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मिजोरम में सरकार बनाना भाजपा के लिए इतना आसान भी नही

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बुधवार को मिजोरम में पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद करने के लिए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पहुंचे. इस मौके पर शाह ने पार्टी के प्रदेश मुख्यालय भवन का उद्घाटन किया और पार्टी के बूथ स्तरीय कार्यकर्ताओं के एक सम्मेलन को संबोधित भी किया. शाह ने कहा की राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शुरू की गयी विकास योजनाओं को लागु नही किया. जनता के अंदर कांग्रेस को लेकर असंतोष है और भाजपा इस बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और जीत दर्ज करेगी.

अमित शाह के दौरे के ठीक पहले राज्य के पूर्व मंत्री बुद्धा धन चकमा कांग्रेस का हाँथ छोड़कर भाजपा के साथ आ गये है. पिछले 10 साल से राज्य में सरकार चला रही कांग्रेस के अंदर बगावत का सिलसिला थम नही रहा है. चकमा के पहले कांग्रेस के दो अन्य विधायक पार्टी से इस्तीफ़ा दे चुके है. इसमें पूर्व गृहमंत्री आर. लालजीर्लियना और लालरिनलियाना सैलो शामिल है. यह दोनों नेता मिजोरम एमएनएफ (मिज़ो नेशनल फ्रंट) में शामिल हो गये थे. विपक्षी पार्टीयों का दावा है की कांग्रेस के कुछ और विधायक चुनाव के पहले पार्टी का साथ छोड़ सकते है. पिछले 10 साल से मिजोरम की सत्ता में काबिज कांग्रेस को इस विधानसभा चुनाव में सत्ता विरोधी लहर, भाई- भतीजावाद और भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझना पड़ रहा है. इसी कारण कांग्रेस ने इस विधानसभा चुनाव में अपने 7 मौजूदा विधायकों की टिकट काटी है. कांग्रेस द्वारा घोषित किये गये 36 प्रत्याशियों में से 12 युवा है, जिनकी उम्र 40 वर्ष के कम है. मुख्यमंत्री लाल थान्हावला 2013 की तरह इस बार भी दो विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरेंगे.

मिज़ो नेशनल फ्रंट राज्य में मुख्य विपक्षी दल है. 1959 में राज्य में अकाल पड़ा था. जिसमे केंद्र सरकार के असहयोग के खिलाफ राज्य की जनता ने आन्दोलन किया. इस आन्दोलन का का नेतृत्व कर मिज़ो नेशनल फ्रंट ने सक्रिय राजनीती में एंट्री मारी. एमएनएफ ने चुनाव लड़कर राज्य में अब तक तीन बार सरकार बनाई है. पहले 1986-88 और फिर 1998 से 2008. 2008 में राज्य के अंदर सरकार कस खिलाफ जबरदस्त एंटी इनकमबेंसी का माहौल बना और पार्टी 40 में से सिर्फ 3 ही सीट जीत पाई. राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री लाल थान्हावला भी मिज़ो नेशनल फ्रंट आंदोलन से ही निकले है.

राज्य में कांग्रेस पिछले 10 साल से राज कर रही है. लाल थान्हावला 10 साल से प्रदेश के मुख्यमंत्री है और 1973 से मिजोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष है. इतने लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले थान्हावला शायद देश के पहले व्यक्ति है. राजनीती में आने के पहले वह मिजोरम के एक कोऑपरेटिव बैंक में असिस्टेंट के तौर पर भी काम कर रहे थे. बाद में वह मिजो नेशनल फ्रंट के आंदोलन से जुड़कर इसके विदेश सचिव बन गये. जिसको लेकर लथनहवला जेल भी गये. 1967 में जेल से छूटने के बाद वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए. उनको पार्टी की ओर से आईजोल जिले का मुख्य संगठनकर्ता बना गिया गया.


1984-86 तक दो साल के लिए थान्हावला पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने. जिसके बाद वह 1989 से 1998 फिर 2008 से लेकर अब तक राज्य के मुख्यमंत्री है. लथनहवला को मिजोरम में करिश्माई नेता माना जाता है. वह अब तक 9 विधानसभा चुनाव जीत चुके है. मिजोरम में कांग्रेस एक बार फिर लथनहवला के भरोसे ही चुनाव लड़ रही है.

अमित शाह मिजोरम में लथनहवला के विजय रथ को रोकने के लिए पूरी ताकत लगा रहे है. पार्टी पहली बार मिजोरम में सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. इससे पहले पार्टी 1993 में 8, 98 में 12, 2003 में 8, 2008 में 9 और 2013 में 17 सीटों पर चुनाव लड़ चुकी है. पांच विधानसभा चुनाव लड़ने के बाद भी भाजपा मिजोरम में खाता खोलने तक में कामयाब नही हो पाई. 2013 में 17 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा की सभी 17 सीटों पर जमानत जप्त हो गयी थी. इस चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 1 से भी कम, 0.37% था, जो की नोटा से भी कम था. ऐसे में अगर अमित शाह कहते है की भाजपा इस विधानसभा चुनाव में सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और सभी 40 सीटें जीतेगी तो इस बात पर भरोसा करना थोडा मुश्किल होता है.

वैसे तो भाजपा मिजोरम में कांग्रेस को टक्कर देने की स्तिथि में नही है लेकिन कांग्रेस और एमएनएफ के बगिओं के सहारे राज्य में कुछ विधानसभा सीटें जरूर जीतना चाहती है. शाह किसी भी तरह से राज्य में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करना चाहते है. चुनाव में अगर कांग्रेस को बहुमत से थोड़ी भी कम सीटें मिलती है तो शाह एमएनएफ और बाकी विपक्षी पार्टिओं को साथ लेकर राज्य की राजनीती में बेकडोर एंट्री मारना चाहते है.ReplyForward

मुख्यमंत्री पद की लड़ाई कहीं मध्यप्रदेश में सत्ता से चूक न जाए कांग्रेस

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मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री के पद को लेकर चल रही खींचतान कांग्रेस कहीं सत्ता में आने से चूक न जाए। कांग्रेस में उठ रहीं इस तरह की आशंकाओं को भारतीय जनता पार्टी के नेता लगातार हवा दे रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी अपने मध्यप्रदेश के दौरे में लगातार चेहरे को लेकर हवा दे रहे हैं। कांग्रेस के लिए यह चुनाव करो या मरो का चुनाव है। इस चुनाव कांग्रेस यदि सत्ता बनाने से चूक गई तो स्थितियां उत्तरप्रदेश और बिहार जैसी हो जाएंगीं।

पंद्रह साल की भाजपा सरकार से नाराज है वोटर

राज्य में कांग्रेस अब तक चुनाव कोई ऐसा मुद्दा तैयार नहीं कर पाई है, जिसके नारे के सहारे उसका सत्ता से वनवास समाप्त हो जाए। लगातार पंद्रह साल से विपक्ष में बैठी कांग्रेस जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ कमजोर कर चुकी है। पिछले दो विधानसभा चुनाव में नेतृत्व को लेकर जो प्रयोग कांग्रेस पार्टी द्वारा किए गए थे, वे असफल साबित हुए हैं। वर्ष 2008 में पार्टी ने सुरेश पचौरी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में कांग्रेस की सत्ता में वापसी की सबसे ज्यादा संभावनाएं थीं। पांच साल की अवधि में शिवराज सिंह चौहान भारतीय जनता पार्टी के तीसरे मुख्यमंत्री थे। पार्टी में चौहान का नेतृत्व स्वीकार करने वाले लोगों की भी कमी थी।

कांग्रेस की रणनीतिक कमजोरी ने उसे सत्ता से वंचित कर दिया था। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कांतिलाल भूरिया के जरिए आदिवासी कार्ड खेल था। पार्टी को इस कार्ड से आदिवासी क्षेत्रों में ही सफलता नहीं मिली। पिछले विधानसभा चुनाव में भी पार्टी के बड़े नेताओं के बीच निपटाओ का भाव उसी तरह देखने को मिला था, जिस तरह वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में मिला था। लोकसभा चुनाव में केन्द्र की सरकार जाने के बाद अरूण यादव को प्रदेश कांग्रेस का नेतृत्व सौंपा गया था। तीन साल से भी अधिक समय तक अध्यक्ष रहने के बाद भी वे अपना और पार्टी का जनाधार मजबूत नहीं कर पाए थे। पार्टी ने उन्हें हटाए जाने के फैसले में भी काफी देरी कर दी थी। उनके स्थान पर अध्यक्ष बनाए गए कमलनाथ राज्य की राजनीति के तौर-तरीके से भी परिचित नहीं है।

उनके व्यवहार को लेकर कांग्रेस के कार्यकर्त्ताओं की यह शिकायत हमेशा रहते है कि वे इस तरह पेश आते हैं जैसे कि केन्द्रीय मंत्री अथवा मुख्यमंत्री हैं। कमलनाथ ने राज्य में अपनी भूमिका को किंग मेकर की तरह पेश किया था। पहली बार वे किंग बनने के लिए उतावले दिखाई दे रहे हैं। सत्तर की उम्र पार कर चुके कमलनाथ का राज्य की राजनीति में नोसिखियापन कई मौकों पर देखने को मिला। मीडिया विभाग में परिवर्तन से लेकर उनके चुनावी मुद्दे तक में इस नौसिखिएपन को समझा जा सकता है। कमलनाथ छिंदवाड़ा के विकास मॉडल से राज्य की पंद्रह साल पुरानी भाजपा सरकार को उखाडना चाहते हैं। छिंदवाड़ा के विकास मॉडल को उभारने के पीछे उनकी सोच पार्टी में मुख्यमंत्री पद के दावेदार दूसरे नेताओं को पीछे करने की है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की सार्वजनिक मंचों से दी गई नसीहतों के बाद भी कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया से तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं। राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश में चुनाव जीतने की जो रणनीति बनाई है उसमें सिर्फ दो ही चेहरों को केन्द्र में रखा गया है। कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया। राज्य में भारतीय जनता पार्टी की पंद्रह साल की सरकार को लेकर लोगों में नाराजगी साफ दिखाई दे रही है। कांग्रेस इस नाराजगी को अपने पक्ष में मोड़ने का कोई रास्ता हीं ढूंढ पाई है।

सपाक्स और जयस भी बन सकते हैं राह में रोड़ा

कांग्रेस की राह में बड़ी रूकावट सपाक्स और जयस उभर कर सामने आ रही है। दोनों ही वर्ग विशेष की राजनीति कर रहे हैं। सपाक्स संगठन विशेष रूप से ठाकुर, ब्राह्मण एवं वैश्य वर्ग के वोटों की राजनीति कर रहा है। जबकि जयस संगठन आदिवासी वर्ग पर आधारित है। वैसे तो आदिवासी कांग्रेस का प्रतिबद्ध वोटर माना जाता है लेकिन , पिछले दो चुनावों से इसकी कांग्रेस से दूरी साफ दिखाई दे रही है। इस दूरी के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग कारण हैं। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जबलपुर संभाग की कुछ विधानसभा सीटों तक प्रभाव रखती है। इससे मिलने वाले कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के लिए पर्याप्त माने जाते हैं।

जयस चुनाव मैदान में कहां और कितने उम्मीदवार उतारता है यह अभी कहना मुश्किल है। सपाक्स जरूर यह दावा कर रहा है कि वह राज्य की सभी 230 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगा। स्वभाविक है कि अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित सीटें भी इसमें शामिल हैं। इन आरक्षित सीटों पर संबंधित वर्ग के ही लोगों को उम्मीदवार बनाना होगा। ऐसा होने पर सपाक्स के मूल उद्देश्य पर ही स्वभाविक तौर पर सवाल खड़े हांगे। सपाक्स का जन्म आरक्षण विरोध से हुआ है। सामान्य वर्ग के वोटर के बारे में यह माना जाता है कि वह भाजपा का प्रतिबद्ध वोटर है।

सपाक्स के मैदान में होने से नुकसान भाजपा को होगा ऐसा माना जाना स्वभाविक है। यह वोटर भी चुनाव के वक्त विभाजित होगा। इसका फायदा कितना कांग्रेस को मिलेगा यह कहना मुश्किल है। कांग्रेस वर्तमान राजनीतिक हालात अपने अनुकूल मान रही है। यही वजह है कि पार्टी में अभी से नेता एक-दूसरे के समर्थकों के टिकट कटवाने में लगे हुए हैं। कहा यह जा रहा है कि कांग्रेस के सारे नेता मिलकर सिंधिया की राह को रोकना चाहते हैं। राज्य में एक मात्र सिंधिया का चेहरा ही ऐसा है,जिस पर कोई दाग नहीं है। वोटर के बीच भी लोकप्रिय है।

आखिर भाजपा को क्यों बदलनी पड़ी सिंधिया को घेरने की रणनीति

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ग्वालियर एवं चंबल की संभाग  की 34 विधानसभा सीट और तीन लोकसभा सीटों को जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को घेरने की रणनीति में बदलाव करना पड़ा है। भाजपा अब तक तक सिंधिया को अंग्रेजों का मित्र बताकर ज्योतिरादित्य सिंधिया पर हमले किया करती थी, अब पार्टी सिंधिया परिवार की तारीफ कर इस क्षेत्र में अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अपने ग्वालियर संभाग के दौरे में कार्यकर्त्ताओं से वोट सिंधिया परिवार के नाम पर ही मांगे। 

ग्वालियर संभाग कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभाव वाला क्षेत्र है। प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता अनिल सौमित्र कहते हैं कि सिंधिया परिवार के अधिकांश सदस्य भाजपा में है। इसका फायदा भी भाजपा को इस संभाग में मिलता रहा है और आगे भी मिलता रहेगा। यहां उल्लेखनीय है ज्योतिरादित्य सिंधिया को घेरने के लिए भाजपा अक्सर महारानी लक्ष्मीबाई की शहादत का जिक्र करती है। सिंधिया परिवार को अंग्रेजों का दोस्त बताती है। भाजपा को इस मुद्दे पर क्षेत्र में कभी समर्थन नहीं मिला। इसकी बड़ी वजह सिंधिया राजवंश द्वारा अपने रियासत में कराए गए विकास कार्य हैं।

सिंधिया परिवार के किसी भी सदस्य पर अब तक न तो कोई भ्रष्टाचार के आरोप हैं और न ही राजनीति को गंदा करने के उदाहरण उनके साथ जुड़े हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया का चेहरा प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में सबसे चमकदार और प्रभावी चेहरा माना जाता है। भाजपा के पास ऐसा कोई शस्त्र नहीं है जिसके जरिए वे सिंधिया के असर को कम कर सकें। संभवत: यही वजह है कि भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है।

सिंधिया परिवार की तारीफ कर अमित शाह अपनी पार्टी  के नाराज कार्यकर्त्ताओं को भी शांत करना चाहते हैं। अमित शाह ने शिवपुरी में विजयाराजे सिंधिया के योगदान का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी जन्मशती वर्ष में क्षेत्र के कार्यकर्त्ताओं को पार्टी को एतिहासिक विजय दिला कर अपनी श्रदांजलि अर्पित करना चाहिए। सिंधिया परिवार के खिलाफ गड़े मुर्दे उखाड़ने का दांव भाजपा के सामने भी कई सवाल खड़े कर रहा था। पार्टी को सबसे ज्यादा असुविधा राजस्थान में हो रही थी।

राजस्थान में विजयाराजे सिंधिया की बेटी वसुंधरा राजे सिंधिया नाराज थीं। मध्यप्रदेश में सिंधिया परिवार पर लगाए जा रहे आरोपों के कारण राजस्थान में भाजपा को जवाब देना मुश्किल पड़ रहा है। भाजपा से भी लोग पूछ रहे हैं कि आजादी की लड़ाई में उनके किस नेता का योगदान रहा है? भाजपा चुनाव अभियान में देशभक्ति की बात तो करती है लेकिन, स्वतंत्रता संग्राम में अपने योगदान को लेकर चुप रहती है।  

वीडियो: मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार अंगद का पैर है, इसे कोई हिला नही सकता: अमित शाह

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अमित शाह, भाजपा, शिवपुरी,मध्यप्रदेशभारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने शिवपुरी में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कहा कि ‘मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार अंगद के पैर की तरह है, इसे कोई हिला नही सकता, इसे कोई हिला नही सकता।’

देखें अमित शाह के भाषण के कुछ अंश-

 

नीतीश कुमार का मोदी सरकार पर तंज, बोले हजारों करोड़ लूटकर उड़नछू हो जाते है लोग।

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर मोदी सरकार पर तंज कसा है। समाज सुधार वाहिनी सम्मेलन के कार्यक्रम में बोले हुए नीतीश कुमार ने कहा कि ‘कुछ लोग देश के हजारों करोड़ रुपये लूटकर विदेश भाग जाते है वहीं स्वयं सहायता समूह के लोग बैंक से लिये गए कर्ज का समय पर भुगतान करते है।

नीतीश कुमार अपने इस बयान में ललित मोदी, विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी का उदाहरण देकर मोदी सरकार पर तंज कस रहे थे।

दरअसल भाजपा और जेडीयू के बीच 2019 लोकसभा चुनाव के लिए सीटों के बटवारे को लेकर खींचतान की खबर मीडिया में आई थी। जिसके बाद नीतीश कुमार और अमित शाह के बीच बिहार में बैठक हुई और सीटों के बटवारे पर मोल-भाव किया गया। जिसके बाद खबर आई कि जेडीयू को भाजपा लोकसभा चुनाव में 12 सीटें देने पर राजी हो गयी है।

ऐसे में नीतीश कुमार के तंज के बाद सवाल उठता है कि क्या भाजपा और नीतीश कुमार के बीच सब कुछ ठीक है ? क्या सीटों के बटवारे को लेकर भाजपा और जेडीयू के बीच एक बार फिर टकराव की स्तिथि पैदा हो गयी है ?

बीजेपी महिला सम्मेलन के दौरान महिलाओं के कपड़े उतरवाकर की गई तलाशी, अमित शाह थे मौजूद।

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बेटी पढ़ाओ- बेटी बचाओ का नारा देने वाली वाली भाजपा खुद ही महिलाओं के सम्मान के साथ खेल रही है। हिंदी अखबार जनसत्ता की खबर के अनुसार भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की रैली के दौरान महिलाओं और युवतियों को भारी बदसलूकी का सामना करना पड़ा। आरोप है कि कार्यक्रम में शामिल होने आए युवती और महिलाओं को अंदर जाने से पहले बुरी तरह तलाशी देनी पड़ी।

रैली में काले झंडे न पहुंच सकें इसके लिए पुलिस ने वहां आई महिलाओं के न सिर्फ कुर्ते- पजामे, काली साड़ी, चुनरी और दुपट्टा तक उतरवा बल्कि उनके अंडरगारमेंट तक कि तलाशी ली गयी।

अमित शाह की मौजूदगी में हुई बदसलूकी

दरअसल बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह अपने एक दिवसीय छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान चरौदा में आयोजित महिला महा सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे थे। इसी कार्यक्रम में महिलाओं को पुलिस की बदसलूकी का सामना करना पड़ा।

दरअसल एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद के रास्ते पलटने के बाद बीजेपी को सवर्णों के भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कई सवर्ण संगठन भाजपा नेताओं को काले- झंडे दिखा चुके है। जिससे कारण भाजपा नेता अब भारी सुरक्षा के बीच कार्यक्रम कर रहे है।

महिलाओं और बेटियों के लिए बड़ी- बड़ी बातें करने वाली मोदी सरकार क्या इसी सम्मान की बात कर रही थी ?

अमित शाह की मौजूदगी में महिलाओं के कपड़े उतरवाकर की गई तलाशी।

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बेटी पढ़ाओ- बेटी बचाओ का नारा देने वाली वाली भाजपा खुद ही महिलाओं के सम्मान के साथ खेल रही है। हिंदी अखबार जनसत्ता की खबर के अनुसार भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की रैली के दौरान महिलाओं और युवतियों को भारी बदसलूकी का सामना करना पड़ा। आरोप है कि कार्यक्रम में शामिल होने आए युवती और महिलाओं को अंदर जाने से पहले बुरी तरह तलाशी देनी पड़ी।

रैली में काले झंडे न पहुंच सकें इसके लिए पुलिस ने वहां आई महिलाओं के न सिर्फ कुर्ते- पजामे, काली साड़ी, चुनरी और दुपट्टा तक उतरवा बल्कि उनके अंडरगारमेंट तक कि तलाशी ली गयी।

अमित शाह की मौजूदगी में हुई बदसलूकी

दरअसल बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह अपने एक दिवसीय दौरे के दौरान चरौदा में आयोजित महिला माह सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे थे। इसी कार्यक्रम में महिलाओं को पुलिस की बदसलूकी का सामना करना पड़ा।

महिलाओं और बेटियों के लिए बड़ी- बड़ी बातें करने वाली मोदी सरकार क्या इसी सम्मान की बात कर रही थी ?

विधानसभा चुनाव 2018: मध्यप्रदेश का चुनावी समीकरण,इन सीटों पर आ सकती है कांग्रेस

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मध्य प्रदेश समेत देश के पांच राज्यों में इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनाव आयोग के द्वारा इस संबंध में आज अहम घोषणा की जा सकती है। EC शनिवार शाम तक मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा कर सकता है। आपको बता दें कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम में चुनाव होने तय हैं, जबकि तेलंगाना में चुनाव कराए जाने की संभावना है।

मध्य प्रदेश का चुनावी समीकरण

वर्तमान में बीजेपी शासित मध्य प्रदेश में कुल 231 विधानसभा सीटें है। इनमें से 230 सीटों पर ही चुनाव होते हैं और बाकी के एक सदस्य को नॉमिनेट किया जाता है।मध्य प्रदेश में बीजेपी के पास 166 सीटें हैं। वहीं कांग्रेस के पास 57 सीटें हैं और बीएसपी के पास 4 सीटें हैं। यहां की मुख्य लड़ाई बीजेपी और कांग्रेस के बीच है। वहीं बसपा का भी राज्य में अच्छा दबदबा है। इन तीनों मुख्य पार्टियों के अलावा इस बार के विधानसभा चुनाव में कई पार्टियां उतरने वाली हैं जिसमें सपा, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और जयस जैसी पार्टियां शामिल है। वहीं इस बार एससी\एसटी एक्ट और प्रमोशन में आरक्षण के खिलाफ सपाक्स की ‘अनारक्षित समाज पार्टी’ ने भी चुनाव लड़ने का ऐलान किया है।

राजस्थान का चुनावी समीकरण

राजस्थान में कुल 200 सीटें हैं। जिसमें सरकार 161 सीट पर काबिज है। इस में 160 सीट भाजपा के ही पास है और एक एनपीपी के पास है। विपक्ष के पास कुल 36 सीट हैं जिसमें कांग्रेस 25, बीएसपी 2 एनयूजेडपी 2 और निर्दलीय 7 सीट हैं। जबकि तीन सीट अभी खाली है। इस विस चुनाव में भी सीधे तौर पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला है। जबकि इन दोनों के अलावा कई क्षेत्रीय पार्टियां भी अपनी किस्मत आजमाने जा रही है।

छत्तीसगढ़ का चुनावी समीकरण

छत्तीसगढ़ में कुल 90 विधानसभा सीटें हैं और एक नॉमिनेटेड सीट है। पिछले चुनाव यानि की 2013 के विस चुनाव परिणाम के मुताबिक बीजेपी के पास 49 सीट, कांग्रेस को 39, बीएसपी को 1 और अन्य को एक सीट मिली थी। यहां भी मुख्य रूप से लड़ाई बीजेपी और कांग्रेस के बीच की है। इन दोनों के अलावा कांग्रेस नेता और पूर्व में सीएम रह चुके अजीत जोगी ने जनता कांग्रेस-जोगी के नाम से पार्टी बनाई है और वे बीएसपी के साथ गठबंधन में चुनावी मैदान में उतर रहे हैं।

मिजोरम का चुनावी समीकरण

पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम में कुल 40 विधानसभा सीटें हैं। 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत हुई थी। कुल 40 में से 34 सीटों पर जीत कर यहां कांग्रेस की सरकार बनी थी। बाकी के सीटों में एमएनएफ को 5 और और एमपीसी को 1 सीट मिली थी। इस बार यहां जीत हासिल करने के लिए बीजेपी भी जोर लगा रही है।

तेलंगाना की चुनावी समीकरण

तेलंगाना में कुल 119 विधानसभा सीटें हैं। यहां पिछली बार 2014 में लोकसभा चुनाव के साथ ही यहां चुनाव कराए गए थे। उस दौरान केसीआर की पार्टी टीआरएस को 90 सीटें मिली थी। इसके अलावा कांग्रेस को 13, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM को 7, बीजेपी को 5 और सीपीआईएम को 1 सीट मिली थी। इस बार भी इन्हीं पार्टियों के बीच मुकाबला है।

मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनावों की घोषणा अब कुछ ही देर में,राहुल गाँधी कर रहे हैं सभा

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मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव समेत पांच राज्यों में होने वाले चुनावों की भी आज घोषणा हो सकती है। चुनाव आयोग ने इसकी पूरी तैयारियां भी कर ली हैं। चुनाव आयोग आज दोपहर तीन बजे एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाला है जिसमें इन राज्यों में चुनाव तारीखों की घोषणा हो सकती है। पहले यह प्रेस कॉन्फ्रेंस 12:30 बजे होनी थी, लेकिन किसी कारणवश अब यह प्रेस कॉन्फ्रेंस तीन बजे रखी गई है। आयोग अलग-अलग चरणों में यह चुनाव करवा सकता है। आयोग द्वारा तारीखों की घोषणा के बाद ही राज्यों में आचार संहिता लागू हो जाएगी।

बता दें कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस और भाजपा पहले ही कमर कस चुके हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी शानिवार को मध्य प्रदेश में चुनावी रैली को संबोधित करेंगे। वहीं, प्रधानमंत्री मोदी राजस्थान में आज चुनावी रैली को संबोधित करेंगे।

तेलंगाना विधानसभा चुनाव की भी हो सकती है घोषणा

मध्य प्रदेश में 2013 में हुए विधानसभा चुनाव को लेकर तारीखों की घोषणा 4 अक्टूबर को की गई थी। इस आधार पर अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बार भी आचार संहिता जल्द लागू हो सकती है। मध्य प्रदेश के साथ-साथ राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना विधानसभा चुनावों की भी घोषणा की जा सकती है।

हालांकि, माना ये भी जा रहा है कि तेलंगाना में 9 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होगी, इसलिए उसके बाद ही चुनावों के तारीखों की घोषणा की जाएगी। इसके अलावा ऐसा भी माना जा रहा है कि 12 अक्टूबर के बाद चुनाव की घोषणा की जाएगी, क्योंकि मध्य प्रदेश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत मनीला दौरे पर जा रहे हैं। जब वह वहां से वापस लौटेंगे, उसके बाद ही चुनाव के तारीखों की घोषणा होगी।

कहां-कितनी सीटें?

बता दें कि मध्य प्रदेश में कुल 231 सीटों पर चुनाव होगा, जबकि राजस्थान में 200 सीटों पर, छत्तीसगढ़ में 91 सीटों पर, मिजोरम में 40 सीटों पर और तेलंगाना में कुल 119 सीटों पर विधानसभा चुनाव होने हैं।

Congress Mocks Amit Shah’s Flag Unfurling Debacle

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There are some fundamental duties as Indian Citizens. Treating the tricolor with utmost respect is one of the most essential one. People show patriotism by unfurling flags on 15th August, which we find on the road lying on 16th.

Recently, Amit Shah, BJP’s National President, tried to unfurl the Tricolor. However, instead of climbing up the mast, the flag accidentally came down. Shah, quickly realised his mistake and hoisted the flag properly. The Congress party took a dig at Shah for ‘insulting’ the National Flag and tweeted that those who can’t even take care of the National Flag can’t run the country.

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