Newbuzzindia : संसद किसी भी लोकतान्त्रिक देश की व्यवस्था का एक प्रमुख अंग होता है. जिसका मुख्य उद्देश्य तो राष्ट्र और जनता के कल्याण के लिए नीतिगत नीतियों का निर्माण करना होता है. परंतु यह समूचे देश को जोड़ने का भी काम करती है. देशभर से विभिन्न धर्मों, जातियों और पंथों से आए प्रतिनिधियों के बीच संवाद स्थापित करने का काम करती है. देखा जाए तो संसद का प्रमुख कार्य ही यही है, यह देश की आवाम और उसके चुने हुए प्रतिनिधियों को ‘जनतंत्र’ से जोड़ती है. संसद इन चुने हुए प्रतिनिधियों को मौका देती है कि वह अपने-अपने क्षेत्र की जनता की समस्याओं को ‘जनतंत्र’ के रास्ते सत्ताधारियों तक पहुंच सके.
इस समय सियासी गलियारे में केवल एक ही चर्चा है आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नोटबंदी पर संसद में बयान क्यों नहीं दे रहे हैं? वह संसद में आने का साहस क्यों नहीं जुटा पा रहे हैं? इस नोटबंदी के फैसले के बाद एक बात जो निकल कर आयी है वो सरकार के लिए चिंता का विषय बन सकती है. वो यह है कि नोटबंदी के बाद समूचा विपक्ष एक साथ खड़ा हो गया है. जिसने सरकार की चिंता और बढ़ा दी है. सरकार को समझ नहीं आ रहा है कि आखिर विपक्ष का गतिरोध कैसे ख़त्म किया जाए.
अभी तक तो ऐसा ही लगता है कि ‘सरकार’ मोदी को विपक्ष के सामने नहीं खड़ा करेगी. लेकिन एक वक़्त ऐसा भी था जब लगातार संसद को बाधित किया जा रहा था. मामला डॉलर के मुकाबले रूपए के मूल्यांकन मे लगातार और तेजी से कम होने का था. उस समय बीजेपी विपक्ष में थी और वर्तमान वित्त मंत्री अरुण जेटली राज्यसभा में तत्कालीन विपक्ष के नेता थे.
अगस्त २९, २०१३ को विपक्ष की मांग को पूरा करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में संसद (और उसके प्रतिनिधियों) को भरोसा दिया कि वह देश के आर्थिक हालात पर अगले दिन (यानि ३० अगस्त, २०१३) को विस्तार से अपनी बात रखेंगे. ३० अगस्त, २०१३ को हुआ भी ऐसा. डॉ मनमोहन सिंह ने रूपए की बिगड़ते हालात को देखते हुए कहा कि देश की अर्थव्यवस्था एक गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रही है. हमारी सरकार रूपए और डॉलर के बीच संतुलन बैठाने के लिए हर कदम उठा रही है. उन्होंने संसद के पटल पर अपनी बात बिंदुवर तरीके से रखी.
याद रहे यह वही अरुण जेटली हैं जो उस समय के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह पर योजनबद्ध तरीके से हमला कर रहे थे और आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ढाल बने हुए हैं। साथ ही देश के वित्त मंत्री भी है. उनका उस समय का बयान पढ़िए….
‘जेटली ने कहा अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ‘रुपया’ 20 फीसदी गिर गया है और इसका मूल्य घट कर पहले से ही 68 के निशान को पार कर गया है. उन्होंने कहा कि लोगों के मन में ‘भय’ है कि रूपए और कितना गिरेगा? जेटली ने कहा यह दहशत की स्थिति है. उन्होंने कहा कि हम प्रधानमंत्री (मनमोहन सिंह) से पूछना चाहते हैं कि क्या उनके दिमाग में इस स्थिति से निपटने के लिए कोई हल है. उन्होंने कहा लोकतंत्र की शुरुआत प्रधानमंत्री से होती है. साथ ही उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को देश और सदन को विश्वास में लेना चाहिए’
आज स्थिति बदल गयी है, जेटली सरकार में हैं और मनमोहन सिंह उसी सदन (राज्यसभा) में विपक्ष में बैठे हैं. विडम्बना देखिये आज जेटली देश और सदन को विश्वास मे लेने की बात नहीं कर रहे हैं। जबकि वह सत्ता मे हैं जिसके कारण उनकी ज़िम्मेदारी देश के प्रति और बढ़ जाती है। मसलन दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं जिनसे सदन जवाब मांग रहा है और उनके वक्तव्य का इंतज़ार कर रहा है. सरकार सुन नहीं रही और अरुण जेटली जो कल तक उसी सदन में (पूर्व) प्रधानमंत्री से किसी अहम् आर्थिक मुद्दे पर बयान दिलवाने की वकालत कर रहे थे, आज वह मूक बन कर (वर्तमान) प्रधानमंत्री का साथ दे रहे हैं. असल में राजनीति की यही बदसूरती है जिसका सत्ता और विपक्ष में ‘चरित्र’ बदल जाता है या फिर ऐसे गंभीर और अहम विषयों पर राजनीति पूरी तरह से ही ‘चरित्रहीन’ हो जाती है जिसका चित्रण करना बेहद मुश्किल होता है
