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आज़ाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला – मोदी निर्मित तबाही, नोटबंदी से आई : सुरजेवाला

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randeep singh surjewala in bhopal

कांग्रेस मीडिया विभाग के प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला ने शुक्रवार को नोटबंदी की दूसरी बरसी पर प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में प्रेस वार्ता को संबोधित किया। प्रेस वार्ता में सुरजेवाला ने कहा कि नोटबंदी को अब दो साल हो गये है। लोगों को समझ आ गया है कि नोटबंदी कोई क्रन्तिकारी कदम नही था बल्कि कालेधन को सफ़ेद करने वाली ‘फेयर एंड लवली योजना’ थी। जिसके कारण लाखों लोग बेरोजगार हो गये, हजारों कारखाने बंद हो गये, 100 से ज्यादा लोगों की जान चली गयी और देश की अर्थव्यस्था चौपट हो गयी। सुरजेवाला ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री मोदी जापान में अप्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए ताली बजा-बजाकर देश के गरीब व मध्यम वर्ग का मजाक उड़ाते हुए कह रहे थे कि “घर में शादी है और पैसे नहीं हैं, देखो नोटबंदी का कमाल”। यह भाजपा के अहंकार की आखिरी सीमा थी। सच तो यह है कि जहां एकतरफ नोटबंदी ने किसान, नौजवान, महिलाएं, छोटे व्यवसायी व दुकानदार की कमर तोड़ डाली, तो दूसरी तरफ कालाधन वालों की हो गई ‘ऐश’, जिन्होंने रातों रात सफेद कर लिया सारा कैश।

नोटबंदी घोटाले ने किया सबको बेज़ार,
किसान हों, नौजवान हों, व्यवसायी या दुकानदार,
रोजी गई, गया रोजगार – अर्थव्यवस्था का बंटाधार,
ऐश की कालाधन वालों ने, भुगत रहे हैं ईमानदार,
वोट की चोट से बताएंगे, कि भाजपाई हैं जिम्मेवार

रणदीप सिंह सुरजेवाला

सुरजेवाला ने कहा ” दो साल पहले, 8 नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की तबाही को आर्थिक क्रांति का नया सूत्र बताते हुए तीन वादे किये – सारा काला धन पकड़ा जाएगा, फर्जी नोट पकड़े जाएंगे, आतंकवाद व नक्सलवाद खत्म हो जाएगा। ऐसे में अब दो साल बाद नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह चौहान से नोटबंदी पर जवाब मांगने का समय आ गया है.” कांग्रेस मीडिया प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला ने इस मौके पर भाजपा सरकार से 8 प्रमुख सवाल किये.

सारा कालाधन कहां गया ?

10 दिसंबर, 2016 को मोदी सरकार ने देश की सुप्रीम कोर्ट को कहा था कि 15.44 लाख करोड़ पुराने नोटों में 3 लाख करोड़ कालाधन है, जो जमा नहीं होगा और जब्त हो जाएगा। सुरजेवाला ने बताया कि “24 अगस्त, 2018 की आरबीआई रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी के दिन चलन में 15.44 लाख करोड़ के नोटों में से 99.9 प्रतिशत मतलब 15.31 लाख करोड़ पुराने नोट तो बैंकों में जमा हो गए। बाकी बचा पैसा भी रॉयल बैंक ऑफ नेपाल व भूटान तथा अदालतों में केस प्रॉपर्टी के तौर पर जमा है। तो फिर कालाधन गया कहां ?

फर्जी नोट कहां गए ?

मोदी जी और बीजेपी ने नोटबंदी के समय बड़े-बड़े दावे किये थे कि नोटबंदी से हजारों करोड़ के नकली नोट पकडे जायेंगे। साल 2017-18 आरबीआई रिपोर्ट के मुताबिक 15.44 लाख करोड़ के पुराने नोटों में से मात्र 58.30 करोड़ ही नकली नोट पाए गए, यानि 0.0034 प्रतिशत। क्या नोटबंदी से नकली नोटों पर नकेल कसना भी भाजपाई जुमला निकला ?

क्या ख़त्म हुआ उग्रवाद और नक्सलवाद ?

बीजेपी ने दावा किया था कि नोटबंदी से नक्सलवाद और उग्रवाद ख़त्म हो जाएगा। नोटबंदी के बाद अकेले जम्मू-कश्मीर में 86 बड़े उग्रवादी हमले हुए, जिनमें 127 जवान और 99 नागरिक शहीद हुए। वहीं 1030 नक्सलवादी हमले हुए, जिनमें 114 जवान शहीद हुए। तो क्या मोदी सरकार ने देश को जानबूझकर गुमराह किया?

क्या नए नोट छापने व बांटने की कीमत नोटबंदी की बचत से 300 प्रतिशत अधिक है?

आरबीआई के मुताबिक साल, 2016-18 के बीच नए नोट छापने तथा लिक्विडिटी ऑपरेशन में लगभग 30,303 करोड़ रु. खर्च हुए है, वहीं नोटबंदी में मात्र 10,720 करोड़ रु. वापस जमा नही हो पाए। क्या भाजपाई बताएंगे कि इतने बड़े आर्थिक नुकसान के लिए कौन जिम्मेवार है?

क्या डिजिटल हो गया इंडिया ?

8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी के समय देश में 17.71 लाख करोड़ नगद चलन में था। वहीं 28 अक्टूबर, 2018 को चलन में कैश की मात्रा बढ़कर 19.61 लाख करोड़ हो गई है। तो फिर डिजिटल भुगतान कैसे बढ़ा?

नोटबंदी से पड़ी बेरोजगारी की मार ?

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग ऑफ इंडियन इकॉनॉमी की रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी से सीधे तौर पर 15 लाख नौकरियां गईं और देश की अर्थव्यवस्था को 3 लाख करोड़ का नुकसान हुआ। क्या यह सीधे तौर पर आर्थिक आतंकवाद नहीं?

क्या नोटबंदी कालेधन को सफेद बनाने का एक बड़ा घोटाला था ?


रणदीप सिंह सुरजेवाला ने नोटबंदी को कालेधन को सफ़ेद बनाने वाला देश का सबसे बड़ा घोटाला बताया। सुरजेवाला ने कहा कि “नोटबंदी से ठीक पहले भाजपा व आरएसएस ने सैकड़ों करोड़ रु. की संपत्ति पूरे देश में खरीदी। सितंबर, 2016 में बैंकों में यकायक 5,88,600 करोड़ रुपया अतिरिक्त जमा हुआ। नोटबंदी वाले दिन, यानि 8 नवंबर, 2016 को भाजपा की कलकत्ता इकाई के खाता नंबर 554510034 में 500 व 100 रु. के तीन करोड़ रुपए जमा करवाए गए। कर्नाटक के पूर्व मंत्री व भाजपा नेता, जी. जनार्दन रेड्डी (बेल्लारी ब्रदर्स) के सहयोगी, रमेश गौड़ा ने नोटबंदी के बाद खुदकुशी कर ली तथा सुसाईड नोट में लिखा कि 100 करोड़ रु. का कालाधन भाजपा नेताओं द्वारा बदला जा रहा था। क्या भाजपा व आरएसएस को नोटबंदी के निर्णय की जानकारी पहले से थी? क्या कारण है कि भाजपा व आरएसएस ने इतने सैकड़ों व हजारों करोड़ की संपत्ति खरीदी व इसे सार्वजनिक करने से इंकार कर दिया? क्या इसकी जाँच नहीं होनी चाहिए?”

क्या अमित शाह व भाजपा नेताओं की जाँच हुई?

नोटबंदी के बाद मात्र 5 दिनों में यानि, 10 नवंबर से 14 नवंबर, 2016 के बीच अहमदाबाद जिला को -ऑपरेटिव बैंक में 745.58 करोड़ रु. के पुराने नोट जमा हो गए। इस बैंक के डायरेक्टर, भाजपा अध्यक्ष, श्री अमित शाह हैं, जो इससे पहले बैंक के चेयरमैन भी रहे हैं। 7 मई, 2018 के आरटीआई जवाब (A1 व A2) में बताया गया कि देश में किसी भी जिला को-ऑपरेटिव बैंक में जमा हई पुराने नोटों की यह सबसे बड़ी राशि थी। ऐसा क्यों? क्या इसकी जाँच हुई? क्या श्री अमित शाह की जाँच हुई?

रणदीप सुरजेवाला ने 8 सवाल पूछने के बाद कहा कि आज नोटबंदी को 731 दिन बीत गए हैं और देशवासी भुगत रहे हैं. जनता अब सब समझ गयी है और नोटबंदी का जवाब वोटबंदी करके देगी। कांग्रेस अगर सत्ता में आती है तो नोटबंदी के दौरान कालाधन बदलने वालों की जांच करवाई जाएगी और जो भी दोषी पाया जाएगा उसे सजा मिलेगी।

क्या इस बार मिज़ोरम में खाता खोल पाएगी भाजपा ?

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पूर्वोत्तर में कांग्रेस के आख़िरी किले में अगले महीने विधानसभा चुनाव होने है। अमित शाह समेत भाजपा के कई वरिष्ठ नेता मिज़ोरम का दौरा कर रहे है। भाजपा यहाँ नरेन्द्र मोदी की योजनाओं के सहारे मैदान में उतर रही है। पिछले चुनाव में सभी सीटों पर जमानत जब्त होने के बाद भी भाजपा इस चुनाव में आत्मविश्वास से भरी हुई है। आत्मविश्वास इतना कि पहली बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और अमित शाह सभी 40 सीटें जीतने की बात कर रहे है। भाजपा यह सब जितना आसान दिखा रही है उतना आसान यह है नही। कांग्रेस पिछले 10 सालों से मिज़ोरम की सत्ता में है। 4 विधायकों के पार्टी छोड़ने के बाद भी कांग्रेस के पास 30 विधायक है। दरअसल भाजपा मिज़ोरम में जीतने और सरकार बनाने के लिए नही बल्कि और कांग्रेस को हराने और खाता खोलकर मिज़ो नेशनल फ्रंट के साथ मिज़ोरम की राजनीति में एंट्री मारना चाहती है।

मिज़ोरम में पिछले विधानसभा चुनाव में नोटा से भी कम वोट पाने वाली भाजपा इस विधानसभा चुनाव में पहली बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन के संस्थापक और बीजेपी नेता हिमंता बिस्वा ने कहा है की पार्टी मिज़ोरम विधानसभा चुनाव जीतेगी और पूर्ण बहुमत से सरकार बनाएगी। वहीं कुछ दिनों पहले मिज़ोरम में पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद करके आए अमित शाह ने दावा किया था की पार्टी इस बार मिज़ोरम में सभी 40 सीटों पर जीत दर्ज करेगी।


मिज़ोरम में भाजपा अब तक 5 विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है। 1993 में 8, 98 में 12, 2003 में 8, 2008 में 9 और 2013 में 17 सीटों पर भाजपा ने चुनाव लड़ा था। 5 विधानसभा चुनाव लड़ने के बाद भी भाजपा अब तक मिज़ोरम में अपना खाता तक नही खोल पाई है। पिछले विधानसभा चुनाव में 17 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा की सभी 17 सीटों पर जमानत जब्त हो गयी थी। उस चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 1 से भी कम, 37% था। जो की नोटा से भी कम था। ऐसे में अगर हेमंत बिसवा पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने और अमित शाह सभी 40 सीटें जीतने का दावा करते है तो प्रश्न उठता है कि यह भाजपा का आत्मविश्वास है या फिर सिर्फ राजनैतिक जुमला है ?

कांग्रेस मुक्त पूर्वोत्तर

केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद कांग्रेस धीरे-धीरे पूर्वोत्तर से साफ़ होती जा रही है। अब सिर्फ मिज़ोरम में ही कांग्रेस की सरकार है। दरअसल मई 2016 में भाजपा ने पूर्वोत्तर के गैर कांग्रेसी दलों को एकजुट करने के लिए पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन (एनईडीए- नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस) की स्थापना की थी। इस गठबंधन में भाजपा के साथ नागा पीपल्स पार्टी, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट, पीपल्स पार्टी ऑफ़ अरुणाचल और मिज़ो नेशनल फ्रंट आदी दल शामिल है। दरअसल पूर्वोत्तर में अपने पैर पसारने में हमेशा नाकाम रहने वाली भाजपा ने मोदी सरकार आने के बाद असम, मणिपुर और त्रिपुरा में सरकार बना ली। इसके साथ ही नागालैंड और मेघालय में भी भाजपा के समर्थन के साथ पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार है।


भाजपा ने पूर्वोत्तर में कांग्रेस विरोधी दलों को एक करके कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने की रणनीति पर काम किया है। इसी रणनीति के तहत भाजपा अब पूर्वोत्तर में कांग्रेस का आखरी किला भी गिराना चाहती है। इसके लिए खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मिज़ोरम जाकर पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद किया। अमित शाह के अलावा राम माधव, असम के मुख्यमंत्री सरबानंद सोनोवाल और मंत्री हिमांता बिस्वा शर्मा मिज़ोरम का दौरा कर रहे है। भाजपा किसी भी तरह से कांग्रेस को मिज़ोरम की सत्ता से बाहर करना चाहती है।

ललथनहवला भरोसे कांग्रेस

कांग्रेस पिछले 10 सालों से मिज़ोरम की सत्ता पर काबिज है। ललथनहवला 10 साल से प्रदेश के मुख्यमंत्री है और 1973 से मिज़ोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष है। इतने लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले वह शायद देश के पहले व्यक्ति है। राजनीति में आने के पहले वह मिज़ोरम के एक कोऑपरेटिव बैंक में असिस्टेंट के तौर पर भी काम कर रहे थे। बाद में वह मिज़ो नेशनल फ्रंट के आंदोलन से जुड़कर इसके विदेश सचिव बन गये। जिसको लेकर ललथनहवला जेल भी गये। 1967 में जेल से छूटने के बाद वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए। उनको पार्टी की ओर से आइजोल जिले का मुख्य संगठनकर्ता बना गिया गया।


1984-86 तक दो साल के लिए ललथनहवला पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। जिसके बाद वह 1989 से 1998 फिर 2008 से लेकर अब तक राज्य के मुख्यमंत्री है। ललथनहवला को मिजोरम में करिश्माई नेता माना जाता है। वह अब तक 9 विधानसभा चुनाव जीत चुके है। मिजोरम में कांग्रेस एक बार फिर ललथनहवला के भरोसे ही चुनाव लड़ रही है।

बागियों का सहारा

2013 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 44.63% वोट पाकर 40 में से 34 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी मिज़ो नेशनल फ्रंट, 28.65% वोट पाकर सिर्फ 5 सीटें ही जीत पायी। वहीं 1 सीट एमपीसी के खाते में गई थी। मिजोरम में पिछले काफी समय से कांग्रेस में बगावत का सिलसिला चल रहा है। एक के बाद एक कांग्रेस के मौजूदा विधायक पार्टी छोड़ रहे है। कुछ भाजपा में जा रहे है तो ज्यादातर मिज़ो नेशनल फ्रंट का दामन थाम रहे है।


अमित शाह के दौरे के ठीक पहले राज्य के पूर्व मंत्री बुद्धा धन चकमा कांग्रेस का हाथ छोड़कर भाजपा के साथ चले गये थे। चकमा के पहले कांग्रेस के दो अन्य विधायक पार्टी से इस्तीफ़ा दे चुके है। इसमें पूर्व गृहमंत्री आर. लालजीर्लियना और लालरिनलियाना सैलो शामिल है। यह दोनों नेता एमएनएफ (मिज़ो नेशनल फ्रंट) में शामिल हो गये थे। इन तीनों नेताओं के बाद कांग्रेस विधायक हमिंगडेलोवा खियांगटे ने सोमवार को मिज़ोरम विधानसभा से इस्तीफा दे दिया। खियांगटे के इस्तीफे के बाद अब विधानसभा में कांग्रेस के कुल 30 विधायक बचे है।

कुल मिलाकर भाजपा यहाँ अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में बिलकुल नही है। खाता खोलने के लिए भी भाजपा को काफी पापड़ बेलने पड़ेंगे। 10 सालों से विपक्ष में बैठी मिज़ो नेशनल फ्रंट के बलबूते भाजपा यहाँ सत्ता में बैठने का ख्वाब देख सकती है लेकिन चुनाव पूर्व गठबंधन न करना भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित होगा। मिज़ो को पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले फायदा होता दिख रहा है लेकिन बहुमत के आंकड़े को पाना मुश्किल है। अन्य छोटे दल अगर कांग्रेस कि कुछ सीटें जीतने में कामयाब हो जाते है तो वह छोटे दल ही मिजोरम में किंग मेकर बनेंगे। ऐसे में मुकाबला फिर राहुल गाँधी बनाम अमित शाह का होगा। अमित शाह के पास खोने के लिए कुछ नही होगा। तो वहीं राहुल गाँधी भी कर्नाटक की तर्ज पर सत्ता बचाने के लिए त्याग से पीछे नही हटेंगें।


पूर्वोत्तर में कांग्रेस के आख़िरी किले में अगले महीने विधानसभा चुनाव होने है। अमित शाह समेत भाजपा के कई वरिष्ठ नेता मिज़ोरम का दौरा कर रहे है। भाजपा यहाँ नरेन्द्र मोदी की योजनाओं के सहारे मैदान में उतर रही है। पिछले चुनाव में सभी सीटों पर जमानत जब्त होने के बाद भी भाजपा इस चुनाव में आत्मविश्वास से भरी हुई है। आत्मविश्वास इतना कि पहली बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और अमित शाह सभी 40 सीटें जीतने की बात कर रहे है। भाजपा यह सब जितना आसान दिखा रही है उतना आसान यह है नही। कांग्रेस पिछले 10 सालों से मिज़ोरम की सत्ता में है। 4 विधायकों के पार्टी छोड़ने के बाद भी कांग्रेस के पास 30 विधायक है। दरअसल भाजपा मिज़ोरम में जीतने और सरकार बनाने के लिए नही बल्कि और कांग्रेस को हराने और खाता खोलकर मिज़ो नेशनल फ्रंट के साथ मिज़ोरम की राजनीति में एंट्री मारना चाहती है।

मिज़ोरम में पिछले विधानसभा चुनाव में नोटा से भी कम वोट पाने वाली भाजपा इस विधानसभा चुनाव में पहली बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन के संस्थापक और बीजेपी नेता हिमंता बिस्वा ने कहा है की पार्टी मिज़ोरम विधानसभा चुनाव जीतेगी और पूर्ण बहुमत से सरकार बनाएगी। वहीं कुछ दिनों पहले मिज़ोरम में पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद करके आए अमित शाह ने दावा किया था की पार्टी इस बार मिज़ोरम में सभी 40 सीटों पर जीत दर्ज करेगी।


मिज़ोरम में भाजपा अब तक 5 विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है। 1993 में 8, 98 में 12, 2003 में 8, 2008 में 9 और 2013 में 17 सीटों पर भाजपा ने चुनाव लड़ा था। 5 विधानसभा चुनाव लड़ने के बाद भी भाजपा अब तक मिज़ोरम में अपना खाता तक नही खोल पाई है। पिछले विधानसभा चुनाव में 17 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा की सभी 17 सीटों पर जमानत जब्त हो गयी थी। उस चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 1 से भी कम, 37% था। जो की नोटा से भी कम था। ऐसे में अगर हेमंत बिसवा पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने और अमित शाह सभी 40 सीटें जीतने का दावा करते है तो प्रश्न उठता है कि यह भाजपा का आत्मविश्वास है या फिर सिर्फ राजनैतिक जुमला है ?

कांग्रेस मुक्त पूर्वोत्तर

केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद कांग्रेस धीरे-धीरे पूर्वोत्तर से साफ़ होती जा रही है। अब सिर्फ मिज़ोरम में ही कांग्रेस की सरकार है। दरअसल मई 2016 में भाजपा ने पूर्वोत्तर के गैर कांग्रेसी दलों को एकजुट करने के लिए पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन (एनईडीए- नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस) की स्थापना की थी। इस गठबंधन में भाजपा के साथ नागा पीपल्स पार्टी, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट, पीपल्स पार्टी ऑफ़ अरुणाचल और मिज़ो नेशनल फ्रंट आदी दल शामिल है। दरअसल पूर्वोत्तर में अपने पैर पसारने में हमेशा नाकाम रहने वाली भाजपा ने मोदी सरकार आने के बाद असम, मणिपुर और त्रिपुरा में सरकार बना ली। इसके साथ ही नागालैंड और मेघालय में भी भाजपा के समर्थन के साथ पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार है।


भाजपा ने पूर्वोत्तर में कांग्रेस विरोधी दलों को एक करके कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने की रणनीति पर काम किया है। इसी रणनीति के तहत भाजपा अब पूर्वोत्तर में कांग्रेस का आखरी किला भी गिराना चाहती है। इसके लिए खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मिज़ोरम जाकर पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद किया। अमित शाह के अलावा राम माधव, असम के मुख्यमंत्री सरबानंद सोनोवाल और मंत्री हिमांता बिस्वा शर्मा मिज़ोरम का दौरा कर रहे है। भाजपा किसी भी तरह से कांग्रेस को मिज़ोरम की सत्ता से बाहर करना चाहती है।

ललथनहवला भरोसे कांग्रेस

कांग्रेस पिछले 10 सालों से मिज़ोरम की सत्ता पर काबिज है। ललथनहवला 10 साल से प्रदेश के मुख्यमंत्री है और 1973 से मिज़ोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष है। इतने लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले वह शायद देश के पहले व्यक्ति है। राजनीति में आने के पहले वह मिज़ोरम के एक कोऑपरेटिव बैंक में असिस्टेंट के तौर पर भी काम कर रहे थे। बाद में वह मिज़ो नेशनल फ्रंट के आंदोलन से जुड़कर इसके विदेश सचिव बन गये। जिसको लेकर ललथनहवला जेल भी गये। 1967 में जेल से छूटने के बाद वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए। उनको पार्टी की ओर से आइजोल जिले का मुख्य संगठनकर्ता बना गिया गया।


1984-86 तक दो साल के लिए ललथनहवला पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। जिसके बाद वह 1989 से 1998 फिर 2008 से लेकर अब तक राज्य के मुख्यमंत्री है। ललथनहवला को मिजोरम में करिश्माई नेता माना जाता है। वह अब तक 9 विधानसभा चुनाव जीत चुके है। मिजोरम में कांग्रेस एक बार फिर ललथनहवला के भरोसे ही चुनाव लड़ रही है।

बागियों का सहारा

2013 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 44.63% वोट पाकर 40 में से 34 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी मिज़ो नेशनल फ्रंट, 28.65% वोट पाकर सिर्फ 5 सीटें ही जीत पायी। वहीं 1 सीट एमपीसी के खाते में गई थी। मिजोरम में पिछले काफी समय से कांग्रेस में बगावत का सिलसिला चल रहा है। एक के बाद एक कांग्रेस के मौजूदा विधायक पार्टी छोड़ रहे है। कुछ भाजपा में जा रहे है तो ज्यादातर मिज़ो नेशनल फ्रंट का दामन थाम रहे है।


अमित शाह के दौरे के ठीक पहले राज्य के पूर्व मंत्री बुद्धा धन चकमा कांग्रेस का हाथ छोड़कर भाजपा के साथ चले गये थे। चकमा के पहले कांग्रेस के दो अन्य विधायक पार्टी से इस्तीफ़ा दे चुके है। इसमें पूर्व गृहमंत्री आर. लालजीर्लियना और लालरिनलियाना सैलो शामिल है। यह दोनों नेता एमएनएफ (मिज़ो नेशनल फ्रंट) में शामिल हो गये थे। इन तीनों नेताओं के बाद कांग्रेस विधायक हमिंगडेलोवा खियांगटे ने सोमवार को मिज़ोरम विधानसभा से इस्तीफा दे दिया। खियांगटे के इस्तीफे के बाद अब विधानसभा में कांग्रेस के कुल 30 विधायक बचे है।

कुल मिलाकर भाजपा यहाँ अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में बिलकुल नही है। खाता खोलने के लिए भी भाजपा को काफी पापड़ बेलने पड़ेंगे। 10 सालों से विपक्ष में बैठी मिज़ो नेशनल फ्रंट के बलबूते भाजपा यहाँ सत्ता में बैठने का ख्वाब देख सकती है लेकिन चुनाव पूर्व गठबंधन न करना भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित होगा। मिज़ो को पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले फायदा होता दिख रहा है लेकिन बहुमत के आंकड़े को पाना मुश्किल है। अन्य छोटे दल अगर कांग्रेस कि कुछ सीटें जीतने में कामयाब हो जाते है तो वह छोटे दल ही मिजोरम में किंग मेकर बनेंगे। ऐसे में मुकाबला फिर राहुल गाँधी बनाम अमित शाह का होगा। अमित शाह के पास खोने के लिए कुछ नही होगा। तो वहीं राहुल गाँधी भी कर्नाटक की तर्ज पर सत्ता बचाने के लिए त्याग से पीछे नही हटेंगें।

क्या इस बार मिज़ोरम में खाता खोल पाएगी भाजपा ?

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amit shah
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की फाइल फोटो


पूर्वोत्तर में कांग्रेस के आख़िरी किले में अगले महीने विधानसभा चुनाव होने है। अमित शाह समेत भाजपा के कई वरिष्ठ नेता मिज़ोरम का दौरा कर रहे है। भाजपा यहाँ नरेन्द्र मोदी की योजनाओं के सहारे मैदान में उतर रही है। पिछले चुनाव में सभी सीटों पर जमानत जब्त होने के बाद भी भाजपा इस चुनाव में आत्मविश्वास से भरी हुई है। आत्मविश्वास इतना कि पहली बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और अमित शाह सभी 40 सीटें जीतने की बात कर रहे है। भाजपा यह सब जितना आसान दिखा रही है उतना आसान यह है नही। कांग्रेस पिछले 10 सालों से मिज़ोरम की सत्ता में है। 4 विधायकों के पार्टी छोड़ने के बाद भी कांग्रेस के पास 30 विधायक है। दरअसल भाजपा मिज़ोरम में जीतने और सरकार बनाने के लिए नही बल्कि और कांग्रेस को हराने और खाता खोलकर मिज़ो नेशनल फ्रंट के साथ मिज़ोरम की राजनीति में एंट्री मारना चाहती है।

मिज़ोरम में पिछले विधानसभा चुनाव में नोटा से भी कम वोट पाने वाली भाजपा इस विधानसभा चुनाव में पहली बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन के संस्थापक और बीजेपी नेता हिमंता बिस्वा ने कहा है की पार्टी मिज़ोरम विधानसभा चुनाव जीतेगी और पूर्ण बहुमत से सरकार बनाएगी। वहीं कुछ दिनों पहले मिज़ोरम में पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद करके आए अमित शाह ने दावा किया था की पार्टी इस बार मिज़ोरम में सभी 40 सीटों पर जीत दर्ज करेगी।


मिज़ोरम में भाजपा अब तक 5 विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है। 1993 में 8, 98 में 12, 2003 में 8, 2008 में 9 और 2013 में 17 सीटों पर भाजपा ने चुनाव लड़ा था। 5 विधानसभा चुनाव लड़ने के बाद भी भाजपा अब तक मिज़ोरम में अपना खाता तक नही खोल पाई है। पिछले विधानसभा चुनाव में  17 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा की सभी 17 सीटों पर जमानत जब्त हो गयी थी। उस चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 1 से भी कम, 37% था। जो की नोटा से भी कम था। ऐसे में अगर हेमंत बिसवा पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने और अमित शाह सभी 40 सीटें जीतने का दावा करते है तो प्रश्न उठता है कि यह भाजपा का आत्मविश्वास है या फिर सिर्फ राजनैतिक जुमला है  ?

कांग्रेस मुक्त पूर्वोत्तर  

केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद कांग्रेस धीरे-धीरे पूर्वोत्तर से साफ़ होती जा रही है। अब सिर्फ मिज़ोरम में ही कांग्रेस की सरकार है। दरअसल मई 2016 में भाजपा ने  पूर्वोत्तर   के गैर कांग्रेसी दलों को एकजुट करने के लिए पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन (एनईडीए- नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस) की स्थापना की थी। इस गठबंधन में भाजपा के साथ नागा पीपल्स पार्टी, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट, पीपल्स पार्टी ऑफ़ अरुणाचल और मिज़ो नेशनल फ्रंट आदी दल शामिल है। दरअसल पूर्वोत्तर में अपने पैर पसारने में हमेशा नाकाम रहने वाली भाजपा ने मोदी सरकार आने के बाद असम, मणिपुर और त्रिपुरा में सरकार बना ली। इसके साथ ही नागालैंड और मेघालय में भी भाजपा के समर्थन के साथ पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार है। 


भाजपा ने पूर्वोत्तर में कांग्रेस विरोधी दलों को एक करके कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने की रणनीति पर काम किया है। इसी रणनीति के तहत भाजपा अब पूर्वोत्तर में कांग्रेस का आखरी किला भी गिराना चाहती है। इसके लिए खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मिज़ोरम जाकर पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद किया। अमित शाह के अलावा राम माधव, असम के मुख्यमंत्री सरबानंद सोनोवाल और मंत्री हिमांता बिस्वा शर्मा मिज़ोरम का दौरा कर रहे है। भाजपा किसी भी तरह से कांग्रेस को मिज़ोरम की सत्ता से बाहर करना चाहती है।

ललथनहवला भरोसे कांग्रेस

कांग्रेस पिछले 10 सालों से मिज़ोरम की सत्ता पर काबिज है। ललथनहवला 10 साल से प्रदेश के मुख्यमंत्री है और 1973 से मिज़ोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष है। इतने लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले वह शायद देश के पहले व्यक्ति है। राजनीति में आने के पहले वह मिज़ोरम के एक कोऑपरेटिव बैंक में असिस्टेंट के तौर पर भी काम कर रहे थे। बाद में वह मिज़ो नेशनल फ्रंट के आंदोलन से जुड़कर इसके विदेश सचिव बन गये। जिसको लेकर ललथनहवला जेल भी गये। 1967 में जेल से छूटने के बाद वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए। उनको पार्टी की ओर से आइजोल जिले का मुख्य संगठनकर्ता बना गिया गया।


1984-86 तक दो साल के लिए ललथनहवला पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। जिसके बाद वह 1989 से 1998 फिर 2008 से लेकर अब तक राज्य के मुख्यमंत्री है। ललथनहवला को मिजोरम में करिश्माई नेता माना जाता है। वह अब तक 9 विधानसभा चुनाव जीत चुके है। मिजोरम में कांग्रेस एक बार फिर ललथनहवला के भरोसे ही चुनाव लड़ रही है।

बागियों का सहारा 

amit shah

2013 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 44.63% वोट पाकर 40 में से 34 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी मिज़ो नेशनल फ्रंट, 28.65% वोट पाकर सिर्फ 5 सीटें ही जीत पायी। वहीं 1 सीट एमपीसी के खाते में गई थी। मिजोरम में पिछले काफी समय से कांग्रेस में बगावत का सिलसिला चल रहा है। एक के बाद एक कांग्रेस के मौजूदा विधायक पार्टी छोड़ रहे है। कुछ भाजपा में जा रहे है तो ज्यादातर मिज़ो नेशनल फ्रंट का दामन थाम रहे है। 


अमित शाह के दौरे के ठीक पहले राज्य के पूर्व मंत्री बुद्धा धन चकमा कांग्रेस का हाथ छोड़कर भाजपा के साथ चले गये थे। चकमा के पहले कांग्रेस के दो अन्य विधायक पार्टी से इस्तीफ़ा दे चुके है। इसमें पूर्व गृहमंत्री आर. लालजीर्लियना और लालरिनलियाना सैलो शामिल है। यह दोनों नेता एमएनएफ (मिज़ो नेशनल फ्रंट) में शामिल हो गये थे। इन तीनों नेताओं के बाद कांग्रेस विधायक हमिंगडेलोवा खियांगटे ने सोमवार को मिज़ोरम विधानसभा से इस्तीफा दे दिया। खियांगटे के इस्तीफे के बाद अब विधानसभा में कांग्रेस के कुल 30 विधायक बचे है।

कुल मिलाकर भाजपा यहाँ अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में बिलकुल नही है। खाता खोलने के लिए भी भाजपा को काफी पापड़ बेलने पड़ेंगे। 10 सालों से विपक्ष में बैठी मिज़ो नेशनल फ्रंट के बलबूते भाजपा यहाँ सत्ता में बैठने का ख्वाब देख सकती है लेकिन चुनाव पूर्व गठबंधन न करना भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित होगा। मिज़ो को पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले फायदा होता दिख रहा है लेकिन बहुमत के आंकड़े को पाना मुश्किल है। अन्य छोटे दल अगर कांग्रेस कि कुछ सीटें जीतने में कामयाब हो जाते है तो वह छोटे दल ही मिजोरम में किंग मेकर बनेंगे। ऐसे में मुकाबला फिर राहुल गाँधी बनाम अमित शाह का होगा। अमित शाह के पास खोने के लिए कुछ नही होगा। तो वहीं राहुल गाँधी भी कर्नाटक की तर्ज पर सत्ता बचाने के लिए त्याग से पीछे नही हटेंगें।

उपेंद्र कुशवाहा ने तोड़ी चुप्पी, मध्यप्रदेश की 66 सीटों पर लड़ेंगे चुनाव

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राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष और एनडीए सरकार में केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने मंगलवार को चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि भाजपा ने सीटों के आधे-आधे बंटवारें के फैसले पर नाराज हैं। साथ ही मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। कुशवाहा ने बताया की पार्टी प्रदेश की 66 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी।

बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा, आरएलएसपी और पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी ने बिहार की 40 सीटों में एक साथ चुनाव लड़ा था, जिसमें भाजपा को 22, लोक जनशक्ति पार्टी 6 और आरएलएसपी को तीन सीटें मिलीं थीं।

क्या है मामला :

26 अक्टूबर को दिल्ली में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मुलाकात भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से हुई, जिसमें आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर सीटों के बटवारें पर फैसला लिया गया। प्रेस कांर्फेंस कर दोनो ने बराबरी की सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही। साथ ही बिहार में भाजपा के सहयोगी दल आरएलएसपी (राष्ट्रीय लोक समता पार्टी) और लोक जनशक्ति पार्टी को भी सम्मान जनक सीटें देने की बात कही।

इसी दिन दूसरी तरफ कुशवाहा की मुलाकात लालू के बेटे और आरजेडी (राष्ट्रीय जनता दल) नेता तेजस्वी यादव से हुई, जिसके बाद ये कयास लगाए जा रहे थे कि शायद कुशवाहा अब आरजेडी के साथ लोकसभा चुनाव लड़ सकतें हैं। साथ ही शाह-नीतीश की लड़ाई से नाराज कुशवाहा के इस्तीफा देने की खबरें भी आने लगी थी। खैर कुशवाहा ने चुप्पी तोड़ते हुए सारी बतों का खंडन किया और मध्यप्रदेश में भाजपा को झटका देते हुए 66 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी।

उपेंद्र कुशवाहा और तेजस्वी यादव की मुलाकात।

मध्यप्रदेश में बाहरी पार्टियों की भरमार :

28 नवंबर को मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और इस चुनावीं जंग में बाहर की कई पार्टियों ने छलांग लगा दिया है। इसी कड़ी में बिहार में भाजपा के साथ 2014 के लोकसभा चुनाव लड़ने वाली उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी मध्यप्रदेश में भाजपा की प्रतिव्दंदी बन खड़ी हो गई है। भाजपा-कांग्रेस के अलावा प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, कम्यूनिस्ट पार्टी जैसी कई पार्टियों ने हिस्सा लिया है।

लौह पुरुष की 143वीं जयंती : सरदार का जीवन परिचय और मोदी का भाषण

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बुधवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के केवड़िया गांव में दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा का लोकार्पण किया। यह आजाद  भारत के पहले उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा है। प्रतिमा का लोकार्पण सरदार पटेल की 143वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर दी है। प्रधानमंत्री मोदी के साथ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, गुतरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी, गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री और मध्यप्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल भी इस कार्यक्रम में मौजूद थी।

सरदार पटेल का जीवन परिचय :

सरदार पटेल का  जन्म 31 अक्टूबर को नडियाड, मुंबई में एक कृषक परिवार में हुआ। सरदार झवेरभाई पटेल एंव लाडबा देवी के चौथी संतान थे, जिन्होंने लंदन से वकालत की पढ़ाई कर अहमदाबाद में वकालत किया करते थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से प्रेरित होकर सरदार पटेल स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिए। स्वतंत्रता आंदोलन में सरदार की पहली और सबसे अहम योगदान खेड़ा संघर्ष था, जिसमें उन्हें सफलता भी मिली।

सरदार पटेल आजाद भारत के पहले उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री थे। सरदार ही थे जिन्होंने भारत की आजादी के बाद अलग-अलग 565 रियासतों और राजा रजवाड़ों को एक कर अखण्ड भारत का निर्माण किया था।

प्रतिमा के साथ प्रमुख आकर्षण केंद्र :

नर्मदा तट पर स्थित सरदार पटेल की विशालकाय प्रतिमा के साथ ही वहां सैलानियों के लिए और भी आकर्षण के केंद्र बनाए गए है। जिससे वहां के लोगों को रोजगार का अवसर भी मिलेगा।

1. सरदार पटेल के जीवन पर आधारित संग्रहालय,

2. भारत भवन प्रदर्शनी सभागृह,

3. 3डी चित्रों का मानचित्रण,

4. 153 मीटर की ऊंचाई पर प्रतिमा के हृदय से सौदर्य का लुफ्त उठा सकेंगें,

5. 250 शिवरों वाला टेंट सिटी,

6. जनजातीय संग्रहालय, हस्तशिल्प बाजार,

7. फूलों की घाटी।

लौह पुरुष  सरदार पटेल की विशालकाय प्रतिमा को देश के करीब सात लाख गांवों से लाए गए लौह से  5 साल में 2500 करोड़ की लागत से बनाया गया,  जिसे 4500 कारीगरों और 250 इंजीनियर्स की मदद से बनाया गया है।

statueofunity

प्रधानमंत्री मोदी के भाषण की खास बातें :

प्रधानमंत्री मोदी ने सरदार पटेल को श्रद्धांजलि देते हुए विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा का अनावरण किया, इस दौरान उन्होंने सरदार से जुड़ी कई बातों को कार्यक्रम में देश की जनता के सामने रखा।

1. पटेल ना होते तो गिर के शेर और हैदराबाद का चारमिनार देखने के लिए वीजा लेना पड़ता,

2. मोदी ने कहा कि आज जो ये सफर एक पड़ाव तक आ पहुंचा है, उसकी यात्रा एक साल पहले शुरु की गई थी, जिसकी कल्पना 31 अक्टूबर 2010 को अहमदाबाद में सबके सामने रखी गई थी,

3. ये सबसे ऊंची प्रतिमा पूरी दुनिया और हमारी भावी पीढ़ियों को सरदार साहब के साहस, सामथ्र्य और संकल्प की याद दिलाती रहेगी,

4. उन्होंने कहा कि कच्छ से कोहिमा तक, कारगिल से कन्याकुमारी तक आज हम बेरोकटोक कहीं जा पा रहें हैं तो ये सरदार साहब की वजह से,

5. सरदार पटेल की यह प्रतिमा न्यू इंडिया, नए भारत के बढ़ते आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति है. यह प्रतिमा राष्ट्र और किसानों के स्वाभिमान का प्रतीक है.

6. पीएम मोदी- कौटिल्य की कूटनीति और शिवाजी के शौर्य के समावेश थे सरदार पटेल.

7. पीएम मोदी ने कहा कि यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे सरदार साहब की इस विशाल प्रतिमा को देश को समर्पित करने का अवसर मिला है.

8. आज भारत के वर्तमान में अपने इतिहास के एक स्वर्णिम पूत्र को उजागर करने का काम किया है. आज धरती से लेकर आसामन तक सरदार का अभिषेक हो रहा है।

सोशल वाणी: कालेधन के फेर में फसे अमित शाह, शिवराज पर कांग्रेस का ‘शिव’ वार

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कालेधन के फेर में फसे अमित शाह 

सोशल मीडिया पर सोमवार को अमित शाह का एक पुराना ट्वीट सामने आ गया जिसपर अमित शाह की जमकर खिचाई हुई. जनवरी 2015 में फर्स्ट पोस्ट द्वारा किये गये इस ट्वीट में अमित शाह कह रहे है कि “सरकार कालाधन वापिस लाने के प्लान पर काम कर रही है”. शाह के इस ट्वीट को शेयर करते हुए परेश ने लिखा ” हेलो अमित शाह जी, आप लगभग 4 साल पहले कालाधन वापिस लाने के प्लान पर काम कर रहे थे, कुछ विकास हुआ ? वहीं एक अन्य यूजर ने कमेंट में लिखा “इस ट्वीट में बाबा रामदेव को भी टैग करो. क्यूंकि रामदेव भाई, इस प्रश्न का उत्तर आपको भी देना चाहिए, चुप रहने से लोग भूल नही जाएँगे.  

क्या कांग्रेस के साथ है मालवा ?


राहुल गाँधी के मालवा दौरे के साथ ही ट्विटर पर #MalvaWithCongress ट्रेंड करने लगा. इस हैशटैग का इस्तेमाल करने वाले अधिकांश लोग कांग्रेसी जरूर थे लेकिन यह हैशटैग दिन भर ट्रेंड में रहा. हैशटैग का इस्तेमाल करके एक ओर कांग्रेस राहुल गाँधी के मालवा दौरे को सफल बनाया वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री शिवराज और प्रधानमंत्री मोदी पर जमकर हमला भी बोला.


गिरिराज सिंह पर तेजश्वी का तंज 


भाजपा नेता गिरिराज सिंह ने आज सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पहले कहा कि ” अब हिन्दुओं का सब्र टूट रहा है. मुझे भय है कि अगर हिन्दुओं का सब्र टूट गया तो क्या होगा ?”
गिरिराज सिंह के इस बयान के जवाब में आरजेडी नेता तेजश्वी यादव ने कहा “काहे बड़बड़ा रहे है फ़ालतू का? किसी का सब्र नहीं टूटा है। ठेकेदार मत बनिए, हमसे बड़े हिंदू नहीं है आप? आपको चुनाव का डर है। ये मगरमच्छी रोना रोने से फ़ुर्सत मिले तो युवाओं की नौकरी, विकास और जनता की सेवा की बात करिए। अपने दोस्त पलटूराम की तरह बेमतलब बिहारियों को बदनाम मत करिए।”

शिवराज पर कांग्रेस का ‘शिव’ वार 


कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने सोमवार को उज्जैन में महाकाल  के दर्शन के साथ ही अपने दो दिवसीय इंदौर-मालवा दौरे की शुरुआत की. राहुल गाँधी ने सिंधिया, कमलनाथ, अजय सिंह और सुरेश पचौरी समेत कांग्रेस के कई वरिष्ट नेताओं के साथ महाकाल की पूजा की. पूजा के बाद दिन भर ‘शिव भक्त’ राहुल गाँधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं की फोटो और विडियो सोशल मीडिया पर शेयर होते रहे.

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी- विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा की ये खास बातें

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विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा जो सरदार बल्ल्भ भाई पटेल ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी (Statue of Unity)’ के रूप में तैयार है. आज यानि की 31 अक्टूबर 2018 को सरदार बल्लभ भाई पटेल की 143वीं जयंती भी है. इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भव्य प्रतिमा का अनावरण कर उन्हे श्रद्धांजलि देते हुए स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का उद्घाटन किया. आइये जानते हैं ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के बारे में कुछ ख़ास बातें…

  • यह प्रतिमा नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध से 3.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.
  • मूर्ति को बनाने में करीब 2,989 करोड़ रुपये का खर्च आया. कंपनी के मुताबिक, कांसे की परत चढ़ाने के आशिंक कार्य को छोड़ कर बाकी पूरा निर्माण देश में ही किया गया है.
  • इस मूर्ति बनाने वाली कंपनी लार्सन एंड टुब्रो ने दावा किया कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है और महज 33 माह के रिकॉर्ड कम समय में बनकर तैयार हुई है.
  • सरदार पटेल की मुख्य प्रतिमा बनाने में 1,347 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि 235 करोड़ रुपये प्रदर्शनी हॉल और सभागार केंद्र पर खर्च किये गये.
  • स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का कुल वजन 1700 टन है और ऊंचाई 522 फिट यानी 182 मीटर है. इसके पैर की ऊंचाई 80 फिट, हाथ की ऊंचाई 70 फिट, कंधे की ऊंचाई 140 फिट और चेहरे की ऊंचाई 70 फिट है.
  • सरदार पटेल की यह मूर्ति राम वी. सुतार की निगरानी में हुई है. राम वी. सुतार को साल 2016 में सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया था. इससे पहले वर्ष 1999 में उन्हें पद्मश्री भी प्रदान किया जा चुका है.
  • इस मूर्ति में दो लिफ्ट भी लगी है, जिनके माध्यम से आप सरदार पटेल की छाती पहुंचेंगे और वहां से आप सरदार सरोवर बांध का नजारा देख सकेंगे और खूबसूरत वादियों का मजा ले सकेंगे.
  • यह स्टैच्यू 180 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से चलने वाली हवा में भी स्थिर खड़ा रहेगा. यह 6.5 तीव्रता के भूकंप को भी सह सकता है.
  • इस मूर्ति के निर्माण में भारतीय मजदूरों के साथ 200 चीन के कर्मचारियों ने भी हाथ बंटाया है. इन लोगों ने सितंबर 2017 से ही दो से तीन महीनों तक अलग-अलग बैचों में काम किया.
  • इसके लिए मूर्ति के 3 किलोमीटर की दूरी पर एक टेंट सिटी भी बनाई गई है. जो 52 कमरों का श्रेष्ठ भारत भवन 3 स्टार होटल है. जहां आप रात भर रुक भी सकते हैं.
  • वहीं स्टैच्यू के नीचे एक म्यूजियम भी तैयार किया गया है, जहां पर सरदार पटेल की स्मृति से जुड़ी कई चीजें रखी जाएंगी.
  • सरदार वल्लभ भाई पटेल की इस मूर्ति में 4 धातुओं का उपयोग किया गया है जिसमें बरसों तक जंग नहीं लगेगी. स्टैच्यू में 85 फीसदी तांबा का इस्तेमाल किया गया है.
  • 657 करोड़ रुपये निर्माण कार्य पूरा होने के बाद अगले 15 साल तक ढांचे के रखरखाव पर खर्च किए किए जाएंगे। 83 करोड़ रुपये पुल के निर्माण पर खर्च किये गये.

दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति

  • यह दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति है. इसकी लम्बाई 182 मीटर है.
  • दूसरे नंबर पर स्प्रिंग टेंपल बुद्धा-चीन (153 मीटर)
  • तीसरे नंबर यूशिकु दाईबुत्शु-जापान( 120 मीटर)
  • स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी-अमेरिका (93 मीटर)
  • द मदरलैंड कॉल्स -रूस (85 मीटर)
  • क्राइस्ट द रीडीमर-ब्राजील (38 मीटर)

शिवराज सरकार के खिलाफ कंप्यूटर बाबा करेंगे मन की बात, डैमेज कण्ट्रोल करेंगे अवधेशानंद गिरि

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शिवराज सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा ठुकरा चुके कंप्यूटर बाबा ने अब सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। बाबा ने घोषणा की है की वह शिवराज सरकार के खिलाफ संतों का समागम करके ‘मन की बात’ करेंगे’। बाबा का समागम 23 अक्टूबर को इंदौर, 30 अक्टूबर को ग्वालियर, 4 नवंबर को खंडवा, 11 नवंबर को रीवा और 23 नवंबर को जबलपुर में होगा। समागम में कंप्यूटर बाबा नर्मदा में चल रहे अवैध उत्त्खनन, गौरक्षा और राम मंदिर निर्माण को लेकर सरकार के खिलाफ मन की बात करेंगे। 


कंप्यूटर बाबा को मानाने के लिए सरकार के सारे प्रयास विफल होते नजर आ रहे है। शिवराज सरकार और भाजपा के सभी वरिष्ट नेता कंप्यूटर बाबा को मानाने में असफल हो रहे है। ऐसे में सरकार दूसरे राज्यों के बड़े धर्मगुरु और संतों को डैमेज कंट्रोल के लिए प्रदेश लाने का प्रयास कर रही है। सूत्रों के अनुसार जूनापीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि को बाबा और सरकार के बीच मध्यस्थता कराने का काम सौंपा गया है। खबर है की भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के भोपाल दौरे के दौरान भी कम्प्यूटर बाबा को लेकर चर्चा हुई थी। इसी चर्चा में रणनीति बनी कि सरकार और पार्टी का कोई भी नेता बाबा के खिलाफ कोई बयान नहीं देगा। उन्हें मनाने के लिए संतों का सहारा लिया जाएगा। स्वामी अवधेशानंद गिरि को यह जिम्मेदारी सौंपने पर सहमति बनी है। साथ ही बाबा के संपर्क में रहने वाले दूसरे राज्यों के संतों से भी बातचीत की जा रही है। भाजपा को समर्थन देने वाले देश के कुछ संतों की जल्द ही कम्प्यूटर से चर्चा कराई जाएगी।

दरअसल कुछ समय पहले तक राज्य सरकार में राज्यमंत्री का दर्जा पाने वाले कम्प्यूटर बाबा इस समय सरकार से काफी नाराज चल रहे है। बाबा सार्वजानिक मंच से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर धोखा देने का आरोप लगा रहे है। चुनाव के तुरंत पहले बाबा ने प्रदेश में अपनी सक्रियता बड़ाई है। बाबा सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं और सरकार पर जमकर हमला बोल रहे है। बाबा का कहना है की वह इस धर्म विरोधी सरकार में रहकर अपवित्र हो गये है। इस सरकार ने संत समाज की उपेक्षा की है। मुख्यमंत्री शिराज संतों से मिलना नहीं चाहते। नर्मदा के शुद्धिकरण और गौशाला अनुदान के लिए सरकार ने कुछ भी नहीं किया। जो स्थिति पहले थी, वही आज भी है।

 
कंप्यूटर बाबा ने कहा की ‘हमें खबर मिली है कि सरकार बाहर से संतों को मप्र लेकर आ रही है। इन संतों को मप्र में इकट्ठा किया जा रहा है। यह सरकार संतों  को भी बरगला रही है। पूरा संत समाज एक है। वह इस सरकार के बहकावे में नहीं आएगा। नर्मदा को बचाने के लिए अपनी जान भी दे दूंगा, लेकिन सरकार के बहकावे में नहीं आऊंगा। नर्मदा किनारे होने वाले पौधरोपण, रेत खनन और नर्मदा मैया को नुकसान पहुंचाने वालों को मैं छोड़ूंगा नहीं।


कंप्यूटर बाबा के हाव-भाव देखकर एक बात तो साफ़ है की सरकार के लिए बाबा को मानना अब आसान नही होगा। जिस तरह बाबा ने सीधे मुख्यमंत्री शिवराज के खिलाफ मोर्चा खोला है, अगर उन्हें जल्दी नही मनाया गया तो सरकार को उनका नुक्सान जरूर होगा।

शिवराज सरकार के खिलाफ कंप्यूटर बाबा करेंगा मन की बात, डैमेज कण्ट्रोल करेंगे अवधेशानंद गिरि

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शिवराज सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा ठुकरा चुके कंप्यूटर बाबा ने अब सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। बाबा ने घोषणा की है की वह शिवराज सरकार के खिलाफ संतों का समागम करके ‘मन की बात’ करेंगे’। बाबा का समागम 23 अक्टूबर को इंदौर, 30 अक्टूबर को ग्वालियर, 4 नवंबर को खंडवा, 11 नवंबर को रीवा और 23 नवंबर को जबलपुर में होगा। समागम में कंप्यूटर बाबा नर्मदा में चल रहे अवैध उत्त्खनन, गौरक्षा और राम मंदिर निर्माण को लेकर सरकार के खिलाफ मन की बात करेंगे। 


कंप्यूटर बाबा को मानाने के लिए सरकार के सारे प्रयास विफल होते नजर आ रहे है। शिवराज सरकार और भाजपा के सभी वरिष्ट नेता कंप्यूटर बाबा को मानाने में असफल हो रहे है। ऐसे में सरकार दूसरे राज्यों के बड़े धर्मगुरु और संतों को डैमेज कंट्रोल के लिए प्रदेश लाने का प्रयास कर रही है। सूत्रों के अनुसार जूनापीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि को बाबा और सरकार के बीच मध्यस्थता कराने का काम सौंपा गया है। खबर है की भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के भोपाल दौरे के दौरान भी कम्प्यूटर बाबा को लेकर चर्चा हुई थी। इसी चर्चा में रणनीति बनी कि सरकार और पार्टी का कोई भी नेता बाबा के खिलाफ कोई बयान नहीं देगा। उन्हें मनाने के लिए संतों का सहारा लिया जाएगा। स्वामी अवधेशानंद गिरि को यह जिम्मेदारी सौंपने पर सहमति बनी है। साथ ही बाबा के संपर्क में रहने वाले दूसरे राज्यों के संतों से भी बातचीत की जा रही है। भाजपा को समर्थन देने वाले देश के कुछ संतों की जल्द ही कम्प्यूटर से चर्चा कराई जाएगी।

दरअसल कुछ समय पहले तक राज्य सरकार में राज्यमंत्री का दर्जा पाने वाले कम्प्यूटर बाबा इस समय सरकार से काफी नाराज चल रहे है। बाबा सार्वजानिक मंच से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर धोखा देने का आरोप लगा रहे है। चुनाव के तुरंत पहले बाबा ने प्रदेश में अपनी सक्रियता बड़ाई है। बाबा सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं और सरकार पर जमकर हमला बोल रहे है। बाबा का कहना है की वह इस धर्म विरोधी सरकार में रहकर अपवित्र हो गये है। इस सरकार ने संत समाज की उपेक्षा की है। मुख्यमंत्री शिराज संतों से मिलना नहीं चाहते। नर्मदा के शुद्धिकरण और गौशाला अनुदान के लिए सरकार ने कुछ भी नहीं किया। जो स्थिति पहले थी, वही आज भी है।

 
कंप्यूटर बाबा ने कहा की ‘हमें खबर मिली है कि सरकार बाहर से संतों को मप्र लेकर आ रही है। इन संतों को मप्र में इकट्ठा किया जा रहा है। यह सरकार संतों  को भी बरगला रही है। पूरा संत समाज एक है। वह इस सरकार के बहकावे में नहीं आएगा। नर्मदा को बचाने के लिए अपनी जान भी दे दूंगा, लेकिन सरकार के बहकावे में नहीं आऊंगा। नर्मदा किनारे होने वाले पौधरोपण, रेत खनन और नर्मदा मैया को नुकसान पहुंचाने वालों को मैं छोड़ूंगा नहीं।


कंप्यूटर बाबा के हाव-भाव देखकर एक बात तो साफ़ है की सरकार के लिए बाबा को मानना अब आसान नही होगा। जिस तरह बाबा ने सीधे मुख्यमंत्री शिवराज के खिलाफ मोर्चा खोला है, अगर उन्हें जल्दी नही मनाया गया तो सरकार को उनका नुक्सान जरूर होगा।

संघ मैदान में आया है तो चुनाव का मुद्दा राम और पाकिस्तान ही होगा

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हिन्दी भाषी तीन राज्यों की चुनाव प्रक्रिया के बीच आए दशहरे के त्यौहार ने इस बात के स्पष्ट संकेत दिए हैं कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की भाजपा सरकार को बचाने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्त्ता राम और पाकिस्तान का अस्त्र लेकर चुनाव मैदान में प्रचार करते नजर आएंगे।

अब तक तीनों राज्यों में सरकार की नाकामी चुनाव का मुद्दा बने हुए हैं। कांग्रेस भाजपा के तीनों मुख्यमंत्रियों पर लगातार हमलावर है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मध्यप्रदेश पर विशेष तौर पर फोकस कर रहे हैं। भाजपा के नेताओं द्वारा राहुल गांधी का बाबा कह कर उठाया जा रहा उपहास पर भी वोटर ताली नहीं बजा रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यह महसूस कर रहा है कि इन तीनों राज्यों में भाजपा को अपनी सत्ता बचाने के लिए चुनावी रणनीति में व्यापक बदलाव करना होंगे। 

मोहन भागवत के राम मंत्र को ब्रह्मास्त्र के तौर पर उपयोग करेगी भाजपा 

हिन्दू ग्रंथों और शास्त्रों में ब्रह्मास्त्र का उल्लेख कई स्थानों पर देखने को मिलता है। अर्जुन के पास भी ब्रह्मास्त्र था। उन्होंने इसका उपयोग महाभारत में किया था। भारतीय जनता पार्टी देश की चुनावी राजनीति में राम का उपयोग ब्रह्मास्त्र के तौर पर करती है। राम के नाम का उपयोग वोटों का बंटवारा हिन्दू-मुस्लिम के तौर पर किए जाने के लिए किया जाता है। राम का यह मुद्दा केवल हिन्दीभाषी राज्यों में असर करता दिखाई देता है। दक्षिण भारत में राम का असर राजनीति पर नहीं पड़ता है। उत्तरप्रदेश से लेकर हरियाणा तक के चुनाव में भाजपा के नेताओं ने अपने-अपने तरीके से राम नाम का जप किया था। पाकिस्तान और घुसपैठिया जैसे मुद्दे, वोटों के धुर्वीकरण के लिए उभरे गए।

मध्यप्रदेश,राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव के लिए वोट डाले जाने की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है वैसे-वैसे मुद्दे भी बदलते हुए दिखाई दे रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने दशहरे के मौके पर अपने वार्षिक संबोधन में राम का जिक्र कर भावी चुनावी रणनीति के संकेत दिए हैं। भागवत ने कहा कि अब राम मंदिर निर्माण के लिए केन्द्र सरकार को कानून बनाना चाहिए। अयोध्या की विवादास्पद बाबरी मस्जिद जिस स्थान पर है उसी स्थान पर भगवान श्री राम का जन्म हुआ था, यह दावा विश्व हिन्दू परिषद द्वारा कई शोध के आधार पर लगातार किया जाता रहा है। जमीन के स्वामित्व को लेकर मामला अभी ऊपरी अदालत में चल रहा है। इस पर सुनवाई भी जल्द शुरू होने वाली है। संघ चाहता है कि केन्द्र सरकार कानून बनाकर जमीन के स्वामित्व का मसला हल कर दे। संघ को यह उम्मीद है कि कानून बनने के बाद हिन्दू समुदाय स्वत: इसके पक्ष में खड़ा हो जाएगा। कांग्रेस अथवा अन्य दलों का विरोध भाजपा को लाभ देने वाला होगा।

माना यह जा रहा है कि संघ प्रमुख ने यह बयान देने से पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से विमर्श किया होगा। मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने जिस तरह से अदालत के आदेश को दरकिनार कर एट्रोसिटी एक्ट में बदलाव किया है,उससे उच्च वर्ग में भाजपा की स्थिति कमजोर हुई है। भाजपा उच्च वर्ग को वापस अपनी और लाने के लिए मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने का कार्ड खेल रही है। इससे पहले मंदिर निर्माण के मामले में भाजपा अदालत के आदेश का पालन करने की बात करती रही है। राहुल के मंदिर-मंदिर जाने से कमजोर पड़ रहा है.

गुजरात चुनाव के बाद से कांग्रेस की रणनीति में बदलाव ने भी भाजपा और संघ को राम मंदिर को लेकर बैकफुट पर लाकर खड़ा कर दिया है। राहुल गांधी पिछले एक साल से लगातार कांग्रेस की छवि में बदलाव लाने के लिए देश के सभी प्रमुख हिन्दू धर्म स्थानों पर जाकर पूजा-अर्चना कर रहे हैं। पिछले दो दशक में कांग्रेस की छवि अल्पसंख्यकों का पक्ष लेने वाली पार्टी के तौर गहरी हो गई है। भाजपा, कांग्रेस को बहुसंख्यक विरोधी पार्टी के रूप में प्रचारित करती रही है। राहुल गांधी के मंदिर-मंदिर जाने से भाजपा को कांग्रेस के खिलाफ अपनी मुहिम चलाने में भी मुश्किल आ रही है।

गुजरात चुनाव में राहुल की रणनीति का असर देखने को मिला। भाजपा बमुश्किल अपनी सरकार बचा पाई थी। मध्यप्रदेश में भी राहुल गांधी की कोशिश है कि वोटों का धुर्वीकरण धर्म के आधार पर न हो। राहुल गांधी,भाजपा से नाराज उच्च वर्ग को अपने साथ लाने के लिए अल्पसंख्यकों के समर्थन की बात से लगातार बच रहे हैं। वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर राफेल को लेकर लगातार हमले कर रहे हैं। मध्यप्रदेश में पचास से अधिक ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां वोटों का धुर्वीकरण होने पर कांग्रेस को बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है। राम का नाम न होने के कारण भाजपा को ऐसी सीटें बचाना मुश्किल दिखाई दे रहा है।

संघ के जरिए असंतुष्टों को साधना चाहते हैं शिवराज

मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव से अब तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपने आपको दूर रखा था। हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भोपाल स्थित संघ कार्यालय समिधा में जाकर वहां पदाधिकारियों से मुलाकात की थी। शाह को मध्यप्रदेश के बारे में जो फीडबैक मिला हैं, उसमें जमीनी हालात सरकार बनने लायक नहीं दिखी कार्यकर्त्ता नाराज हैं। उच्च वर्ग सपाक्स की ओर जाता दिखाई दे रहा है। कुछ स्थानों पर तो शाह को भी एट्रोसिटी एक्ट के खिलाफ प्रदर्शन देखना पड़ा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के चेहरे को लेकर भी जनता में नाराजगी देखने को मिली है। शाह के आग्रह पर संघ राज्य में भाजपा की मदद के लिए तैयार हो गया है। संघ ने जो फीडबैक भाजपा को दिया है, उसमें अस्सी मौजूदा विधायकों को बदलने के लिए कहा गया है। पार्टी उम्मीदवारों के चयन में भी संघ की राय ले रही है। संघ के पदाधिकारी लगातार भाजपा नेताओं के साथ बैठक कर रहे हैं। संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान के बाद संघ के कार्यकर्त्ताओं को राम मंदिर पर काननू की चर्चा के लिए लोगों के बीच भेजा जा रहा है।