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जनगणना की मांग को लेकर भाजपा-कांग्रेस में खींचातानी, दोनों पार्टियों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी

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2023 के चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं। कांग्रेस के पूर्व मंत्री अरूण यादव ने यूपीए सरकार में हुई जातिगत जनगणना के आंकड़ों को सार्वजनिक करने की मांग की है। इसके अलावा कांग्रेस ने आबादी के हिसाब से आरक्षण देने की भी मांग की है। कांग्रेस की इस मांग के बाद बीजेपी ने भी इस पर पलटवार किया है।

 बीजेपी के पूर्व मंत्री लाल सिंह आर्य ने बयान दिया है कि कांग्रेस के नेताओं ने कभी हिंदुस्तान के दलित गरीब को आगे नहीं आने दिया। यूपीए की 57 साल केंद्र में सरकार रही वहीं मध्य प्रदेश में भी कई वर्षों तक सरकार रही, तब किसने मना किया था कि जातिगत जनगणना मत कीजिए। आर्य ने आगे कहा कि जब सत्ता उनके खुद के हाथ में थी उस वक़्त क्यों जातिगत जनगणना नहीं हुई?

लाल सिंह आर्य ने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस का काम सिर्फ झूठे वादे करना, भ्रम फैलाना और वोट के लिए राजनीति करना है। हमेशा यही सब कांग्रेस के राज में होता आया है। 

पूर्व मंत्री ने तंज कसते हुए कहा कि अगर कांग्रेस कुछ काम कर लेती तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आयुष्मान कार्ड ना बनाना पड़ता, ना ही शौचालय बनवाना पड़ता और ना ही बैंक में खाते खुलवाने पड़ते। दलित और पिछड़ा वर्ग कांग्रेस के लिए सिर्फ वोट बैंक हैं।

अरुण यादव ने इस पर कहा कि मनमोहन सरकार के समय जनगणना का काम किया गया था, सिर्फ रिपोर्ट जारी करना ही बाकी रह गया था। पर पिछले 10 साल में भाजपा सरकार ने कुछ नहीं किया।

वहीं जातिगत जनगणना की मांग को लेकर वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर का बयान भी सामने आया है। श्रीधर का कहना है कि ये पूरी तरह वोट की राजनीति है। जिन भी वर्गों के लिए ये मांग की जा रही है उन वर्गों का हक़ इसमें कैसे संरक्षित होगा। उन्होंने आगे कहा कि अंबेडकर हमेशा चाहते थे कि पिछड़े समाज के या अलग-अलग समुदायों से आने वाले लोग मुख्यधारा में किसी के साथ भी मुकाबला कर सकें। आज ज़रूरत सिर्फ इस बात की है कि ऐसे लोगों की योग्यता को बढ़ाया जाए। श्रीधर के अनुसार जातिगत जनगणना बिलकुल भी ज़रूरी नहीं है। इस तरह की मांगों से समाज में बिखराव बढ़ता है।  

जाति के आधार पर आबादी की गिनती को जातीय जनगणना कहते हैं। किस वर्ग को कितनी हिस्सेदारी मिली, कौन वंचित रहा, जातीय जनगणना से इन सभी बातों का पता लगता है। जातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का भी पता चलता है। 

दिग्विजय सिंह ने BJP की आईटी सेल और बजरंग दल पर लगाए गंभीर आरोप, कही ये बात…

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पुलवामा हमले को लेकर जम्मू कश्मीर के पूर्व राज्यपाल रहे सत्यपाल मलिक (satyapal malik) के दिए गए बयान ने राजनैतिक सरगर्मियां बढ़ा दी हैं। मलिक के बयान का मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh) ने समर्थन किया है। दरअसल मलिक ने एक इंटरव्यू में पुलवामा हमले की एक वजह केंद्र सरकार की खामी बताया था।

सत्यपाल मलिक जम्मू कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने से पहले यहां के आखिरी राज्यपाल थे। जिस समय पुलवामा अटैक हुआ, उस वक्त भी मलिक राज्यपाल के पद पर थे। सत्यपाल मलिक के इंटरव्यू में दिए गए इस बयान के बाद एक बार फिर कांग्रेस मोदी सरकार पर निशाना साध रही है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सत्यपाल मलिक के बयान का समर्थन किया है। सिंह कहा कि पहले ही दिन इंटेलिजेंस फेलियर का खुलासा हो गया था। वहीं उन्होंने भाजपा सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि बीजेपी के आईटी सेल और बजरंग दल के लोग आईएसआई (ISI) से पैसे लेकर जासूसी करते हैं।

दिग्विजय ने राज्य सरकार पर भी निशाना साधते हुए कहा कि सतना में बजरंग दल का अध्यक्ष और भोपाल में ध्रुव सक्सेना के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। लेकिन देशद्रोह का मामला राज्य सरकार ने दर्ज क्यों नहीं किया? जमानत कैसे हो गई? इन सभी सवालों के सरकार को जवाब देना चाहिए।

मिशन 2023 : भाजपा ने संगठन को मज़बूत बनाने के लिए शुरू की छटनी

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मध्यप्रदेश में आगामी 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले दोनों ही मुख्य पार्टियां अपनी-अपनी तैयारियों में जुट गई हैं। जीत हासिल करने के लिए दोनों ही पार्टियों के संगठन खुद को मजबूत बनाने में लगे हैं। ऐसे में भाजपा ने जीत हासिल करने के लिए कसावट का दौर फिर शुरू कर दिया। चंद महीनों से भाजपा ने धीरे-धीरे करके चुनाव के हिसाब से छटनी शुरू की है।

जानकारी के अनुसार भाजपा के संगठन द्वारा 18 जिलाध्यक्षों को बदला है और 6 से ज्यादा जिलाध्यक्ष अब रडार पर हैं। 6 संभागीय प्रभारी भी खराब परफॉर्मेंस के कारण बदले गए हैं। ऐसा माना जा रहा है कि इनके बाद प्रदेश पदाधिकारियों की जिम्मेदारी भी जल्द बदली जाएगी। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा और संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा चुनावी रणनीति के हिसाब से संगठनात्मक ढांचे पर फोकस कर रहे हैं, और जिन्हें चुनाव लड़ना है या चुनाव लड़वाना है, उन्हें उसके हिसाब से जिम्मेदारी दी जाने की तैयारी की जा रही है।

आपको बता दें कि मई 2020 में 24 अध्यक्ष वीडी शर्मा द्वारा बनाए गए थे। 18 को शर्मा ने ही परफॉर्मेंस के आधार पर बदला था। लेकिन इस बार बदलने वाले अध्यक्षों को साधने का नया फॉर्मूला अपनाया गया है। जिन्हें हटाया है उन्हें प्रदेश कार्यसमिति में सदस्य बना दिया गया।

जानकारी के अनुसार भाजपा संगठन में ही अब दर्जनों चेहरे टिकट के दावेदार हैं। इन्हें साधना और टिकट देना या न देना चुनौती बन गई है। जिन 103 हारी सीटों पर प्रभारी बनाए गए हैं, उनमें दो दर्जन से ज्यादा खुद टिकट के लिए दावेदारी कर रहे हैं। ऐसे सभी प्रभारियों को लेकर संगठन ने नाराजगी जाहिर की थी।

वहीं जिलाध्यक्ष भी टिकट के दावेदार हैं। भोपाल से सुमित पचौरी और इंदौर से गौरव रणदीवे टिकट की दावेदारी में हैं। भाजपा के प्रदेश महामंत्री भगवानदास सबनानी, उपाध्यक्ष आलोक शर्मा, मीडिया प्रभारी लोकेंद्र पाराशर, प्रवक्ता डॉ. हितेश वाजपेयी, मंत्री राहुल कोठारी सहित कई अन्य नेता खुद टिकट के दावेदार हैं। एक ओर जहां संगठन के नेता टिकट के दावेदार हैं, तो दूसरी ओर ऐसे भी दर्जनों नेता हैं जो अभी हाशिये पर दिन गुजार रहे हैं, लेकिन अब संगठन में जिम्मेदारी चाहते हैं। इनके फेरे भी प्रदेश भाजपा नेतृत्व के यहां पर बढ़ गए हैं।

विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश कांग्रेस ने सीधा फॉर्मूला रखा है। यदि चुनाव लड़ना है तो संगठन का पद छोड़ो। इसे लेकर बीते महीनों में कई नेता संगठन की जिम्मेदारी से किनारा कर चुके हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने सर्वे, फीडबैक, जिताऊ चेहरे के आधार पर टिकट देने का ऐलान किया है। कांग्रेस जिलाध्यक्षों को चुनाव नहीं लड़ाएगी। संगठन पदाधिकारी को टिकट नहीं दिया जाएगा।

दरअसल कांग्रेस ने बीते दिनों 12 से ज्यादा जिलों में अध्यक्षों की नई नियुक्ति की है। इसके बाद भी 6 से ज्यादा जिलों में और बदलाव होने हैं। हर जिले में प्रभारी बनाकर फीडबैक लिया जा रहा है। इसी के आधार पर अध्यक्षों की परफॉर्मेंस देखी जा रही है। टिकट वितरण में प्रभारियों का फीडबैक अहम रहेगा।

क्या अब की बार बनेगी कांग्रेस की सरकार ? मिशन 2023 की तैयारियों में जुटी कांग्रेस

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भोपाल। मध्यप्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस पूरी शिद्दत से जुटी है। चुनावी तैयारी को लेकर पार्टी में बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया है। सोमवार को पीसीसी अध्यक्ष कमलनाथ की अगुवाई में राजनीतिक मामलों को लेकर बैठक हुई, जो करीब 2 घंटे से ज्यादा समय तक चली। चुनाव को लेकर इस बार कांग्रेस अलग रणनीति तैयार कर रही है।

इस बार कांग्रेस पूरी मुस्तैदी से सरकार को घेरने की तैयारी में है। इसी दिशा में सरकार की फ्लैगशिप योजना की कमियां वो जनता को बताएगी, साथ ही लाड़ली बहना योजना का काउंटर प्लान भी तैयार करेगी। इसके अलावा कमलनाथ ने नेताओं को अपने प्रभावी इलाकों में दौरे करने के निर्देश दिए हैं।

इस बैठक में कर्नाटक चुनाव के बाद अगले महीने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की विशाल जनसभा कराने की रणनीति भी तैयार की गई है। इसी दौरान कांग्रेस अपना वचन पत्र भी जारी कर सकती है। बैठक में मौजूद रहें पूर्व मंत्री जयवर्धन सिंह ने जानकारी देते हुए बताया कि बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने नेताओं से क्षेत्रवार जिम्मेदारी दिए जाने पर सहमति मांगी है। हालांकि नेताओं ने कार्यक्षेत्र मिलने पर पूरी जिम्मेदारी से उसे निभाने का भरोसा दिया है। जयवर्धन ने आगे बताया कि भाजपा के कई नाराज नेता हमारे अलग-अलग नेताओं के संपर्क में हैं।

इस बैठक के दौरान कमलनाथ ने कहा कि जल्द ही क्षेत्रवार नेताओं की जिम्मेदारी को तय करके सूची जारी की जाएगी और उसके अनुसार जिस नेता को जिस भी क्षेत्र की जिम्मेदारी मिलेगी उसे वहां पर कांग्रेस की जीत सुनिश्चित करनी होगी।

कांग्रेस ने चुनाव में बूथ कमेटी को लेकर एक नई रणनीति बनाई है। बूथ कमेटी में राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रदेश और जिला स्तर के नेता सदस्य होंगे। दरअसल, बूथ इकाई को मजबूत बनाने के लिए पार्टी ने यह नई गाइडलाइन जारी की है। हर स्तर के नेता अपने मतदाता वाले बूथ पर कमेटी के सदस्य होंगे।

कार्यकर्ताओं को साधने में लगी बीजेपी, सौंपी जा रहीं कई बड़ी ज़िम्मेदारियां

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भोपाल। मध्य प्रदेश में आगामी चुनाव को लेकर भाजपा अपने कार्यकर्ताओं पर नकेल कसना शुरू कर चुकी है। सरकारी निगम-मंडल, प्राधिकरण, आयोग सहित अलग-अलग सरकारी संस्थाओं में राजनीतिक नियुक्तियों के बाद अब संगठन में भी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को विभिन्न जिम्मेदारी देने का काम तीव्र गति से शुरू हो गया है।

जानकारी के अनुसार 17 अप्रैल को भाजपा ने राष्ट्रीय महासंपर्क अभियान के जिला संयोजक घोषित किए। इनमें कई पूर्व विधायकों को भी इस विभाग की कमान सौंपी गई है। भाजपा में 14 बड़े नेताओं को पूर्व विधायक सहित अन्य जनप्रतिनिधियों से बातचीत करने की बागडोर सौंपी है। ऐसा करना इसलिए भी ज़रूरी था क्योंकि भाजपा में कई बार कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का मामला सामने आया था, हालांकि अब पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को साधने में लगी है।

बता दें कि नाराज़ चल रहें कार्यकर्ताओं और पूर्व विधायकों को साधने के लिए भाजपा ने जिला स्तर पर कई बड़े बदलाव किए हैं ताकि चुनाव से पहले बगावत के सुर न सामने आ जाएं। चुनावी दृष्टि को देखते हुए यह बदलाव से संगठन अपने आप को बूथ स्तर पर मज़बूत बनाने में जुट रहा है। संगठन का मानना है कि उन लोगों को पद दिया गया है जो चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित करवा सकें और ईमानदारी से अपने काम को कर सकें।

वहीं बड़े नेताओं को इसलिए भी कमान सौपीं गई है जिसके चलते वे उन पूर्व विधायकों को साथ लेकर चल सकें ताकि चुनाव से पहले संगठन कमज़ोर न साबित हो। भाजपा अब तक धार, बालाघाट, जबलपुर, रायसेन, अनूपपुर, राजगढ़, ग्वालियर, कटनी, भिंड, गुना, अशोकनगर, झाबुआ, आलीराजपुर, सिंगरौली, शाजापुर, सीधी, डिंडोरी और आगर के जिलाध्यक्ष बदले जा चुके हैं। इससे पहले राजधानी भोपाल, जबलपुर, शहडोल, उज्जैन और चंबल संभाग के प्रभारी भी बदले गए थे।

विंध्य में किसकी खुलेगी किस्मत ! क्या तीसरी पार्टी मध्यप्रदेश में दिखा पाएगी अपना कमाल ?

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मध्यप्रदेश में चुनावी साल में भाजपा को बड़ा झटका लगा। भाजपा के विधायक और विंध्य के बड़े नेता माने जाने वाले नारायण त्रिपाठी ने हाल ही में अपनी अलग पार्टी बनाने का ऐलान किया। अलग पार्टी बनाने के अलावा नारायण त्रिपाठी ने विंध्य की 30 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का भी ऐलान कर दिया। नारायण त्रिपाठी के बयान के बाद सियासत शुरू हो गई है।

अगर देखा जाए तो विंध्य की राजनीति में नारायण त्रिपाठी वह नाम है जो सपा,कांग्रेस और भाजपा के टिकट पर पिछले चार चुनावों से विधानसभा पहुंचते रहे है। हालांकि नारायण त्रिपाठी पिछले कुछ समय से लगातार ही भाजपा से बागी तेवर अपनाए हुए थे। ऐसा माना जाता है कि नारायण त्रिपाठी की आस्था कभी एक पार्टी में नहीं रही है। विधायक नारायण त्रिपाठी साल 2003 में समाजवादी पार्टी के टिकट से विधायक बने थे। 2008 के चुनाव में सपा के टिकट से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें भाजपा प्रत्याशी के हाथों करारी हार मिली। जिसके बाद नारायण त्रिपाठी ने कांग्रेस का दामन थामा और 2013 के विधानसभा चुनाव में उन्हें टिकट मिला और त्रिपाठी चुनाव जीत गए।

जानकारी के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस से अजय सिंह राहुल को टिकट मिला तो वे फिर कांग्रेस के विरोधी हो गए। 2015 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और साल 2016 के विधानसभा के उपचुनाव में भाजपा के टिकट से चुनाव लड़कर जीत दर्ज की। फिर 2018 के चुनाव में भी वे भाजपा के टिकट से चुनाव जीते।

नारायण त्रिपाठी ने बीते मंगलवार को सतना में एक कार्यक्रम में अलग पार्टी बनाने का ऐलान करने के साथ जनता से कहा कि तुम मुझे 30 दो, मैं तुम्हें 2024 में विंध्य दूंगा। नारायण त्रिपाठी ने पार्टी के नाम का खुलासा करते हुए कहा विंध्य जनता पार्टी विंध्य की सभी 30 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी।

गौरतलब है कि नारायण त्रिपाठी ने पिछले लंबे समय से विंध्य प्रदेश की मांग कर रहे थे। 4 बार के विधायक नारायण त्रिपाठी की गिनती विंध्य के दिग्गज नेता के तौर पर होती है। हालांकि भाजपा विधायक नारायण त्रिपाठी के अलग से पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने का एलान के बाद अब भाजपा ने उनके खिलाफ कार्रवाई के संकेत दिए है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने कहा कि नारायण त्रिपाठी के मसले पर संगठन जल्द निर्णय लेगा।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने कहा कि ये लोकतंत्र है और चुनावी साल है। सभी को चुनाव लड़ने का अधिकार है। लेकिन, अगर हमारी पार्टी का कोई विधायक ऐसा करता है तो संगठन से बातचीत की जाएगी और जो भी फैसला होगा, वही आगे निर्णायक होगा। नारायण त्रिपाठी की विंध्य प्रदेश की मांग पर विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम का भी एक बयान सामने आया। उन्होंने कहा कि विंध्य प्रदेश की मांग बिलकुल बुरी नहीं है, कौन नहीं चाहता ऐसा हो। लेकिन बात ये है कि वाकई में ईमानदारी से विंध्य प्रदेश चाहते है या अपने आप को नेता बनाना चाहते है। हमारा विंध्य हमें लौटा दो इस बात का मतलब बहुत बड़ा है।विंध्य वापसी का मतलब दतिया को वापस लाना, रीवा में शामिल करना है। दतिया, छतरपुर, टीकमगढ़, निवाड़ी ऐसे कई जिले के लोग है। लेकिन लोग मना कर देते हैं कि हम नहीं जाना चाहते।

2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने विंध्य की 30 विधानसभा सीटों में से 27 सीटों पर जीत हासिल की थी। विंध्य में भाजपा की चली आंधी में कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह भी चुरहट विधानसभा से चुनाव हार गए थे। लेकिन इस बार विंध्य में भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे के मुकाबले के बीच आम आदमी पार्टी भी अ्पने पैर जमाने की तैयारियों में जुटी हुई है।

CM शिवराज ने PCC अध्यक्ष को बताया ‘पैसे वाला’, कमलनाथ ने किया पलटवार

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भोपाल। मध्यप्रदेश में आगमी विधानसभा चुनाव से पहले बयानों का सिलसिला जारी हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (CM Shivraj Singh Chouhan) ने पूर्व सीएम कमलनाथ (Kamal Nath) को लेकर एक बार फिर बयान दिया है। इस बार उन्होंने कमलनाथ को बड़ा उद्योगपति बताया है।

सीएम ने बिना नाम लिए कमलनाथ पर बड़ा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि उनके पास हवाई जहाज, हेलीकॉप्टर, दौलत-संपत्ति इसलिए वो मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार, ये बात कांग्रेस के लोग खुद कह रहे है। लेकिन मेरे पास जनता का प्यार है।

शिवराज सिंह ने आगे कहा कि कांग्रेस अगर इस पैमाने पर अपना नेता तय करती है तो वो करती रहे। लोकतंत्र में यह मापदंड किसी भी नेता को चुनने का नहीं हो सकता।

वहीं मुख्यमंत्री शिवराज के उद्योगपति वाले बयान पर पीसीसी अध्यक्ष कमलनाथ ने पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि सीएम शिवराज का बिना झूठ बोले खाना हजम नहीं होता है। मेरा कोई उद्योग नहीं, मैं किसी कंपनी का मालिक नहीं हूं।

कमलनाथ ने सवाल खड़ा करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री बताएं कौन सा उद्योग मेरा है। उन्हें मेरे खिलाफ कुछ नहीं मिला तो मुझे उद्योगपति बता दिया। शिवराज जी जवाब दें कि मैं किस कंपनी का मालिक हूं।

MP के आगामी विधानसभा चुनाव से पहले महिलाओं को साधने में जुटी कांग्रेस, बनाई अलग रणनीति

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मध्यप्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव का शंखनाद बज चुका है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही मुख्य पार्टियां अपने हिसाब से वोटरों को साधने में जुट गई हैं। इसी कड़ी में कांग्रेस ने महिलाओं को साधने के लिए अनोखा कदम उठाया है। एमपी कांग्रेस पहली बार महिलाओं के लिए अलग से वचन पत्र तैयार कर रही है।

जानकारी के अनुसार इस वचन पत्र में महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह देने, 500 रुपये में रसोई गैस सिलेंडर उपलब्ध कराने के वचन के साथ उनके परिवार पर महंगाई का बोझ कम करने के लिए 300 रुपये में 300 यूनिट बिजली देने और स्वरोजगार के लिए अलग से योजना लागू किए जाने की घोषणा करने का वादा किया है।

सूत्रों ने बताया कि इसे कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री प्रियंका गांधी वाड्रा से मई-जून में प्रस्तावित महिला रैली में जारी कराया जाएगा। इसके लिए उनसे समय मांगा गया है।

मीडिया अध्यक्ष केके मिश्रा ने बताया कि 50 फीसदी आबादी महिलाओं की है। कांग्रेस की सरकार में उन्हें सम्मान और अधिकार प्राप्त हों, इसके लिए कमलनाथ नए अंदाज़ के साथ चुनावी मैदान में उतरना चाह रहे हैं।

जानकारी के अनुसार कांग्रेस ने 2018 के चुनाव में भी वचन पत्र जारी किया था, जिसमें महिलाओं के लिए कई प्रावधान रखे थे, लेकिन इस बार महिलाओं के लिए अलग से वचन पत्र जारी करना तय किया गया है।

बताया जा रहा है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के साथ प्रारंभिक चर्चा भी हो चुकी है। इसमें महिलाओं को स्वरोजगार के लिए ब्याज मुक्त ऋण, रिक्त पदों पर प्राथमिकता के आधार पर भर्ती सहित अन्य प्रावधान किए जा रहे हैं।

दलित के दिल में कौन ! एमपी विधानसभा चुनाव में किसके साथ जाएंगे एससी वोटर्स ?

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भोपाल। मध्यप्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सियासत गरमा गई है। यहां दलित राजनीति केंद्र में है। सभी सियासी दल प्रदेश में 17 फीसदी वोट बैंक की हिस्सेदारी रखने वाले दलितों को साधने में जुटे हैं। अंबेडकर जंयती के बहाने भाजपा और कांग्रेस दोनों ही खुद को दलित हितैषी साबित करने में जुटी दिखाई दीं।

संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अंडेकर की 132वीं जयंती पर मध्यप्रेश में सियासी दलों के आयोजनों की होड़ लगी रही। बाबा साहेब की जन्मस्थली इंदौर के महू में सियासी नेताओं का जमावड़ा लगा रहा। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ, सपा मुखिया अखिलेश यादव और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने महू पहुंचकर बाबा साहेब की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया।

बाबा साहब की जयंती के दिन प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ने महू में कई बड़े ऐलान करने के साथ बाबा साहेब से जुड़े पंचतीर्थ, जन्मभूमि महू, शिक्षाभूमि लंदन, दीक्षाभूमि नागपुर, महापरिनिर्वाण भूमि दिल्ली और चैत्यभूमि मुंबई को मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन में जोड़ने की घोषणा की। हालांकि सीएम की घोषणा के बाद आए सरकार के आदेश पर कांग्रेस ने कई सवाल खड़े किए।

मध्यप्रदेश के राजनीतिक तेवर की बात करें तो प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस खुद को भले ही दलित हितैषी बताते हों लेकिन अब तक दलित मुख्यमंत्री नहीं बनने पर सवाल उठते रहे हैं। प्रदेश में दलित नेताओं की एक लंबी कतार है लेकिन इनमें से किसी भी चेहरे को मुख्यमंत्री बनने की रेस में नहीं माना जाता है।

राजनीतिक पंडितों की मानें तो भाजपा में कई ऐसे दलित चेहरे हैं जो प्रदेश के साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी अपना वर्चस्व रखते हैं। इनमें टीकमगढ़ से भाजपा सांसद वीरेंद्र खटीक एक ऐसे दलित चेहरे हैं जो मोदी सरकार में मंत्री हैं। ग्वालियर-चंबल से आने वाले लाल सिंह आर्य भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष है। मालवा से आने वाले सत्यनारायण जटिया भाजपा संसदीय बोर्ड में शामिल हैं तो वहीं सुमित्रा बाल्मिकी को भाजपा ने हाल में ही राज्यसभा भेजा है।

वहीं कांग्रेस में भी दलित नेताओं की एक लम्बी-चौड़ी फेहरिस्त है। कांग्रेस के दलित चेहरों में पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा, विजय लक्ष्मी साधौ और एनपी प्रजापति जैसे दिग्गज नाम शामिल थे। इसके साथ ही फूल सिंह बरैया और देवाशीष जाररिया भी शामिल हैं।

2018 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की कुल 35 आरक्षित सीटों में से 18 पर कांग्रेस के दलित चेहरों ने जीत हासिल की थी। खास बात यह है कि दलित बाहुल्य वाले ग्वालियर-चंबल में कांग्रेस ने आरक्षित 7 सीटों में से 6 पर अपनी जीत हासिल की थी।

जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश में चुनावी साल में दलितों को साधना सियासी दलों के लिए महत्वपूर्ण है। 17 फीसदी वोट बैंक वाले दलित वोटर चुनाव में गेम चेंजर की भूमिका निभाते हैं। 80 लाख से अधिक दलित वोटर वाले 230 विधानसभा सीटों में से 35 सीटें अनुसूचित जाति वर्ग (दलित) के लिए आरक्षित है, और 84 विधानसभा सीटों पर दलित वोटर जीत-हार तय करते हैं।

दिग्विजय सिंह के बयान पर सीएम शिवराज सिंह का पलटवार, जनता को डराना चाहती है कांग्रेस: शिवराज

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पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के हाल ही में दिए बयान को लेकर सियासी गरमा-गरमी शुरू हो गयी है। दिग्विजय सिंह के मुस्लिमों की अपेक्षा हिंदुओं की आबादी अधिक होने वाले बयान पर सीएम शिवराज ने पलटवार किया है। उन्होंने कहा दिग्विजय सिंह कह रहे थे कि हिंदुओं के मुकाबले मुस्लिमों की संख्या कम हो रही है, तो कुछ दिन पहले कमलनाथ कह रहे थे कि दंगे भड़क रहे हैं। मप्र में शांति बरकरार है तो चुनाव के समय इस तरह के बयान देकर क्यों लोगों को डराना चाहते हो आप लोग।

मध्यप्रदेश के सागर जिले में पूर्व सीएम और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने बयान दिया था कि हिंदुओं के मुकाबले मुसलमानों की आबादी कम है। उन्होंने यह भी कहा था कि बीजेपी और संघ यह दुष्प्रचार करती है कि मुसलमानों की आबादी तेजी से बढ़ रही है जो कि सरासर गलत है।

दिग्विजय ने कहा था कि मैं प्रमाणिकता के साथ इस बात को साबित कर सकता हूं कि हिंदुओं की आबादी मुसलमानों के मुकाबले तेजी से बढ़ रही है, और कहा कि जनगणना को लेकर हमारा स्टैंड साफ है कि जनगणना ओबीसी आधारित और राष्ट्रीय स्तर पर होनी चाहिए।