मंदिरों में देवी-देवताओं के दर्शन-पूजन की परंपरा तो सब जगह प्रचलित है, लेकिन उत्तराखंड में एक ऐसा भी मंदिर है जिसमें भगवान के चेहरे के बजाय उनकी पीठ के दर्शन किए जाते हैं। उत्तरकाशी के छोटे-से कस्बे नैटवाड़ में भगवान पोखूवीर का मंदिर है। इस इलाके में पोखूवीर को न्याय का देवता माना जाता है। लोगों की मान्यता है कि जो भी उनसे न्याय मांगता है, वे बिल्कुल सही और निष्पक्ष इंसाफ करते हैं, लेकिन उनके मुख के दर्शन नहीं किए जाते।
लोगों की आस्था इनसे गहराई तक जुड़ी है। पुराने समय में जब लोगों को निष्पक्ष न्याय नहीं मिलता था या जब वे न्याय प्रणाली को अपनाना पसंद नहीं करते थे, तो पोखूवीर से इसकी गुहार करते थे। लोगों का कहना है कि जो दोषी होता है, उसे पोखूवीर किसी भी रूप में दंड दे सकते हैं।
यहां पोखूवीर से जुड़ी अनेक कथाएं भी प्रचलित हैं। कहा जाता है कि बहुत प्राचीन समय में जब किरिमर दानव ने इस इलाके में आतंक मचाया तो जनता की रक्षा के लिए राजा दुर्योधन ने उससे युद्ध किया। युद्ध में दानव हार गया और दुर्योधन ने उसकी गर्दन काटकर टोंस नदी में फेंक दी।
किरिमर दानव का सिर प्रवाह की दिशा के बजाय उलटा बहने लगा। जहां रूपिन और सूपिन नदी का संगम आता है, वहां ये नैटवाड़ में ये रुक गया। राजा दुर्योधन ने जब किरिमर दानव के सिर को देखा तो उसे नैटवाड़ में ही स्थापित कर दिया और यहीं उसका मंदिर बना दिया। आज यह पोखूवीर के नाम से जाना जाता है।
मंदिर से एक और कथा भी जुड़ी है। कहते हैं कि यह दानव नहीं बल्कि वभ्रूवाहन था। कृष्ण ने महाभारत के युद्ध से पूर्व ही उसका शीश काट दिया था। इस इलाके की खासियत है कि यहां कई स्थानों पर कौरवों की पूजा होती है। यहां तक कि दुर्योधन का मंदिर भी है। एक अन्य मंदिर में कर्ण की पूजा की जाती है।
