. इसी तरह अमेरिका-भारत के संबंधों के लिए नरेंद्र मोदी ने जो परिकल्पना पेश की, उसे जून 2016 में अमेरिकी मीडिया ‘मोदी डॉक्टरीन’ का तमगा दे चुका है. भारत-चीन-अमेरिका और नेहरू-मोदी प्रसंग में ताजा संदर्भ है, लेमोआ (लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट) का. भारत ने बीती 29 अगस्त को अमेरिका के साथ इस समझौते पर दस्तखत किए हैं. इसके तहत दोनों देश एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं, रसद और एक निश्चित दायरे में रहते हुए सैन्य ठिकानों का भी इस्तेमाल कर सकेंगे.

चीन से निपटने की दोनों देशों की रणनीति के तहत हुए इस समझौते को मोदी की सरकार और पार्टी देश की ‘सामरिक विजय’ और ‘ऐतिहासिक’ बता रही है. जबकि दिलचस्प तथ्य है कि भारत ऐसे ही समझौते के तहत अमेरिकी सेना के लिए 1942 से 1946 तक रसद आपूर्ति का मुख्य अड्‌डा रह चुका है. देश की आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू सरकार ने भी 1966 तक यह समझौता जारी रखा. विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर यह जानकारी मौजूद है. इसमें स्पष्ट है कि 1952 तक तो अमेरिकी सेना की वायु परिवहन सेवा (मैट्स) से भारत में उसके विमानों को उतरने और रुकने की सुविधा देने के एवज में शुल्क तक नहीं लिया जाता था. इसके बाद दस साल तक शुल्क लिया गया. मगर 1962 में जब चीन ने भारत पर हमला किया तो अमेरिका से सैन्य मदद की गरज से भारत ने उसे फिर शुल्क में छूट दे दी. साथ ही, अमेरिकी सैन्य विमानों के पायलट और चालक दल के सदस्यों के लिए भारत में वीसा की अनिवार्यता भी खत्म कर दी.

इस तरह भले कोई कहे या माने कुछ भी. लेकिन नरेंद्र मोदी में जो ‘प्रधानमंत्री’ है, उसमें बड़ी हिस्सेदारी (शायद आधी से भी ज्यादा) इंदिरा और नेहरू के खाते में जाती दिखती है. फिर उनके प्रधानमंत्रित्व (जिसमें व्यक्तित्व भी है) के बाकी हिस्से में खुद मोदी समेत चाहे जितनी छवियां देख लें. चाहे वे विवेकानंद हों, सरदार पटेल, गोलवलकर या अटलबिहारी.

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