Home Tags Amit Shah

Tag: Amit Shah

भाजपा की उम्मीदों को नितीश कुमार का झटका , दिया बड़ा बयान

0

Newbuzzindia : नितीश कुमार द्वारा नोटबंदी का समर्थन करने के बाद से ही भाजपा  नितीश कुमार के घरवापसी की उम्मीद लगा बैठी थी । भाजपा द्वारा ऐसे कयास लगाए जा रहे थे की नितीश कुमार घर वापसी करते हुए भाजपा की nda में शामिल हो जाएंगे ।

ऐसे में नीतीश कुमार के एक बयान ने भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है । नितीश कुमार ने कहा है कि ” भारतीय जनता पार्टी उनका पोलिटिकल मर्डर करना चाहती है ” ।

गौरतलब है कि कल सीएम नीतिश कुमार ने विधानमंडल दल के बैठक के दौरान अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए कहा था कि बीजेपी उनका पोलिटिकल मर्डर करना चाहती है इस बयां को लेकर बीजेपी और जदयू में बयानबाजी का दौर तेजी से बढ़ गया है । जदयू के महासचिव श्याम रजक ने कहा कि मुख्यमंत्री स्वयं कह रहे है कि बीजेपी सीएम का चरित्र हनन करने की कोशिश कर रही है ।

इस बीच इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए बीजेपी नेता नंदकिशोर प्रसाद यादव ने कहा कि नीतिश कुमार ने नोटबंदी के मुद्दे पर पर पीएम मोदी को खुद से समर्थन किया है इसके लिए किसी ने उनपर दबाब नहीं डाला है । अगर वो बीजेपी पर राजनीतक हत्या का आरोप लगा रहे हैं तो वो गलत बात कह रहे हैं यह काम तो राजद, कांग्रेस, लालू यादव और सोनिया गांधी के तरफ से हो रहा है यह आरोप सरासर गलत है ।

उन्होंने नोटबंदी पर समर्थन किया तो हमने आभार व्यक्त किया था. हमारे रास्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने खुले मंच से नीतिश कुमार को शुक्रिया अदा किये हैं. इस बीच राजद के नेताओं ने भी अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है और कहा है की हमारे रहते उनकी राजनितिक हत्या की हर कोशिश नाकाम कर दी जाएगी.

भाजपा विधायक ने किया खुलासा , अमित शाह ने जमीन खरीदकर ठिकाने लगाया कालाधन !

0

Newbuzzindia : प्रधानमंत्री द्वारा नोटबंदी की घोषणा के अगले दिन से ही विपक्ष इसे बड़ा घोटाला बता रहा है । शुरू में विपक्ष का हमला तर्कहीन लगता था । अब समय के साथ साथ ऐसी कई बातें सामने आ रही है जिससे यह बात साफ़ हो रही है कि नोटबंदी से पहले भाजपा ने अपना सारा काला पैसा ठिकाने लगा लिया है ।

ऐसा सिर्फ विपक्ष ही नही बल्कि भाजपा विधायक भी कह रहे है । बिहार से भाजपा विधायक संजीव चौरसिया ने बयान दिया है कि “भाजपा द्वारा जमीन सब जगह खरीदी जा रही थी । हम लोग तो सिर्फ नामके लिए है बाकी पैसा तो भाजपा की तरफ से आया था । ”

यह खुलासा किया है कांग्रेस पार्टी ने । कांग्रेस पार्टी के twitter अकाउंट से यह सारी जानकारी सामने आई है । यह रहा कांग्रेस पार्टी द्वारा किया गया tweet ।

https://twitter.com/INCIndia/status/802453754565885952

मोदी जी देश का वित्त मंत्री बदलिए, नोट बंद करने से कुछ नहीं होगा : कीर्ति आजाद

0

Newbuzzindia :भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से निलंबित सांसद और पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी कीर्ति आजाद ने कहा है कि वरिष्ठ भाजपा नेता अरुण जेटली दिल्ली जिला क्रिकेट संघ (डीडीसीए) को संभाल नहीं सके, लेकिन आज वह पूरे देश की वित्त व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि जेटली इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार में वित्तमंत्री हैं। आजाद ने कहा कि केन्द्र की हर सरकार ने मिथिला क्षेत्र की उपेक्षा की है। उन्होंने कहा कि मिथिला को सबसे पहले राज्य का दर्जा मिलना चाहिए था।
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद के पुत्र कीर्ति ने कहा, “एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि ‘न खाऊंगा और न खाने दूंगा’ और दूसरी ओर भ्रष्टाचार के आरोपित लोगों को देश के वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी देते हैं, इसे क्या समझा जाए?”
आजाद यहीं नहीं रुके। उन्होंने बेबाकी से कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने के कारण उन्हें पार्टी ने निलंबित किया। दरभंगा से तीन बार सांसद रहे आजाद सवालिया लहजे में कहते हैं, “मैं पिछले 10 वर्षों से डीडीसीए में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाता रहा हूं। अमित शाह से पहले के अध्यक्षों ने तो मुझे पार्टी से निलंबित नहीं किया।”
उन्होंने कहा कि वह उसूलों में पले-बढ़े हैं और राजनीति भी उसूलों और मर्यादा के साथ करते हैं। अगर उनसे कोई गलती हो गई थी तो पार्टी उन्हें निष्कासित कर देती।
उन्होंने कहा, “मैं न तो पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहा हूं और न ही पार्टी के विरुद्घ कोई टिप्पणी की है। मैंने व्यक्ति विशेष के बारे में कहा था और कह रहा हूं।”
मिथिला के विकास के विषय में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “मिथिला की अब तक उपेक्षा ही हुई है। पृथक मिथिला राज्य की मांग तो काफी पहले से हो रही है। मिथिला की अलग संस्कृति है, अलग भाषा है, अलग लिपि है। मिथिला की चर्चा आदिकाल से हो रही है, परंतु आज तक पिछड़ा है।”
बिहार भाजपा में खेमेबाजी के प्रश्न पर उन्होंने चुप्पी साध ली, परंतु सुशाील मोदी का नाम आते ही उन्होंने कहा, “पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के कारण ही आज बिहार में भाजपा की यह स्थिति है।” मोदी को ‘बिना रीढ़’ का व्यक्ति बताते हुए उन्होंने कहा कि उस व्यक्ति ने कभी भी मिथिलांचल में नेतृत्व को उभरने नहीं दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये सभी लोग जनता के नकारे हुए लोग हैं।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ‘निश्चय यात्रा’ के प्रश्न पर आजाद ने कहा कि मुख्यमंत्री के सात निश्चय बिहार के विकास के लिए एक अच्छा निर्णय है, जिसे पूर्ण होने की कामना करनी चाहिए।
बिहार में जनता दल (युनाइटेड) और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के बीच गठबंधन तथा कथित ‘जंगलराज’ के विषय में पूछे जाने पर आजाद ने कहा कि जब से राज्य में महागठबंधन की सरकार बनी है तब से हत्या और अपहरण की घटनाएं बढ़ी हैं, परंतु इन घटनाओं के पीछे जिले के पुलिस कप्तान की कमजोरी भी हो सकती है।
कीर्ति ने पत्नी पूनम आजाद के आम आदमी पार्टी (आप) की सदस्यता ग्रहण करने के प्रश्न पर कहा, “आज लोग महिला सशक्तिकरण की बात कर रहे हैं। ऐसे में मैं कौन होता हूं उन्हें रोकने वाला? पूनम ने 30 वर्षो से ज्यादा समय तक परिवार चलाया है और अब वह ‘आप’ के साथ राजनीति करना चाहती हैं तो मेरी शुभकामना है।”

क्रिकेटर आजाद ने भाजपा छोड़ने और आप में शामिल होने के प्रश्न पर कहा कि वह अभी भाजपा से निलंबित हैं। ऐसे में दूसरी पार्टी में जाने का प्रश्न नहीं है।
मिथिला की सांस्कृतिक पहचान ‘पाग बचाउ अभियान’ से जुड़े आजाद कहते हैं कि पाग मिथिला की आन, बान, शान, सम्मान, स्वाभिमान की पहचान है। उन्होंने कहा कि पाग बचाउ अभियान चलाने वाली संस्था मिथिला लोक फाउंडेशन के चेयरमैन डॉ़ बीरबल झा ने पाग को आधुनिक बना दिया है।
उन्होंने कहा कि पाग अब सात रंगों में उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि वह प्रतिदिन पाग पहनते हैं और संसद के शीतकालीन सत्र में भी वह प्रतिदिन पाग पहनकर सदन में जाएंगे।

उमा भारती ने खोली गुजरात मॉडल की पोल, मोदी को बताया विनाश पुरुष..!

0

Newbuzzindia : नरेंद्र मोदी और अमित शाह समेत पूरी भाजपा जहाँ गुजरात मॉडल का ढिंढोरा पीट रहे है । वहीं भाजपा की कद्दावर नेता उमा भारती ने गुजरात मॉडल की पोल खोल कर रख दी है । उमा भारती ने मोदी के गुजरात में किये गए सभी विकास कार्यों को ख़ारिज कर दिया है ।

उमा भारती ने कहा है कि नरेंद्र मोदी विकास पुरुष नही है और नरेंद्र मोदी विनाश पुरुष है । अब आप सोच रहे होंगे की उमा भारती जो की मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री है वह नरेंद्र मोदी पर हमला क्यों करेंगी..?

हम आपको बताते है उमा भारती के इस बयान की असलियत । दरअसल इस समय उमा भारती के एक बयान का वीडियो फेसबुक और ट्विटर पर काफी ट्रेंड कर रहा है । इस वीडियो में उमा भारती ने प्रधानमंत्री मोदी पर जोरदार हमला किया है । उमा भारती ने कहा है कि नरेंद्र मोदी ने गुजरात का विकास नही किया है । नरेंद्र मोदी ने गुजरात का विनाश कर दिया है । ये रहा वो वीडियो-

गौरतलब है कि यह वीडियो 2014 लोकसभा चुनाव के समय का है । लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या उमा भारती अपने उस बयान का अब समर्थन करेंगी..?

भाजपा ऐसे करती है जवानों की शहादत की राजनैतिक दलाली..!

0

Newbuzzindia : सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से ऐसा लग रहा है कि जैसे सिर्फ नरेंद्र मोदी नही पूरी मोदी सरकार का सीना 56 इंच का हो गया है । ऐसा लग रहा है जैसे भारतीय सेना नही बल्कि भाजपा और आरएसएस ने सर्जिकल स्ट्राइक की है ।

ऐसे में जब भाजपा सर्जिकल स्ट्राइक का राजनैतिक फायदा उठा रही है तो विपक्ष कहाँ चुप रहने वाला है । संजय निरुपम और अरविन्द केजरीवाल जहाँ मोदी सरकार पर पहले ही हमला बोल चुके है । तो अब राहुल गांधी ने भी मोदी सरकार पर बड़ा हमला बोला है ।

राहुल गांधी ने तो नरेंद्र मोदी को शहीद जवानों की शहादत का दलाल बता दिया है । राहुल गांधी के इस बयान के बाद बवाल हो गया था । जिसके बाद अब कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी के साथ कड़ी दिखाई दे रही है । कपिल सिब्बल ने आज प्रेस कॉन्फ्रेंस करके अमित शाह और नरेंद्र मोदी पर हमला बोला ।

अब कांग्रेस के ऑफिसियल ट्विटर अकाउंट से राहुल गांधी के समर्थन में कई ट्वीट किए गए ।

राहुल गांधी द्वारा किये गए ट्वीट-

ऐसे में अब सवाल उठना लाज़मीय है कि क्या सेना द्वारा किये गए सर्जिकल अटैक का राजनैतिक फायदा उठाना सही है..?

गुजरात चुनाव : कांग्रेस के सर्वे में ही भाजपा से हार रही है कांग्रेस..!

0

Newbuzzindia: 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर गुजरात कांग्रेस ने एक विश्‍वसनीय रिपोर्ट तैयार की है। यह रिपोर्ट कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी को भी भेजी गई है। टाइम्‍स ऑफ इंडिया के मुताबिक, रिपोर्ट में कहा गया है कि 2017 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी 182 में से 97 सीटें जीत सकती है।

इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर कांग्रेस भाग्‍यशाली हुई तो अधिकतम 82 सीटें जीतेगी। टीआेआई ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि यह रिपोर्ट ‘पेशेवर एजेंसियों की मदद’ से तैयार की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, विधानसभा की 182 सीटों में से ”52 सीटों पर भाजपा के जीतने की 100 फीसदी संभावना है, जबकि अन्‍य 45 सीटों पर बीजेपी के जीतने की संभावना 80 से 85 फीसदी है।”

दोनों को जोड़ दें तो संख्‍या 97 हो जाती है। अगर ऐसा होता है तो विधानसभा में आराम से भाजपा को बहुमत मिल जाएगा। अगर सत्‍ताधारी पार्टी कोई और सीट नहीं भी जीतती, तो भी वह कम बहुमत के साथ सरकार बना लेगी।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि अगर कांग्रेस बाकी बची 85 सीटें जीत भी ले, तो भी वह सरकार नहीं बना पाएगी। रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी की 52 ‘ए ग्रेड सीटों'(जहां भाजपा का जीतना तय है) के मुकाबले कांग्रेस के पास सिर्फ 8 ‘ए ग्रेड सीटें’ हैं। पार्टी के एक सूत्र ने कहा कि कांग्रेस को अभी भी कई कमियां दूर करनी है।

पार्टी की चार बड़े शहरों और अर्द्धशहरी क्षेत्रों में कम पहुंच है। इसके अतिरिक्‍त भाजपा बूथ-लेवल मैनेजमेंट में कांग्रेस से कहीं आगे है। कांग्रेस सूत्र ने टीआेआई से कहा, ”भाजपा को कड़ी टक्‍कर देने के लिए कांग्रेस को कई गुना प्रयास करने होंगे।”
गुजरात, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृह राज्‍य है। उन्‍होंने अपने विश्‍वासपात्र विजय रुपानी को राज्‍य का मुख्‍यमंत्री नियुक्‍त किया है।

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने आनंदीबेन पटेल को मुख्‍यमंत्री बनाया था, मगर विवादों में फंसने के बाद पटेल ने इस्‍तीफा सौंप दिया। जिसके बाद शाह और मोदी की जोड़ी ने रुपानी को चुना। 2017 के चुनावों के लिए भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह खुद चुनाव प्रबंधन पर नजर रखेंगे।

बोलें कुछ भी पर नेहरू और गांधी के सिद्धांतों पर चल रहे है प्रधानमंत्री मोदी..!

0

“वैसे तो प्रधानमंत्री मोदी भाजपा और आरएसएस से ताल्लुक रखते है । सरदार वल्लभ भाई पटेल, स्वामी विवेकानंद और गुरु गोवलकर को अपना आदर्श बताते है । लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक नरेंद्र मोदी ने जो कदम उठाए हैं, उनमें इंदिरा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की नीतियों और कार्यक्रमों की ही झलक ज्यादा दिखती है”

Newbuzzindia: यह प्रसंग मार्च 2014 का है. तब तक नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री से कुछ ज्यादा हो गए थे. भाजपा उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुकी थी. वे भी अपने और पार्टी के पक्ष में देशभर में हवा बनाने के लिए जुटे थे. उसी दौरान उन्होंने किसी कार्यक्रम में दावा किया कि तीन महापुरुष उनके जीवन में ‘आदर्श’ हैं, सरदार वल्लभभाई पटेल, स्वामी विवेकानंद और गुरु गोलवलकर (आरएसएस के दूसरे प्रमुख माधव सदाशिव गोलवलकर). आदर्श के लिहाज से मोदी के दावे पर कोई सवाल नहीं. लेकिन प्रधानमंत्री के तौर पर उनके दो साल चार महीने के कार्यकाल से एक नहीं कई ऐसी मिसालें मिलती हैं, जो बताती हैं कि उनकी नीति-राजनीति, नियम-कार्यक्रम इंदिरा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के नक्शे कदम पर हैं. इसी को परत-दर-परत उल्टे क्रम में खंगालते हैं. यानी पहले इंदिरा जैसे मोदी और फिर नेहरू से मोदी.

इंदिरा के वक्त ‘मैं’ और मोदी के समय भी

देश की राजनीति में करीब साढ़े तीन दशक बाद पहली बार है, जब केंद्र में सत्तासीन किसी पार्टी की सरकार और उसके संगठन पर सिर्फ ‘मैं’ यानी एक व्यक्ति का प्रभुत्व है. मगर इस ‘मैं’ के प्रभुत्व की शुरुआत कड़े संघर्ष से होती है.

याद कीजिए सितंबर 2013. तब भाजपा ने गोवा में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान नरेंद्र मोदी को अपने चुनाव अभियान समिति की मुखिया घोषित किया था. लेकिन पार्टी के फैसले से नाराज भाजपा के ‘लौह पुरुष’ लालकृष्ण आडवाणी उस बैठक में शामिल तक नहीं हुए. पार्टी के अन्य नेताओं ने भी विरोध बुलंद किया. बाहर नीतीश कुमार जैसे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के सहयोगियों ने अपना रास्ता अलग कर लिया. कांग्रेस जैसी पार्टियों को तो इसका फायदा उठाने के प्रयास करना ही था.

मंत्रियों पर इंदिरा गांधी का ऐसा असर या कहिए कि खौफ था कि वे उन्हें ‘सर’ कहने लगे थे. नीति-निर्णय, सत्ता-शक्ति का केंद्र उनके समय में सिर्फ वे ही थीं

दिल्ली की राजनीति में नए-नए आए मोदी ने यहीं से हवा का रुख अपनी तरफ मोड़ना शुरू किया. वे देश के हर कोने में घूमे. त्रिपुरा जैसे राज्य तक हो आए, जहां भाजपा के लिए संभावना न के बराबर थी. लेकिन उनका लक्ष्य अपनी छवि को देशव्यापी बनाना और चुनावी माहौल को अपने ही गिर्द केन्द्रित करना था. इस दौरान उन्होंने खुद को पीड़ित सा पेश किया और विपक्ष को देश में मौजूद हर बुराई की जड़ जैसा. उन्होंने नारा दिया, ‘वे (विरोधी) कहते हैं- मोदी हटाओ, मोदी हटाओ. लेकिन मैं कहता हूं- भ्रष्टाचार हटाओ, भ्रष्टाचार हटाओ.’ केंद्र की कांग्रेस सरकार का भ्रष्टाचार उस वक्त जनता की दुखती रग थी. मोदी ने उसे छुआ. ‘कांग्रेस हटाओ, मोदी लाओ, देश बचाओ’ उस समय लगभग हर रैली में संदेश यही था, ‘मुझे वोट दीजिए. मुझे आशीर्वाद दीजिए.’

अब जरा 1969-70 का फ्लैशबैक. उस वक्त प्रधानमंत्री कार्यालय में इंदिरा गांधी का पहला कार्यकाल था. कांग्रेस पर एस निजलिंगप्पा जैसे असरदार नेता हावी थे, जिनसे इंदिरा के तमाम मसलों पर मतभेद थे. हालात ऐसे बन आए कि निजलिंगप्पा ने (जो तब कांग्रेस अध्यक्ष थे) इंदिरा को पार्टी से ही निकाल दिया. कांग्रेस का ‘इंदिरा’ और इंदिरा का ‘इंडिया’ हो जाना यहीं से शुरू हुआ. इस घटनाक्रम के बाद हुए 1971 के चुनाव में इंदिरा अपनी छवि को देशव्यापी बनाने निकल पड़ीं. कोई कोना नहीं छोड़ा, जहां वे न गई हों. खुद को विरोधियों का निशाना बताया. कहा, ‘विरोधी कहते हैं, इंदिरा हटाओ. मैं कहती हूं, गरीबी हटाओ’ उस दौर में जनता की नब्ज गरीबी थी. इंदिरा ने उसे छुआ और नारा दिया, ‘गरीबी हटाओ, इंदिरा लाओ, देश बचाओ.’ कांग्रेस अब ‘आई’ यानी इंदिरा हो चुकी थी, इसलिए उन्होंने जनता से एक ही अपील की, ‘मुझे वोट दीजिए.’

अतीत और वर्तमान की ये दो धाराएं और कैसे, कहां एक होती हैं, इस पर नजर डालते हैं. नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही आदेश निकाला कि केंद्र का कोई मंत्री निजी स्टाफ में पीएमओ (प्रधानमंत्री कार्यालय) की इजाजत के बिना नियुक्ति नहीं कर सकेगा. फिर पता चला कि उनका दफ्तर हर मंत्री के कार्य और सार्वजनिक व्यवहार पर नजदीकी नजर रखता है. देखते ही देखते तमाम अहम मसलों पर अंतिम निर्णय की धुरी और सत्ता-शक्ति का केंद्र सिर्फ और सिर्फ पीएमओ बन गया. अमित शाह को पार्टी अध्यक्ष बनवाया गया, तो स्थापित हुआ कि सिर्फ यही एक शख्स है, जिस पर मोदी अपने सोचे हुए को सच करने का भरोसा रखते हैं. विरोधियों को (भले वे पार्टी के बुजुर्गवार क्यों न हों) बिना दर्शन के मार्ग दिखा दिया गया तो जाहिर हुआ कि उन्हें विवादी सुर अच्छे नहीं लगते. लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त 2014 से अब तक हर बार बिना बुलेटप्रूफ शीशे की दीवार के भाषण देकर मोदी दबंग नेता की छवि बनाते दिखे. फिर इसी प्राचीर से जब बलूचिस्तान का जिक्र किया तो मुश्किल पड़ोसी के साथ उनकी आगे की नीति का संकेत मिला.

नेहरू देश के तेज औद्योगिक विकास के पक्षधर थे और नरेंद्र मोदी ने देश को मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाने का मंसूबा बांधा है, ‘मेक इन इंडिया’ के जरिए

यही सब तो तीन-साढ़े तीन दशक पहले इंदिरा ने किया था. मंत्रियों पर उनका ऐसा असर या कहिए कि खौफ था कि वे उन्हें ‘सर’ कहने लगे थे. नीति-निर्णय, सत्ता-शक्ति का केंद्र अपने समय में सिर्फ वे ही थीं. तीन कार्यकाल में उनका भरोसेमंद एक वक्त में सिर्फ एक ही शख्स रहा. पीएन हक्सर 1969 से 74 तक, संजय गांधी 1974 से 80 तक और राजीव गांधी 1981 के बाद से आखिरी वक्त तक. विरोध करने वालों का तो कोई नामलेवा भी नहीं बचा. बल्कि मूल कांग्रेस ही उस विरोध के साथ खत्म हो गई. पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की मुक्ति वाहिनी को खुला समर्थन देकर देश की विदेश नीति में आक्रामक परिवर्तन पहली बार उन्होंने ही किया. और बांग्लादेश की आजादी के बाद से लगातार जान का खतरा होने के बावजूद लाल किले से देश को संबोधित करने के लिए उन्होंने कभी बुलेटप्रूफ कांच की दीवार खड़ी करने की इजाजत नहीं दी. यकीनन यही कारण रहे, जिनके चलते एकबारगी अटलबिहारी वाजपेयी जैसे विपक्ष के नेता ने उन्हें ‘दुर्गा’ बता दिया. तो, तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांता बरुआ ने कह दिया, ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा.’ फिलहाल, मोदी की राह और रफ्तार भी कुछ ऐसी ही दिखती है.

नेहरू ने वैश्विक नेता बनने की राह पकड़ी और मोदी ने भी

अब 26 मई 2014 की तारीख को ध्यान में लाइए. उस रोज नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ले रहे थे. और उनके सामने विशेष तौर पर बुलाए गए मेहमानों की लाइन में सार्क (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन) सदस्य देशों के करीब-करीब सभी राष्ट्र तथा शासन प्रमुख बैठे थे. तब मोदी के शपथग्रहण समारोह को ‘मिनी सार्क शिखर सम्मेलन’ तक कह दिया गया था. पद संभालने के अगले महीने यानी जून 2014 में मोदी ने पहली विदेश यात्रा के लिए सार्क के सदस्य देश भूटान को चुना. फिर उसी महीने उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष संगठन (इसरो) से सार्क देशों के लिए संचार और मौसम उपग्रह तैयार करने को कहा. हालांकि पाकिस्तान इस कार्यक्रम से खुद बाहर हो गया लेकिन बाकी पड़ोसियों को भारत का यह ‘उपहार’ दिसंबर 2016 में मिल सकता है.

सार्क को मोदी की ओर से दी जा रही यह अहमियत उनमें नेहरू की झलक दिखाती है. याद रखना और गौर करना, दोनों लाजमी है कि नेहरू की पहल पर ही अप्रैल 1947 में पहली बार दिल्ली के एशियाई संबंध सम्मेलन (एशियन रिलेशन कॉन्फ्रेंस) में सार्क जैसे संगठन के गठन पर विचार हुआ. और फिर 70 का दशक खत्म होने तक भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, भूटान, मालदीव, नेपाल और श्रीलंका आपसी व्यापार के लिए ऐसा संगठन (सार्क) बनाने पर सहमत हो गए थे.

नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद खुद को ‘प्रधान सेवक’ का विशेषण दिया था. लेकिन कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की मानें तो यह संबोधन अपने लिए पहली बार 1947 में जवाहरलाल नेहरू ने इस्तेमाल किया था

नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद खुद को ‘प्रधान सेवक’ का विशेषण दिया था. लेकिन कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की मानें तो यह संबोधन अपने लिए पहली बार 1947 में जवाहरलाल नेहरू ने इस्तेमाल किया था. उन्होंने कहा था, ‘मैं प्रधानमंत्री नहीं, प्रधानसेवक हूं.’

नेहरू देश के तेज औद्योगिक विकास के पक्षधर थे. वे गांवों को भी विकास की मुख्यधारा से जोड़ना चाहते थे. इसी सोच के चलते उनके कार्यकाल में सोवियत संघ के सहयोग से बोकारो और जर्मनी की मदद से राउरकेला में स्टील संयंत्र शुरू हुए. इन्हीं कोशिशों से 1950 के बाद देश की विकास दर 1962-65 तक करीब सात फीसदी रही. योजनाबद्ध तरीके से देश आगे भी आर्थिक तरक्की करता रहे, इसलिए नेहरू ने योजना आयोग का गठन किया. इसी तरह, मोदी ने देश को मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाने का मंसूबा बांधा है, ‘मेक इन इंडिया’ के जरिए. उनकी ‘ग्रामोदय से भारत उदय’ योजना और बदले आर्थिक हालात में योजना आयोग की जगह नीति आयोग के गठन का फैसला भी नेहरू से प्रेरित लगता है.

जवाहरलाल नेहरू ने देश में वैकल्पिक (परमाणु) ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया. ब्रिटेन की मदद से देश में अगस्त 1956 में पहला परमाणु रिएक्टर ‘अप्सरा’ लगा. इसके बाद कनाडा तथा रूस के सहयोग से रिएक्टर लगाए गए और सिलसिला चल पड़ा. नरेंद्र मोदी भी वैकल्पिक ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं. लद्दाख, गुजरात, पंजाब आदि राज्यों में उनकी सरकार ने इस लिहाज से ध्यान केन्द्रित किया है. विश्वस्तर पर भी उन्होंने पेरिस में नवंबर 2015 को संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में अपनी इस परिकल्पना को आगे बढ़ाने का प्रयास किया. इसके बाद 121 देशों का समूह (अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन) बना. इसे इंटरनेशनल एजेंसी फॉर सोलर पॉलिसी एंड एप्लीकेशन (आइअस्पा) भी कहते हैं. इसका मुख्यालय गुड़गांव में जनवरी 2016 में शुरू हुआ. यह समूह 2022 तक 175 गीगावॉट सौर ऊर्जा पैदा करने की दिशा में काम करेगा.

नेहरू को भारत-अफ्रीकी संबंधों का मुख्य शिल्पकार समझा जाता है. उनकी यह परिकल्पना आज भारत-अफ्रीका फोरम के रूप में सामने है. इस फोरम की पिछले साल दिल्ली में हुई बैठक में 54 में से 41 देश शामिल हुए थे. इसी तरह, मोदी की पहल के बाद नवंबर 2014 में फोरम फॉर इंडिया-पैसिफिक आइलैंड्स को-ऑपरेशन गठित हुआ. इसमें भारत और प्रशांत महाद्वीप के 14 देश हैं. इसका पहला सम्मेलन 2014 में फिजी में हुआ और दूसरा अगस्त 2015 में जयपुर में.

लेमोआ समझौते को नरेंद्र मोदी की सरकार और पार्टी देश की ‘सामरिक विजय’ और ‘ऐतिहासिक’ बता रही है. जबकि दिलचस्प तथ्य है कि अमेरिका के साथ ऐसा ही समझौता 1942 से 1966 तक रह चुका है.

मोदी संभवत: विश्व नेता बनने की आकांक्षा के तहत ही तमाम अंतर्राष्ट्रीय गुटों में भारत को पहली लाइन में लाने की कोशिश में हैं. जैसे-मिसाइल तकनीक नियंत्रण समूह (एमटीसीआर) में भारत को सदस्यता दिलाना, परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में सदस्यता के लिए आक्रामक प्रयास, ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का समूह) बैंक की स्थापना (या न्यू डेवलपमेंट बैंक, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह नाम मोदी ने प्रस्तावित किया) में सक्रिय भागीदारी आदि. और बीती छह सितंबर को जी-20 की चीन के हांगझोऊ शहर में हुई बैठक में उनकी कोशिशें अगले चरण में दिखीं. मोदी को इस सम्मेलन के फोटो सेशन में पहली पंक्ति में जगह मिली. उनके साथ 11 राष्ट्रपति और सम्मेलन के अगले मेजबान जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल थीं. जबकि अमूमन ऐसे सम्मेलनों में भारतीय प्रधानमंत्री दूसरी पंक्ति में होते रहे हैं. इसी तरह की कोशिशें नेहरू भी अपने समय में किया करते थे. बेलग्राद में 1961 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन (अमेरिका और सोवियत संघ से अलग रहने वाले देशों का समूह) का गठन, इसकी एक बानगी है.

नेहरू ने 1960 के दशक में भारत-चीन के संबंधों को लेकर ‘पंचशील का सिद्धांत’ दिया था. इसी तरह अमेरिका-भारत के संबंधों के लिए नरेंद्र मोदी ने जो परिकल्पना पेश की, उसे जून 2016 में अमेरिकी मीडिया ‘मोदी डॉक्टरीन’ का तमगा दे चुका है. भारत-चीन-अमेरिका और नेहरू-मोदी प्रसंग में ताजा संदर्भ है, लेमोआ (लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट) का. भारत ने बीती 29 अगस्त को अमेरिका के साथ इस समझौते पर दस्तखत किए हैं. इसके तहत दोनों देश एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं, रसद और एक निश्चित दायरे में रहते हुए सैन्य ठिकानों का भी इस्तेमाल कर सकेंगे.

चीन से निपटने की दोनों देशों की रणनीति के तहत हुए इस समझौते को मोदी की सरकार और पार्टी देश की ‘सामरिक विजय’ और ‘ऐतिहासिक’ बता रही है. जबकि दिलचस्प तथ्य है कि भारत ऐसे ही समझौते के तहत अमेरिकी सेना के लिए 1942 से 1946 तक रसद आपूर्ति का मुख्य अड्‌डा रह चुका है. देश की आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू सरकार ने भी 1966 तक यह समझौता जारी रखा. विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर यह जानकारी मौजूद है. इसमें स्पष्ट है कि 1952 तक तो अमेरिकी सेना की वायु परिवहन सेवा (मैट्स) से भारत में उसके विमानों को उतरने और रुकने की सुविधा देने के एवज में शुल्क तक नहीं लिया जाता था. इसके बाद दस साल तक शुल्क लिया गया. मगर 1962 में जब चीन ने भारत पर हमला किया तो अमेरिका से सैन्य मदद की गरज से भारत ने उसे फिर शुल्क में छूट दे दी. साथ ही, अमेरिकी सैन्य विमानों के पायलट और चालक दल के सदस्यों के लिए भारत में वीसा की अनिवार्यता भी खत्म कर दी.

इस तरह भले कोई कहे या माने कुछ भी. लेकिन नरेंद्र मोदी में जो ‘प्रधानमंत्री’ है, उसमें बड़ी हिस्सेदारी (शायद आधी से भी ज्यादा) इंदिरा और नेहरू के खाते में जाती दिखती है. फिर उनके प्रधानमंत्रित्व (जिसमें व्यक्तित्व भी है) के बाकी हिस्से में खुद मोदी समेत चाहे जितनी छवियां देख लें. चाहे वे विवेकानंद हों, सरदार पटेल, गोलवलकर या अटलबिहारी.

News Source

दलित आंदोलन के बाद संघ की शाखाओं में काफी कम हुई दलितों की संख्या.!

0

Newbuzzindia: पिछले कुछ दिनों से गुजरात के साथ-साथ देश के कुछ और हिस्सों में दलित विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं. भाजपा को आगामी विधानसभा चुनावों में इसके नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं लेकिन बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती. इनके चलते पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में दलित कार्यकर्ताओं की संख्या तेजी से कम हुई है. 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही संघ ने उत्तर और पश्चिमी भारत के दलित बहुल क्षेत्रों में शाखाएं शुरू की थीं और सक्रियता काफी बढ़ा दी थी.

हिंदूवादी संगठनों या उनसे जुड़े लोगों के हमलों के विरोध में सबसे उग्र आंदोलन गुजरात और महाराष्ट्र में हुआ है. दलित कार्यकर्ताओं द्वारा संघ की शाखाओं से दूरी बनाने की घटना इन राज्यों में साफ-साफ दिख रही है वहीं उत्तर प्रदेश और पंजाब, जहां अगले साल चुनाव होने हैं, इसके असर से अछूते नहीं हैं. बिहार और हरियाणा की शाखाओं में भी दलितों की अचानक बढ़ी अनुपस्थिति साफ देखी जा सकती है.

2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही संघ ने उत्तर और पश्चिमी भारत के दलित बहुल क्षेत्रों में शाखाएं शुरू की थीं

संघ पिछले कुछ समय से समाज में निचले तबके के लोगों के बीच अपना विस्तार करने के लिए आक्रामक अभियान चला रहा था लेकिन ताजा बदलाव से इस पहल को भारी झटका लगा है. ‘हमने दलित बहुल आबादी के पास नई शाखाएं लगानी शुरू की थीं क्योंकि सवर्ण आबादी वाले इलाकों में लगने वाली शाखाएं दलित समुदाय के लोगों को आकर्षित नहीं कर पा रही थीं’ मेरठ प्रांत के संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी बताते हैं, ‘पिछले कुछ समय से इन शाखाओं में बड़ा उत्साह नजर आ रहा था और दलित समाज के लोगों की भागीदारी तेजी से बढ़ी थी. लेकिन अब कार्यकर्ताओं की लाख कोशिश के बाद भी ये शाखाएं मजाक से ज्यादा कुछ नहीं बचीं.’

देश के बाकी हिस्सों में भी असर दिख रहा है

संघ के लिए दिक्कत सिर्फ मेरठ प्रांत में नहीं है. उत्तर प्रदेश के पांच प्रांतो – ब्रज, अवध, काशी, कानपुर और गोरक्षा के संघ पदाधिकारियों का भी यही कहना है कि दलित शाखाओं में आने से मना कर रहे हैं. इनके साथ पश्चिमी महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और दक्षिण बिहार के संघ पदाधिकारी भी यह बात स्वीकार करते हैं.

संघ को तकरीबन एक महीने पहले ही इस बात का एहसास हुआ कि बड़ी संख्या में निचली जाति के कार्यकर्ता उससे छिटक गए हैं. 31 जुलाई को आगरा में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह एक दलित रैली करने वाले थे लेकिन बाद में पार्टी को यह रद्द करनी पड़ी. दरअसल इस रैली के लिए संघ को कम से कम 40 हजार दलित जुटाने थे और दो दिन पहले ही उसे एहसास हुआ इतनी संख्या में लोग नहीं जुट पाएंगे. यह संघ के लिए शर्मिंदगी वाली बात थी क्योंकि आगरा ब्रज प्रांत में आता है और संघ दावा करता है कि यहां के दलितों के बीच उसका अच्छा खासा असर है.

संघ परिवार ने 1983 के आसपास दलितों को संगठन से जोड़ने के लिए सक्रिय अभियान शुरू किया था. उसी साल संघ ने बाबा साहेब अंबेडकर के जन्मदिन यानी 14 अप्रैल को अपने सामाजिक समरसता मंच की स्थापना की थी

शाह की रैली रद्द होने से संघ को इतना भारी झटका लगा कि संगठन के प्रमुख मोहन भागवत 20 अगस्त के बाद पांच दिन तक आगरा में ही डेरा डाले रहे. फिर एक सप्ताह उन्होंने लखनऊ में बिताया. कहा जाता है कि दोनों स्थानों पर उनकी संघ कार्यकर्ताओं और आनुषंगिक संगठनों के नेताओं के साथ इस संकट पर चर्चा के लिए बैठकें हुई थीं. इस दौरान दलित जाति के लोगों को वापस संघ से जोड़ने के अभियान को पुनर्जीवित करने पर जोर दिया गया है.

संघ परिवार ने 1983 के आसपास दलितों को संगठन से जोड़ने के लिए सक्रिय अभियान शुरू किया था. उसी साल संघ ने बाबा साहेब अंबेडकर के जन्मदिन यानी 14 अप्रैल को अपने सामाजिक समरसता मंच की स्थापना की थी. फिर धीरे-धीरे संघ ने अपनी हिंदुत्व की विचारधारा में फूले-अंबेडकरवादी विचारधारा को समाहित करने की कोशिश शुरू कर दी.

जाति उन्मूलन और संघ

सामाजिक समरसता मंच ने छुआछूत को खत्म करने और दलितों को मुख्यधारा के हिंदू समाज से जोड़ने के लिए अभियान शुरू किए थे. एक मजबूत हिंदू वोटबैंक के लिए यह एक अनिवार्य शर्त भी थी. हालांकि संघ अपने इस मकसद में काफी हद तक नाकामयाब रहा क्योंकि यह काम हमारे समाज की जाति-संरचना को तोड़े बिना नहीं हो सकता था. कुल मिलाकर आज की तारीख में उसकी समरसता वाली विचारधारा अंबेडकर के जाति-उन्मूलन लक्ष्य से काफी दूर खड़ी दिखाई देती है. और जहां तक दलितों का सवाल है तो उनका एक बड़ा तबका आज भी संघ को संदेह की नजर से देखता है और मानता है कि यह मूल रूप से ऊंची जाति वालों का संगठन है.

2014 के लोकसभा चुनाव के पहले संघ ने दलितों को नरेंद्र मोदी के पक्ष में करने के लिए जबर्दस्त अभियान चलाया था. और इसी मकसद से दलित आबादी वाले क्षेत्रों में शाखाएं शुरू की गई थीं. लेकिन आज की परिस्थितियों में उसकी दो साल की पूरी मेहनत पर पानी फिरता दिख रहा है.

Source

शिक्षा का भगवाकरण: नई शिक्षा नीति पर प्रकाश जावड़ेकर ने बंद कमरे में की आरएसएस के साथ बैठक..!

0

Newbuzzindia:  शिक्षा में भगवाकरण के मुद्दे पर लगातार विरोधियों के निशाने पर रही भाजपा पर विरोधी फिर हमलावर हो गए है । खबर है की मानव संसाधन एवं विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बुधवार को आरएसएस के वरिष्ट अधिकारियों के साथ बंद कमरे में लंबी बैठक की । देश की नई शिक्षा नीति को लेकर हुई बातचीत में RSS से जुडे कई अन्‍य संस्‍थाओं के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे ।

गौरतलब है की हाल ही में मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय की जिम्‍मेदारी संभालने के बाद से जावड़ेकर ने संघ से पहली बार औपचारिक रूप से बात की है । कयास लगाए जा रहे थे की स्मृति ईरानी से मंत्रालय लेकर प्रकाश जावड़ेकर को देने के बाद शिक्षा में संघ नीति को बढ़ावा मिलेगा । 

सूत्रों के अनुसार, जावड़ेकर ने गुजरात भवन में छह घंटे चली बैठक में विद्या भारती, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, राष्‍ट्रीय शैक्षिक महासंघ, भारतीय शिक्षण मंडल, संस्‍कृत भारती, शिक्षा बचाओ आंदोलन, विज्ञान भारती और इतिहास संकलन योजना के सदस्‍यों से गुफ्तगू की। बैठक में RSS के संयुक्‍त सचिव कृष्‍ण गोपाल, भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह और RSS के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख अनिरुद्ध देशपांडे भी मौजूद रहे।

द इंडियन एक्‍सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से कहा है कि बैठक नई शिक्षा नीति पर संघ के इनपुट्स बांटने के लिए की गई थी। साथ ही ‘आधुनिक शिक्षा में राष्‍ट्रीयता, गर्व और प्राचीन भारतीय मूल्‍यों को समाहित करने’ की योजना भी बनाई गई। इससे पहले नई शिक्षा नीति को तैयार करने के लिए पूर्व कैबिनेट सेक्रेट्री टीएसआर सुब्रमण्‍यम की अध्‍यक्षता में बनाई गई कमेटी को 80,000 से ज्‍यादा सुझाव मिले थे। 

आरएसएस के एक पदाधिकारी के अनुसार, ”बैठक सरकार-संगठन मंच का एक हिस्‍सा थी जो मोदी सरकार के सत्‍ता में आने के बाद बना है। चूंकि जावड़ेकर मंत्रालय में नए हैं, इसलिए हमनें उन्‍हें जमीनी स्‍तर की चुनौतियों और शिक्षा क्षेत्र में जरूरी सुधारों से अवगत करा दिया है। सामाजिक न्‍याय मंत्री थवर चंद गहलोत और आदिवासी मामलों के मंत्री जुअल ओरम भी कुछ समय के लिए बैठक में थे, क्‍योंकि उनके मंत्रालय भी आदिवासियों, आरक्षित जातियों और पिछड़ी जातियों की शिक्षा से जुड़े हुए हैं।”

सिद्धू के बाद अब कीर्ति आजाद और शत्रुघ्न सिन्हा छोड़ेंगे भाजपा, ‘आप’ में हो सकते हैं शामिल

0

NewBuzzIndia: 

चुनावी मौसम में दूसरी पार्टियों से नाराज लोगों को शामिल करने का चलन बढ़ ही जाता है। अब तो ऐसा लग रहा है जैसे ही चुनावी मौसम आता है नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए बम्पर नौकरियां निकल आती हैं। इस बार लगता है कि आम आदमी पार्टी को इस बात का बहुत फायदा मिलने वाला है।
कुमार विश्वास के ट्वीट से मिली जानकारी की माने तो, भाजपा से नाराज तीन दिग्‍गज आप में शामिल हो सकते हैं। ये हैं कीर्ति (आजाद), शत्रुघ्‍न (सिन्‍हा) और सिद्धू (नवजोत)। 


Also Read: Google ने विश्व के ‘Top 10 Criminals’ लिस्ट में शामिल किया प्रधानमंत्री मोदी को

चुकी कुमार विश्वास आप के वरिष्ठ नेता हैं इस ट्वीट को इसलिए भी हल्‍के में नहींं लिया जा सकता है, क्‍योंकि नवजोत सिंह सिद्धू की पत्‍नी ने साफ कह दिया है कि भाजपा के बाद सिद्धू के लिए आप ही एक मात्र विकल्‍प है। कीर्ति आजाद की पत्‍नी पूनम आजाद ने आप में आने की घोषणा कर दी है। शत्रुघ्‍न सिन्‍हा की ओर से आप में जाने के पहले से कोई संकेत नहीं हैं। हालांकि, केजरीवाल से उनकी करीबी है। हाल ही में, दिल्‍ली में एक नाटक के दौरान उन्‍होंने जम कर केजरीवाल की तारीफ की थी।

 कीर्ति आजाद ने अरुण जेटली के ख्‍ािलाफ मोर्चा खोला था तो उन्‍हें भाजपा निलंबित कर चुकी है। शत्रुघ्‍न सिन्‍हा काफी समय से नरेंद्र मोदी व अमित शाह जैसे बड़े नेताओं के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं और पार्टी लाइन के खिलाफ बातें करते रहे हैं। इसलिए इन तीनों के आप में जाने की संभावना पूरी तरह खारिज भी नहीं की जा सकती। वही, नवजोत सिंह सिद्धू 18 जुलाई को राज्‍यसभा की सदस्‍यता से इस्‍तीफा दे चुके हैं। भाजपा छोड़े जाने को लेकर पार्टी या सिद्धू की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, पर तीन महीने में ही सांसदी छोड़ देना उनका पार्टी विरोधी रुख साफ करता है।