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कोहिनूर नहीं लाना है तो निवेश, कालाधन और दाऊद को लाए मोदी सरकार

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Newbuzzindia: तीन असंबद्ध, अलग विषय। किन्तु एक ही पाठ पढ़ा रहे हैं। कि जल्दबाज़ी बहुत ही बुरी होती है। कहा जा सकता है कि हम सभी इस कालजयी कहावत को जानते हैं, इसमें नया क्या है? यही समझने का प्रयास है कि हम जानते तो हैं, किन्तु मानते नहीं। और इसीलिए ज़ल्दबाज़ी करते चले जाते हैं। पिछला सप्ताह कोहिनूर हीरे से दमकता रहा। देश की विरासत को वापस लाने से सुप्रीम कोर्ट में सरकार के इनकार से काफी हल्ला मचा। और चौबीस घंटे में सरकार ने कहा कि वह हीरा वापस लाएगी।

ऐसा क्यों हुआ?
केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल ने वैसा जवाब सुप्रीम कोर्ट में दे दिया था। कि महाराजा रणजीत सिंह के वंशज ने कोहिनूर ब्रिटिश राजघराने को भेंट किया था। अब आप सोचिए, क्या सॉलिसिटर जनरल ऐसा कह सकते हैं? और यदि किया, तो यह घातक जल्दबाज़ी ही तो हुई।

वास्तव में सॉलिसिटर जनरल ने ऐसा तथ्य पेश करने में कोई जल्दबाज़ी नहीं की थी। वे तो 1956 के पं. नेहरू के मत को ही केन्द्र सरकार के अधिकृत मत के रूप में व्यक्त कर रहे थे। जिसमें कहा गया था कि उपहार में दिया गया हीरा वापस मांगना अनुचित होगा। जल्दबाज़ी तो यह थी कि सॉलिसिटर जनरल ने तत्काल सारी जानकारी पेश कर दी। वर्तमान सरकार से पूछे बग़ैर। क्योंकि यदि पूछते तो पाते कि मोदी सरकार उल्टा पक्ष रखती। कहती कि भले ही पं. नेहरू ने ऐसा तय किया था- किन्तु हम इसे, ‘भारत का गौरव’ मानकर वापस लाएंगे।

यदि पूछते तो मोदी सरकार यह भी तथ्य सुप्रीम कोर्ट को बताती कि कैसे वह 10वीं शताब्दी की दुर्लभ दुर्गा प्रतिमा जर्मनी से वापस लाई। फिर उसने कैनेडा से 400 वर्ष पुरानी ‘पैरेट लेडी’ शिल्प प्राप्त किया। अॉस्ट्रेलिया से भी देवी-देवताओं की प्राचीन मूर्तियां वापस लीं। यह, सॉलिसिटर जनरल के कथन के बाद प्रचारित भी किया गया। 

प्रश्न हालांकि और भी हैं।
चाहिए किसे कोहिनूर?

लाना ही है मोदी सरकार को, तो विदेश और देश से भी, निवेश लाए। 
लाना ही है मोदी सरकार को, तो नौकरियां लाए।

और विदेश में मौजूद यदि हमारे यहां से गया हुआ, भेजा हुआ कुछ ला सकती है मोदी सरकार, तो हजारों करोड़ का काला धन वापस लाए।
और, हत्यारों-हमलावरों की एक पूरी पंक्ति बसी-बसाई है पाकिस्तान, दुबई या कि ऐसे ही किसी देश में। दाऊद इब्राहिम को खींचकर लाए। पैसे लेकर, बांटकर खून बहाने वाले कई हैं लखवी या मसूद या दाऊद गिलानी हेडली।

इन्हें वापस लाए।
जल्दबाज़ी न करें, किन्तु यहां भी।
जल्दी कर सकें, तो बेहतर होगा।
जल्दी और जल्दबाज़ी में महीन किन्तु स्पष्ट अंतर है।
जल्दी में गति है।
जल्दबाज़ी में दुर्गति है।
जल्दी का अर्थ तत्काल करना है।
जल्दबाज़ी तात्कालिक है।

जैसे, कोहिनूर (यदि भेंट किया गया हो तो) जल्दबाज़ी थी। उस समय का -तात्कालिक लाभ को ध्यान में रखते हुए- लिया निर्णय था। जिसमें निश्चित ही बहुत सारे स्वर शामिल नहीं होंगे।
किन्तु कोहिनूर को सीधे ब्रिटेन पहुंचाया या कि ब्रिटिश ताज में जड़ देना -जल्दी उठाया कदम था। कारोबारी बनकर आए धूर्त ब्रितानी समझते थे कि यह भारी-भरकम नायाब हीरा कल भावनाओं को आहत करने का कारण बनेगा।

एक जल्द फैसला रोचक भी है।
ब्रिटेन ने इसे ‘अशुभ’ मानते हुए टावर ऑफ लंदन में रखवा दिया। और राजघराने ने तय किया कि केवल महारानियां ही इसे पहनेंगी! रोचक इसलिए कि हो सकता है, इतने बड़े हीरे को राजा-युवराज अपने पास रख लें -और महारानी इसे कभी पा ही न सके- ऐसी आशंका से तो उनकी महारानी द्वारा कहीं इसे ‘अशुभ’ प्रचारित नहीं किया गया! एक जल्दी में किया गया प्रचार -और संभवत: जल्दबाज़ी में पाया गया निर्णय।

कोहिनूर के लिए, किन्तु हमें कोई न जल्दी है। न जल्दबाज़ी।
कोहिनूर आ भी जाए तो क्या? म्यूज़ियम में रखा जाएगा।
अब बात पीएफ की।

बजट में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने पीएफ को लेकर बड़ी ग़लतियां की थीं। टैक्स तो जल्दबाज़ी में लगाया था। फिर वापस लेना पड़ा भारी रोष के कारण। यहां उन्हें जल्दी करना चाहिए था निर्णय। जो उन्होंने नहीं किया। और इस तरह वेतन पाने वाले देश के महत्वपूर्ण मध्यम वर्ग को उन्होंने भारी नाराज़ कर दिया। 

एक जल्दबाज़ी तब की थी। फिर पीएफ को लेकर की गई नई जल्दबाज़ी का और नुकसान उन्होंने पिछले पखवाड़े में झेला। 
नए नियमों के अंतर्गत उन्होंने पीएफ निकालने पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। 58 वर्ष की उम्र से पहले नहीं निकाल सकते। नौकरी चली जाने या छोड़ने के बाद ‘बिटविन द जॉब्स’ यानी नई नौकरी पाने से पहले के समय में रकम नहीं निकाल सकते आदि। 

भारी आक्रोश के बाद मोदी सरकार को इसे भी वापस लेना पड़ा। 
वापस जल्दी लेना चाहिए था। क्योंकि इस बीच देश को भारी उग्र प्रदर्शन, हिंसक वातावरण  का सामना करना पड़ा। 

प्रश्न यह है कि लोगों के बचत के पैसे पर सरकार का अधिकार ही कैसे है? फूटी कौड़ी की सुविधाएं छोटी बचत के लिए सरकार दे नहीं रही। एक नियम, एक रुपए तक का लाभ किसी बचत के लिए ला नहीं रही। कोई प्रोत्साहन है ही नहीं। फिर जब आप कुछ दे नहीं सकते, तो लेने-छीनने और रोक लगाने का गलत अधिकार कहां से ले आए?

और देश में दो तरह के मापदण्ड, दोहरे भेदभाव वाले नियम कैसे हो सकते हैं? तनख्वाह पाने वाले सरकारी तो सवा सौ-डेढ़ सौ प्रतिशत की वेतनवृद्धियां लें -और उन्हें उनके जीपीएफ पर न कोई टैक्स का प्रावधान कभी प्रस्ताव तक के रूप में न झेलना पड़े। जबकि निजी क्षेत्र में तनख्वाह पाने वालों को उन्हीं के पैसे बच्चों की शादियां, घर बनाने और कोई आपात स्थिति में निकालने तक पर रोक लगे- ऐसा कैसे हो सकता है?

स्पष्ट है, जेटली ने बगैर प्रभावित पक्षों की दलील सुने, जल्दबाज़ी में ऐसा फैसला कर लिया। और बहुत ही बुरे परिणाम सामने आए। 
ताज़ा मामला उत्तराखंड की खंडित राजनीति का है। 
रातोरात मोदी मंत्रिमंडल ने एक आपात बैठक बुलाकर वहां राष्ट्रपति शासन लागू किया था। कांग्रेस की हरीश रावत सरकार बगावत के बाद वहां अल्पमत में आ गई थी। नौ विधायकों को अयोग्य करार देने के बाद भारी नाटकीय स्थितियों में हर कदम जल्दबाज़ी भरा लिया गया। 

इसी कारण हाईकोर्ट ने राष्ट्रपति शासन रद्द करते हुए भारी फटकार लगाई। 
किन्तु सुप्रीम कोर्ट ने उस पर रोक लगा दी।

क्योंकि यहां कारण रावत की जल्दबाज़ी थी। हाईकोर्ट के जिस फैसले में रावत को पुन: मुख्यमंत्री बनाने की बात कही गई थी उसकी प्रति प्राप्त किए बग़ैर ही रावत ने मुख्यमंत्री पद का काम संभाल लिया। देर रात मंत्रिमंडल बैठक की। 

कई फैसले भी ले लिए। 
प्रश्न यह उठता है कि जो कुछ फैसले लिए गए, वे यदि उतने ही आवश्यक थे, तो उन्होंने मुख्यमंत्री रहते क्यों नहीं लिए? 

सरकार बचाने के लिए करोड़ों की खरीद करने के प्रयास के आरोप -कैमरे में दर्ज स्टिंग- के बाद रावत हाईकोर्ट से लौटें या कि सदन में बहुमत सिद्ध कर, उनकी विश्वसनीयता पर संदेह नहीं हटेगा। जैसे कि सुप्रीम कोर्ट से रोक मिल भी गई हो, मोदी सरकार क्यों धारा 356 में इंदिरा गांधी शैली में विरोधी सरकारें बर्खास्त करने पर लौट रही है, यह प्रश्न बना ही रहेगा। 

जल्दबाज़ी करने में जितना कम समय लगता है – उतना ही लम्बा समय जल्दबाज़ी के कारण पछतावे में लगाना पड़ता है। 
जहां हमें जल्दी करनी हो, वहां हम जल्दी करें – असंभव है। किन्तु करनी ही होगी। जल्दबाज़ी रोकना असंभव है। किन्तु रोकनी ही होगी। 

हम इन्सान हैं। 
जल्दबाज़ी का काम किसका है, यह अलग से लिखने की अावश्यकता नहीं है।

ये लेख कल्पेश याग्निक (दैनिक भास्कर) द्वारा लिखा गया है ।

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मिशन कोहेनूर : नरेंद्र मोदी ने तैयार किया मास्टर प्लान , भारत वापिस लाएंगे कोहेनूर !

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Newbuzzindia: कोहिनूर की वापसी को लेकर उठे हालिया विवाद के बीच सरकार ने साफ किया कि वह कोहिनूर की वापसी चाहती है, लेकिन ब्रिटेन के साथ आपसी संबंधों व सहमति के साथ। इतना ही नहीं, सरकार चाहती है कि संसद में इस बारे में चर्चा हो।

सरकार की योजना है कि कोहिनूर को लेकर देश की जनता के सामने जहां तस्वीर साफ हो। दूसरी ओर, वह देश को बताना चाहती है कि उससे पहले किसी सरकार ने इसे लाने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया।

सरकार कूटनीतिक व राजनैतिक कोशिशों के जरिए मिशन कोहिनूर पर आगे बढ़ना चाहती है। सूत्रों के मुताबिक, इस मिशन में खुद पीएम की दिलचस्पी है। इसके लिए वह खुद अपने तौर पर भी प्रयासरत बताए जाते हैं।

होमवर्क में जुटा मंत्रालय सरकार का संस्कृति मंत्रालय इन दिनों को कोहिनूर को लेकर होमवर्क करने में व्यस्त है। इसे लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को 6 हफ्ते का वक्त दिया है। सरकार जहां एक ओर कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करने के लिए विभिन्न स्रोतो से जानकारी जुटा रही है।

वही, यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इसे लेकर भारत सरकार की ओर से पिछला प्रयास कब-कब हुआ था और तत्कालीन सरकार का क्या रुख था।

बताया जा रहा है कि सरकार की दलील उस कानून पर आधारित होगी, जिसमें किसी नाबालिग द्वारा किसी को उपहार देने का अधिकार नहीं है। सरकार आजादी से पहले वाले और मौजूदा ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी ऐक्ट के तहत आने वाले गिफ्ट डीड को आधार बनाने की योजना बना रही है।

अपने हलफनामे में सरकार यह दिखाने की कोशिश करेगी कि राजा दिलीप सिंह से यह कोहिनूर हीरा अंग्रेजों के पास गया तो उस वक्त वह नाबालिग थे। इसलिए अगर उन्होंने हीरा स्वेच्छा से दिया या उन पर दबाव डाल कर लिया गया हो, लेकिन उनके पास कानूनी तौर पर इसका अधिकार नहीं था।

कांग्रेस को घेरेगी बीजेपी

बीजेपी सरकार इस मामले में कांग्रेस को घेरने की तैयारी में है। उसकी कोशिश है कि वह देश के सामने यह बात रख सके कि पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर में कांग्रेस की बहुमत वाली सरकार होने के बावजूद कभी भारत की ओर से कोहिनूर की वापसी को लेकर कोई गंभीर कोशिश नहीं हुई।

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बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने की राजीव गांधी की तारीफ , बोले राजीव गांधी फिरसे बनते प्रधानमंत्री तो बन जाता राम मंदिर !

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Newbuzzindia: नेहरू-गांधी परिवार के घोर आलोचक भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने अयोध्या विवाद के समाधान के लिए प्रयासों के लिए दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सराहना की और कहा कि कांग्रेस नेता अगर दोबारा प्रधानमंत्री निर्वाचित होते तो राम मंदिर का निर्माण हो गया होता।

उन्होंने यहां ‘अयोध्या में श्रीराम मंदिर क्यों और कैसे’ विषय पर संगोष्ठी को संबोधित करते हुए रविवार को कहा, ‘मैं राजीव गांधी को बहुत अच्छी तरह जानता था। अगर वह दोबारा प्रधानमंत्री बनते तो उन्होंने उसी स्थान पर (जहां विवादास्पद बाबरी मस्जिद था) राम मंदिर का निर्माण करा दिया होता।’

उन्होंने कहा, ‘उन्होंने राम मंदिर (बाबरी मस्जिद) का ताला खुलवा दिया था और राम मंदिर के लिए शिलान्यास कार्यक्रम की अनुमति दे दी थी।’ भाजपा नेता ने कहा कि राजीव गांधी ने ‘रामराज्य की अवधारणा को लागू करना’ शुरू किया था लेकिन उनके असामयिक निधन से चीजें बदल गईं।

स्वामी ने नेशनल हेराल्ड मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी को अदालत में घसीटा है। स्वामी ने कहा कि वह उच्चतम न्यायालय में रोजाना आधार पर बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मामले की सुनवाई किए जाने के लिए आम सहमति बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

स्वामी ने दावा किया कि उन्होंने मामले में शामिल मुस्लिम नेताओं से प्रस्ताव पर चर्चा की थी और सिद्धांत रूप में वो सहमत भी हो गए थे। हालांकि, जब अदालत में प्रस्ताव का समर्थन करने की बारी आई तो वो ‘चुप’ रह गए।

भाजपा नेता ने कहा कि उच्चतम न्यायालय का आखिरी फैसला अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ करेगा। उन्होंने कहा कि निर्माण कार्य मौजूदा साल के आखिर में शुरू हो सकता है।

यह पूछे जाने पर कि देश को स्कूल, अस्पताल, सड़क और शौचालयों की अधिक आवश्यकता है या राम मंदिर की तो उन्होंने कहा, ‘यह (विकास) सरकार का काम है और सरकार सही तरीके से काम कर रही है। सरकार उसका खयाल रखेगी। मुझे मेरा काम (मंदिर निर्माण के लिए प्रयास का काम) करने दें।’

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प्रधानमंत्री मोदी की सऊदी अरब यात्रा बिगड़ेगी पकिस्तान का खेल..

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Newbuzzindia: भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया सऊदी अरब यात्रा ने पाकिस्तान का खेल खराब कर सकते हैं, ये मानना है अमरीकी विशेषज्ञ का। इस संबंध में एक शीर्ष अमरीकी विशेषज्ञ का कहना है कि इससे पाकिस्तान को परेशानी हो सकती है क्योंकि आर्थिक और रणनीतिक अवसर भारत को तेल समृद्ध खाड़ी देश के करीब ला रहे हैं।

अमरीकी थिंक टैंक इंडिया इनिशिएटिव आफ दी हडसन इंस्टीट्यूट की अपर्णा पांडे ने कहा, ‘‘सालों तक सऊदी अरब को एक प्रमुख सहयोगी और आर्थिक मददगार मानने वाले पाकिस्तान को अब लग सकता है कि वह अपने प्रतिद्वंद्वी भारत के हाथों अपने इस संरक्षक को खो रहा है। मोदी पिछले सप्ताह सरकारी यात्रा पर रियाद पहुंचे थे और इस यात्रा का राजनयिक महत्व था।’’

उन्होंने कहा कि मोदी की यात्रा और उनका गर्मजोशी से किया गया स्वागत पाकिस्तानी नेताओं को यह याद दिलाता है कि अंतर्राष्ट्रीय संबंध राष्ट्रीय हितों पर टिके होते हैं, केवल धर्म आधारित विचारधारा पर नहीं।’’

पांडे ने कहा, ‘‘आर्थिक और रणनीतिक मुद्दे भारत और सऊदी अरब को करीब ला रहे हैं, वैसे ही जैसे ये दोनों क्षेत्र भारत और अन्य देशों के संबंधों को आगे बढ़ा रहे हैं।’’  उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी भारत और पाकिस्तान के बीच हमेशा संघर्ष को ही देखते हैं और एेसे में यह स्पष्ट रूप से भारत की जीत है।

इस यात्रा के दौरान शाह सलमान बिन अब्दुल अजीज ने मोदी को देश का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘द किंग अब्दुल अजीज आर्डर’ प्रदान किया था। पांडे ने कहा कि सहायता के रूप में अरबों डालर देने और पाकिस्तानियों को बड़े पैमाने पर रोजगार देने के बावजूद सऊदी अरब ने कभी भी किसी पाकिस्तानी नेता को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रदान नहीं किया।

पांडे ने कहा कि वर्ष 2014-15 में 39.4 अरब डालर के द्विपक्षीय कारोबार के साथ भारत और सउदी अरब आर्थिक रूप से एक दूसरे के लिए काफी महत्वपूर्ण हो गए हैं। इसके विपरीत पाकिस्तान और सउदी अरब के बीच कारोबार मात्र 6.1 अरब डालर का है।  

भारत के लिए सउदी अरब उसके तेल आयात का मुख्य स्रोत है जो भारत की वार्षिक तेल मांग के पांचवें हिस्से की आपूर्ति करता है। उधर, सउदी अरब के लिए चीन, जापान, अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बाद भारत उसका पांचवां सबसे बड़ा उपभोक्ता है। पांडे साथ ही कहती हैं कि पाकिस्तान इस विकास को एक खतरे के तौर पर देख सकता है ।   उन्होंने कहा, ‘‘ या यह भी हो सकता है कि वह भारत के प्रति अपनी धारणा को बदले और उन आर्थिक तथा रणनीतिक अवसरों का लाभ उठाए जिनके चलते भारत उसके पुराने मित्र का वांछित सहयोगी बन रहा है।’’ 

मोदी शनिवार को अपनी दो दिवसीय यात्रा पर सउदी अरब आए थे। वर्ष 1956 में जवाहरलाल नेहरू, 1982 में इंदिरा गांधी और वर्ष 2010 में मनमोहन सिंह के बाद मोदी सउदी अरब की यात्रा पर जाने वाले चौथे भारतीय प्रधानमंत्री हैं।

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जो “भारत माता की जय” नही कहेगा उसे देश में रहने का हक नही : देवेन्द्र फडणवीस

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Newbuzzindia: “भारत माता की जय” और राष्ट्रवाद पर देशभर में चल रही बहस के बीच महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है कि जो ‘भारत माता की जय’ नहीं कह सकते, उन्हें देश में रहने का अधिकार नहीं है।

देवेन्द्र फडणवीस ने कल रात यहां एक जनसभा में कहा,‘‘भारत माता की जय कहने पर अब भी विवाद है और जो इसे कहने के विरोध में है, उन्हें यहां रहने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। यहां रहने वाले लोगों को ‘भारत माता की जय’ कहना चाहिए।’’ 

देवेन्द्र ने राष्ट्रविरोधी नारे लगाने वालों का समर्थन करने पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की भी आलोचना की। फडणवीस ने कहा कि विपक्षी दलों को भाजपा के खिलाफ अपनी आवाज उठानी चाहिए, लेकिन ‘भारत माता की जय’ का विरोध नहीं करना चाहिए।

देवेन्द्र ने आगे कहा कि देश की जनता यह सब बर्दाश्त नहीं करेगी। कुछ पूजा स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रही बहस पर फडणवीस ने कहा कि हिंदू संस्कृति के अनुसार लिंग या जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है और इसलिए किसी मंदिर में महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित करना उचित नहीं है। 

मुख्यमंत्री ने कहा है की राज्य सरकार इस मुद्दे पर बंबई उच्च न्यायालय में पहले ही बयान दे चुकी है और आने वाले समय में महिलाओं के मंदिरों में प्रवेश से नहीं रोका जाएगा। फडणवीस ने किसी पार्टी या नेता का नाम लिए बिना कहा कि कुछ लोग अलग विदर्भ, मराठवाड़ा और शेष महाराष्ट्र को लेकर विवाद पैदा कर रहे हैं।

गौरतलब है की मराठवाड़ा क्षेत्र के लिए नासिक बांध का पानी छोडऩे पर विरोध प्रदर्शन को लेकर फडणवीस ने कहा कि राज्य में इस क्षेत्र की जनता प्यासी है, इसलिए उन्हें पानी देना हमारा कर्तव्य है। पिछली राज्य सरकार के कुछ पूर्व मंत्रियों के खिलाफ जांच की आेर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी सरकार की लड़ाई भ्रष्टाचार और भ्रष्ट प्रवृत्तियों से है। जिन्होंने राज्य का खजाना लूट लिया, सरकार उन्हें नहीं छोड़ेगी।

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यूपी में फिर उठी प्रियंका गांधी को मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार बनाने के मांग ।

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चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर यूपी में होने वाली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की कमान संभालेंगे. खबरों के अनुसार उन्होंने प्रियंका गांधी को यूपी के सीएम उम्मीदवार के रूप में पेश करने का सुझाव दिया था.

प्रशांत किशोर के सुझाव की खबर के बाद राज्य के कांग्रेसी नेता भी जोरशोर से इस मांग को उठाने लगे हैं. वहीं दूसरी ओर विपक्षी नेता प्रियंका के आने से यूपी कांग्रेस की स्थिति में किसी बड़े परिवर्तन की संभावना से इनकार करते हैं.

हाल ही में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने अपने लखनऊ दौरे में कहा था कि अगर प्रियंका गांधी सक्रिय राजनीति में आती हैं तो इससे पार्टी को बड़ा लाभ होगा.

दिग्विजय ने ये भी कहा कि कांग्रेस के हर ज़मीनी कार्यकर्ता की यही इच्छा है. यहां तक की यूपी कांग्रेस के नेता भी लगभग हाथ जोड़े इसकी मांग कर रहे हैं.

व्यर्थ है “भारत माता की जय” पर की जा रही बहस : लाल कृष्ण अडवाणी

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Newbuzzindia: “भारत माता की जय” पर की जा रही जोरदार बहस के बीच भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा कि इस नारे पर विवाद व्यर्थ है। आडवाणी ने गांधीनगर में एक कार्यक्रम से इतर कहा कि मैं इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता। यह एक व्यर्थ विवाद है। दरअसल उनसे इस मुद्दे पर टिप्पणी करने को कहा गया था, जिस पर उन्होंने यह कहा।

हाल ही में असाद्दुदीन ओवैसी ने भारत माता की जय कहने से इनकार करते हुए कहा था कि वह ऐसा करने के लिए संविधान द्वारा आबद्ध नहीं हैं। इस बयां पे ही आडवाणी का बयान आया है। ओवैसी के बयान से पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि युवकों को देशभक्ति के नारे सिखाए जाने चाहिए।

अब ये मुद्दा एक राजनीतिक छींटाकशी में तब्दील हो गया। शिवसेना, भाजपा और अन्य पार्टियों ने उनके रूख को लेकर हैदराबाद के सांसद की आलोचना की जबकि मध्य प्रदेश विधानसभा ने ओवैसी के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया। 

गांधीनगर से लकसभा जीतने वाले आडवाणी ने सांसद निधि कोष के उपयोग के बारे में आज स्थानीय पार्षदों और विधायकों के साथ एक समीक्षा बैठक की।

आडवाणी ने कहा कि मैंने गांधीनगर स्थानीय निकाय के निर्वाचित सदस्यों ओर इलाके के विधायकों के साथ एक बैठक की ताकि सांसद निधि के उपयोग का जायजा लिया जा सके जो सांसदों को अपने इलाकों में विकास कार्य करने के लिए दिया जाता है। भाजपा नेता ने कहा कि वह विकास कोष के उपयोग से खुश हैं।

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हिंदू धर्म और सांप्रदायिकता का घालमेल कर रहे हैं भाजपा-संघ

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माकपा ने भाजपा और आरएसएस पर आरोप लगाया कि वे ‘‘तुच्छ राजनीतिक फायदे’’ की खातिर हिंदू धर्म और सांप्रदायिकता का घालमेल कर रहे हैं, जो समाज के लिए खतरनाक है। माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने यह आरोप भी लगाया कि मोदी सरकार आर्थिक मोर्चे पर नाकाम रही है जिससे कृषि एवं औद्योगिक उत्पादन में गिरावट आई है।

माकपा के दिवंगत प्रमुख हरकिशन सिंह सुरजीत की जन्मशती के मौके पर एक व्याख्यान में येचुरी ने कहा, ‘‘भाजपा और आरएसएस आज अपने तुच्छ राजनीतिक फायदे की खातिर हिंदू धर्म और सांप्रदायिकता का घालमेल कर रहे हैं, जो समाज के लिए खतरनाक है।’’

उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन ने सांप्रदायिकता एवं आरएसएस की विचारधारा को मात दे दी थी जिसकी वजह से कट्टरपंथी नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी। येचुरी ने कहा, ‘‘आज आरएसएस और उसके सहयोगी गोडसे को हीरो की तरह पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।’’

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